मंगलवार, 18 नवंबर 2014

हिन्दू पुनर्जागरण के लिए हिन्दू कांग्रेस

अनिल सौमित्र
गत दिनों में हिन्दू और हिंदुत्व सर्वाधिक चर्चित शब्द रहा है l अधिकांशत: यह चर्चा प्रतिक्रियात्मक होती है l इसलिए हिन्दू और हिंदुत्व शब्द ज्यादातर विवादों में रहता है l नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में जब से भाजपा की सरकार बनी है तब से इन शब्दों को एक नया सन्दर्भ मिल गया है l भारत में हालांकि हिन्दू के नाम पर अनेक संगठन हैं l हिन्दू महासभा से लेकर विश्व हिन्दू परिषद्, हिन्दू मुन्नानी, हिन्दू जागरण मंच, हिन्दू सेवक संघ जैसे न जाने कितने संगठन हिन्दुओं के नाम पर काम कर रहे हैं l लेकिन हिन्दुओं की स्थिति दुनिया में तो क्या स्वयं भारत में भी गर्व करने लायक नहीं है l अयोध्या आन्दोलन के दिनों में जरूर नारे लगते थे- गर्व से कहो हम हिन्दू हैं l लेकिन वक्त के साथ अयोध्या आन्दोलन भी नेपथ्य में चला गया और ये नारा भी मद्धिम पड़ गया l हिन्दू विरोधियों ने दुष्प्रचार और अपप्रचार के द्वारा हिन्दू शब्द को साम्प्रदायिकता का पर्यायवाची बना दिया l इस दृष्टि से एक बड़ा बौद्धिक धड़ा भी बैकफुट पर है l विरोधियों और प्रतिक्रियावादियों ने हिन्दू पदावली को फासीवाद, तानाशाही, कट्टर, पोंगा-पंथी, जड़, पुरातनपंथी, नाजीवादी, साम्प्रदायिक और कम्युनल जैसी धारणाओं से युक्त कर दिया है l यही कारण है कि सर्वथा आधुनिक, प्रगतिशील. देशभक्त और राष्ट्रवादी व्यक्ति भी अपने को हिन्दू कहने या कहलाने में हिचकता है l राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठनों की लाख कोशिशों के बावजूद यह हिचक कम तो हुई है, लेकिन अभी भी ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही l जब कभी संघ या कोई अन्य हिन्दू संगठन हिन्दू, हिंदुत्व या हिन्दूपन की बात करता है तो तत्काल नकारात्मक और निन्दात्मक चर्चा का केंद्र बन जाता है l हालांकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी स्थापना के समय से ही यह दुहराता रहा है कि भारत, जिसे आर्यावर्त, भारतवर्ष, हिन्दुस्थान आदि कई नामों से पहचाना जाता है, एक हिन्दूराष्ट्र है l यहाँ के सभी नागरिक हिन्दू हैं l संघ के विचारक, चिन्तक और पदाधिकारी यह कहते रहे हैं कि अगर ब्रिटेन के नागरिकों को ब्रिटिश, अमेरिका के नागरिक को अमेरिकन और रूस के नागरिक को रसियन कहा जा सकता है तो फिर हिन्दुस्थान के नागरिकों को हिन्दू क्यों नहीं! आलोचक और विरोधी इसे संघ का संकीर्ण नजरिया आरोपित करते हैं l चाहे स्वामी विवेकानंद हों या महर्षि अरविंद, सावरकर हों या गुरू गोलवलकर, अशोक सिंहल हों या मोहनराव भागवत, हिन्दू के बारे में कही गई उनकी बातों पर हमेशा विवाद होता आया है l हालांकि संघ के भीतर ही कुछ लोग उदारता, लचीलेपन और समावेशी भाव के कारण संघ को सेक्युलर हो जाने का ताना मारते हैं l दरअसल हिन्दू के बारे में जब कभी चर्चा हुई तो उसके विरोधियों ने आक्रामक आलोचना ही की और इसे विवादित करने का हर संभव प्रयास किया l हर बार यह प्रयास तात्विक और सैद्धांतिक न होकर राजनीतिक ही रहा है l इसमें सदैव सात्विक और सार्थक बहस का अभाव रहा है l हिन्दू की बात हमेशा राजनीतिक दुराग्रहों की भेंट चढ़ता रहा है l हिन्दू की बहस को कोई शास्त्रीय या सैद्धान्तिक आधार मिल पाये इसके पहले ही मीडिया में उसकी बलि ले ली जाती है l इसमें दो राय नहीं है कि हिन्दू की परिभाषा, उसका सिद्धांत और उसकी अवधारणा आमजन के बीच ही नहीं, बल्कि बौद्धिक जगत और अकादमिक क्षेत्र में भी अस्पष्ट और दरकिनार है l ऐसी परिस्थितियों में दिल्ली में 21 से 23 नवम्बर तक विश्व हिन्दू कांग्रेस का आयोजन स्वयं में एक बड़ी घटना है l यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि जब भारत में ही हिन्दू और हिंदुत्व स्वीकार्य नहीं है तो दुनिया में कैसे और किस बिना पर होगा! जब हिन्दू की जन्मस्थली भारत में ही हिन्दू पहचान गर्व का विषय नहीं बन सका है तो विश्व में कब और कैसे बनेगा? दुनिया में जब ईसाइयत और इस्लाम का परचम फहरा रहा है, तो हिन्दू ध्वजा लहराने की क्या संभावना है? क्या इसकी कोई संभावना है कि दुनियाभर में फैले हिन्दू संगठित हो सकें! भाषा, सभ्यता और संस्कृति की दृष्टि से अपना नेतृत्व स्थापित कर सकें! विश्व राजनीति, शिक्षा, व्यापार-वाणिज्य, संस्कृति, मीडिया और विधि-विधान के क्षेत्र में अपनी प्राचीन हिस्सेदारी प्राप्त कर सकें? यह विश्व हिन्दू कांग्रेस इन्हीं संभावनाओं, समस्याओं और चुनौतियों की तलाश करेगा l पर्दे के पीछे रहकर विश्व हिन्दू कांग्रेस की व्यूह रचना करने वाले स्वामी विज्ञानानन्द कहते हैं – विश्वभर में फैला हिन्दू आज मानवाधिकार हनन, नस्लभेद, सांस्कृतिक अपमान, उपेक्षा और भेद-भाव का शिकार है l स्वयं भारत का हिन्दू भी सांप्रदायिक आधार पर उपेक्षा, विषमता और भेद-भाव का शिकार होता रहा है l हम देश और दुनिया में हिन्दुओं का स्वर्णकाल वापस चाहते हैं l बीते दिनों में हम वैभवशाली और शक्तिसम्पन्न थे, आज हो सकते हैं और भविष्य में इसे बनाए रख सकते हैं l नवम्बर के दूसरे पखवाड़े में भारतवर्ष की राजधानी दिल्ली में आयोजित होने वाले इस तीन दिवसीय ‘विश्व हिन्दू कांग्रेस’ में कुल सात आयामों पर विमर्श होगा l हिन्दू राजनीति, हिन्दू अर्थनीति, हिन्दू युवा, हिन्दू स्त्री, हिंदू शिक्षा, हिन्दू संगठन और हिन्दू मीडिया पर भिन्न-भिन्न फोरम पर चर्चा होगी l विश्व के कई देशों - इंगलैंड, अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, और चीन सहित मलेशिया, श्रीलंका, बंगलादेश, भूटान, थाईलैंड आदि देशों के सैकड़ों प्रतिनिधि इस कांग्रेस में सम्मिलित हो रहे हैं l इस विश्व हिन्दू सम्मलेन में भारत सहित कई देशों की राजनीतिक, आर्थिक और मीडिया क्षेत्र की महत्वपूर्ण हस्तियाँ शामिल होंगी l जाहिर है यह सम्मलेन हिन्दू दृष्टियों पर वाद, विवाद और संवाद का साक्षी बनेगा l इस सम्मलेन के बारे में राजनयिकों और खुफिया संगठनों की स्वाभाविक जिज्ञासा होगी l कहने वाले कहने लगे हैं कि हिन्दुओं का आत्म-विश्वास मंद गति से ही सही लेकिन लौटने लगा है l वे हिंदुत्व के चिर-पुरातन और नित्य-नूतन सिद्धांत को पुन: वैश्विक धरातल देने की आशा से भर उठे हैं l दुनिया का विश्वगुरू, सिरमौर बनने की हिन्दू इच्छा जोर मारने लगी है l हिन्दू संस्कृति के वैविध्य और अनेकता में एकता के वैशिष्ट की पुनर्स्थापना की वे बाट जोह रहे हैं l हिन्दू गुण-दोष के आत्मावलोकन और हिन्दू इतिहास के पुनरावलोकन के प्रति आज का हिन्दू गंभीर होने लगा है l विश्व समस्याओं का हरण और विश्व को श्रेष्ठ बनाने की पहल करने को हिन्दू लालायित है l सदियों बाद भारत के राजनीतिक परिदृश्य ने हिंदूवादी करवट ली है l देश में भी और दुनिया में भी भारत के बारे सोच और नजरिया दोनों बदला-बदला दिखाई दे रहा है l संघ प्रमुख मोहनराव भागवत जब कहते हैं कि विश्व की समस्याएं अपने खात्मे के लिए भारत में आती हैं, तो वे संघ के स्वयंसेवकों को आसन्न चुनौतियों का इशारा करते हैं l फिर संघ की शाखाओं में गीत गूंजने लगता है- हिन्दू जगे तो विश्व जागेगा, मानव का विश्वास जागेगा l महर्षि अरविंद, राम कृष्ण परमहंस और विवेकानंद ने भारत के पुनर्जागरण की भविष्यवाणी की थी l भारत के पुनर्जागरण से उनका आशय हिन्दू जागरण से ही था! कमोबेश सभी ने इस जागरण की अवधि भी एक जैसी ही बताई है l तो क्या पुनरोदय की शुरुआत हो चुकी है? विश्व हिन्दू कांग्रेस इस पुनर्जागरण का उत्प्रेरक या घटक बनेगा? हिन्दू कांग्रेस के आयोजक भले ही इसे दुनियाभर के हिन्दुओं को अपनी समस्याओं और चुनौतियों को साझा करने का मंच उपलब्ध कराना कह रहे हों, लेकिन उनकी मंशा सिर्फ इतनी ही हो यह जरूरी नहीं! यह कवायद हिन्दू कांग्रेस के बहाने दुनियाभर के हिन्दुओं और हिन्दू संगठनों को लामबंद करने, दुनिया को एक नई व्यवस्था और एक नई दिशा देने का दुस्साहस भी हो सकता है l (लेखक पत्रकार और मीडिया एक्टिविस्ट हैं)

1 टिप्पणी:

Gajendra Patidar, Susari ने कहा…

आपका अग्रांकित कथन कि"हिन्दू विरोधियों ने दुष्प्रचार और अपप्रचार के द्वारा हिन्दू शब्द को साम्प्रदायिकता का पर्यायवाची बना दिया l इस दृष्टि से एक बड़ा बौद्धिक धड़ा भी बैकफुट पर है l विरोधियों और प्रतिक्रियावादियों ने हिन्दू पदावली को फासीवाद, तानाशाही, कट्टर, पोंगा-पंथी, जड़, पुरातनपंथी, नाजीवादी, साम्प्रदायिक और कम्युनल जैसी धारणाओं से युक्त कर दिया है l यही कारण है कि सर्वथा आधुनिक, प्रगतिशील. देशभक्त और राष्ट्रवादी व्यक्ति भी अपने को हिन्दू कहने या कहलाने में हिचकता है " इस स्थापना से सहमत नहीं हुआ जा सकता कि जिस देश का विभाजन हीं हिंदुओं की आबादी के विरोध स्वरूप हुआ हो वहां कोई 'हिंदू ' होने में हिचक महसूस करे! यह पचता नहीं, क्योकि हिंदू होना कोई लबादा ओढ़ना नहीं है कि शर्म लगी और उतार कर फेंक दिया।
हां यह कोशिश सतत कुछ तथाकथित सेकूलरों के लिये कथनानुकूल हो सकती है, जो अपने हिंदू जन्म पर शर्म करते हों।