रविवार, 1 दिसंबर 2013

वैकल्पिक राजनीति का विकल्प

क्या देश की राजनीति यूं ही सरपट दौड़ती जाएगी, या अपनी पटरी बदलेगी? राजनीति में क्या कोई बदलाव, कोई परिवर्तन संभव है? आमजनता को अपने ही प्रतिनिधियों पर भरोसा नहीं रहा. जनप्रतिनिधि अब लोकतंत्र का पहरुआ नहीं रहा. शायद था कभी, या कभी पहरुआ बना ही नहीं! क्या किया जाए कि संसद और लोकतंत्र एक-दूसरे के पोषक बनें. आज तो नेता और व्यापारी एक-दूसरे के पोषक बन रहे हैं. राजनैतिक दल बहुराष्ट्रीय कंपनियों के एजेंट जैसे हो गए है. संसदीय व्यवस्था ऐसी है जो अल्पसंख्यक मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करती है. ऐसे कई सवाल हैं, कई उधेडबुन हैं जो राजनैतिक रूप से जागरूक और सक्रिय लोगों के मन में असमंजस पैदा करते है. राजनीति की पटरी बदलेने वाले उलझन में है. इन्हें सुलझन कौन दे?
राजनीति की इसी उलझन को सुलझन देने की कवायद हुई २० जुलाई को. दिल्ली के मावलंकर सभागार में देशभर के राजनीतिक नेताओं का जुटान हुआ. हर बार की तरह अगुआ बने के.एन. गोविन्दाचार्य. मंच बना लोकतंत्र बचाओ मोर्चा. मनचा पर थे- लोकसत्ता के डा. जयप्रकाश नारायण, एकता परिषद के पी.वी. राजगोपाल, पूर्व केन्द्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान, गुजरात परिवर्तन पार्टी के गोवर्धन झड़फिया, बिहार के पूर्व मंत्री रामदेव सिंह यादव, नवल किशोर शाही, पूर्व सांसद सरखन मुर्मू, मध्यप्रदेश भारतीय किसान संघ से निष्कासित और भारतीय किसान प्रजा पार्टी के अध्यक्ष शिवकुमार शर्मा, लोकसत्ता दिल्ली के अनुराग केजरीवाल. इसमें कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्त संतोष हेगडे और एनडीए सरकार में प्रधानमंत्री के सलाहकार जगदीश शेट्टार भी शामिल हुए. सभा का संचालन आरएसएस के पूर्व प्रचारक रमेश भाई ने किया. आयोजन की रूपरेखा राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के संयोजक सुरेन्द्र बिष्ट ने किया. जब से गोविदाचार्य भाजपा से बाहर हुए तभी से साहस, पहल और प्रयास की बात कर रहे है. वो देश के मिजाज को समझाने का दावा तो कर रहे है, लेकिन देश शायद उनके फार्मूले को समझ नहीं पा रहा है. वे भाजपा से छुट्टी लेकर अध्ययन अवकाश पर गए. उदारीकरण का भारत पर पडने वाले प्रभावों का अध्ययन किया. समस्या और समाधान की पहचान की. कुछ औजारों की पहचान भी की. लेकिन अपने समर्थकों और संगठनों में जरूरी लायक न भरोसा पैदा कर पाए और न ही उत्साह और जूनून ही. विकल्पों की तलाश में खुद विकल्प बन गए. कभी रामदेव, तो कभी अन्ना-केजरीवाल! किरण बेदी, हेगडे, केजरीवाल, वेदप्रताप वैदिक, रामबहादुर राय और बाबा रामदेव जैसे लोगों को एकसूत्र में बांधने कोशिश करते रहे लेकिन सबके सब धागा (सूत्र) ही लेकर भाग निकले. सब अपनी महत्वाकांक्षाओं के आगे बेबस है. सबकी अपने-अपनी डफली है. वे गोविदाचार्य के राग से अलग है. इसा मामले में कांग्रेस और भाजपा एक है. वे किसी विकल्प को पैदा नहीं होने देंगे. आरएसएस मौन है. वह इस मामले किसी प्रकार का रिस्क लेना नहीं चाहता. संघ के लिए राजनीति को ठीक करने या राजनीति का उपयोग करने का सबसे उपयुक्त रास्ता है - भाजपा. फिलहाल वह किसी भी वैकल्पिक राजनीति के बारे में वक्त जाया करने के मूड में नहीं है. इसालिए वह न तो खुलकर गोविन्दाचार्य के साथ है न ही उनके इतर. इसीलिये गोविन्दाचार्य लालकृष्ण आडवानी और संघ के सरकार्यवाह भैयाजी से लेकर गुरूमूर्ति, सुब्रमण्यम स्वामी, जयप्रकाश नारायण, राजगोपाल, बाबूलाल मरांडी, गोवर्धन झड़फिया और शिवकुमार शर्मा तक को साधने में लगे है. वे एक संघ को भले ही न साध सके, शायद इसीलिये अनेक को साधने की कवायद कर रहे है. यह कोई संयोग नहीं है कि वैकल्पिक राजनीति के तमाम प्रयोग करने के बावजूद कोई निर्णायक परिणाम नहीं दिखा रहा. गोविदाचार्य बिखरावों को बार-बार जोडने की कोशिश करते है. कई बार वे खुद ही टूट जाते है. वो तो उनकी जिद्द है जिसके कारण वे फिर उठा खड़े होते हैं और फिर अनेक को एक करने की कोशिश करते है. वे वैकल्पिक राजनीति की बाधाओं, चुनौतियों और खतरों से बखूबी वाकिफ है. लेकिन वे खतरों के खिलाड़ी बनना चाहते है. इसलिए राजनीति के मैदान को छोडना नहीं चाहते. वे राजनीति के मैदान राजनीति के खेल को ही बदलने की फिराक में है. इस खेल में वे मित्र-शत्रु भाव भी भूल बैठे है. वे भाजपा के बीच से भी मित्र ढूंढ रहे है, और भाजपा के शत्रुओं के बीच से भी इस खेल के खिलाड़ी. इसीलिये उनके आह्वान पर गुजरात से पुराने संघी-भाजपाई गोवर्धन झड़फिया आये तो मध्यप्रदेश किसान संघ से निष्कासित नेता शिवकुमार शर्मा भी. कहने वाले कह सकते हैं कि गोविदाचार्य के लोकतंत्र बचाओ मोर्चा या वैकल्पिक राजनीतिक मोर्चा में पिटे-पिटाए नेता ही है. उनके साथ वे ही हैं जो किसी काम के नहीं. अपने-अपने इलाके में ये नेता या तो बेअसर हो गए हैं याँ उपेक्षा के शिकार है. लेकिन यह भी सच है की भारत की वर्तमान राजनीति जुगाड़ की राजनीति है. कौन जाने गोविन्दाचार्य कबाड से जुगाड़ की राजनीति कर रहे हों. भाजपा के महासचिव रहते हुए गोविन्दाचार्य अपना सर्वोत्तम राजनीतिक जीवन जी चुके हैं. वे भाजपा की रग-रग से वाकिफ हैं. वे भाजपा में जोड़-तोड़ और गठजोड के नीतिकार रहे हैं. वे अपना बचा हुआ जीवन राजनीतिक प्रयोगों में लगा रहे हैं. प्रयोग सफल हुआ तो इतिहास बनेगा. नहीं हुआ तो भी गोविन्दाचार्य के पास खोने को कुछ भी नहीं है. आज की जो राजनीति है उसमें पद और प्रतिष्ठा के लिए लोग किसी भी हद तक जा रहे है. गोविन्दाचार्य के पास भी भाजपा में वापसी के अवसर थे. जोड़-तोड़ के सहारे वे भी राज्यसभा में पहुँच सकते थे. लेकिन यह सब न करके वे संसद के बाहर से लोकतंत्र के लिए संघर्ष कर रहे है. राजनीति के केकड़े और मेढकों को एक तराजू पर लाने का प्रयोग कर रहे हैं. इसे तो आग से खेलना ही कहा जाएगा. एक तरफ भाजपा-कांग्रेस जैसी स्थापित पार्टियां, दूसरी तरफ सपा-बसपा और लोजपा जैसी अवसरवादी पार्टियां और तीसरी तरफ विदेशी शक्तियाँ. इनके पास दल-बल और छल है. गोविन्दाचार्य के प्रयासों में संघ हो सकता था, अपनी ताकत और व्याप्ति के साथ, लेकिन संघ साथ नहीं है. अगर कोई साथ है तो देश में व्याप्त जनाक्रोश और बिखरे हुए छिट-पुट लोग. अगर इन बिखरी हुई ताकतों को संगठित कर देश के जनाक्रोश को वैकल्पिक राजनीति की और मोड़ पाए तो गोविन्दाचार्य सफल हो पायेंगे. तभी उनका राजनैतिक वनवास पूरा होगा. तभी विकल्प की राजनीति सार्थक होगी. तभी देश की राजनीति को एक नयी पटरी मिल पायेगी.

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