बुधवार, 4 दिसंबर 2013

पाश्चात्य के लिए हिन्दू धर्म के अलावा कोई मार्ग नहीं

अनिल सौमित्र दुनिया में भारत एक अलग, भिन्न प्रकार का देश क्यों है? क्या सिर्फ मानचित्र या भौगोलिक भिन्नता ही, भारत को दुनिया में विशिष्ट बनाता है, या कुछ और बात है? क्या सच में दुनिया के देश भोग भूमि हैं और भारत योग और कर्म की भूमि? राष्ट्रवादी तो भारत को देवभूमि और पुण्यभूमि तक कहते हैं। भारतीय सभ्यता प्रकृति केन्द्रित रही है, यूरोप और पश्चिमी सभ्यता मानव केन्द्रित। यूरोप सहित पश्चिमी देशों का विकास औद्योगिकीकरण, व्यापार, वाणिज्य, उत्पादन, विपणन और प्रौद्योगिकी के आधार पर हुआ है। किन्तु भारतीय सभ्यता का विकास धर्म-आध्यात्म और सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर। पश्चिमी देश दुनिया में साम्राज्य विस्तार करते और गुलामों की फौज बढ़ाते रहे। प्राचीन भारत में गुलाम प्रथा कहीं नहीं दिखाई देती। यहां मानवता के प्रति सम्मान प्रारंभ से ही रहा है। हिंसा, बल और लोभ के द्वारा मतान्तरण ईसाई देश अपनी जिम्मेदारी मानते रहे हैं। भारत से सृजित धर्म अनेक देशों में फैले, लेकिन शांतिपूर्ण प्रचार-प्रसार के द्वारा। भारत को दुनिया से, खासकर यूरोप से अलग बताते हुए स्वामी विवेकानन्द ने कहा कि - ‘भारत की वायु शान्तिप्रधान है, यवनों की प्रकृति शक्तिप्रधानय एक गंभीर चिन्तनशील है, दूसरा अदम्य कार्यशीलय एक का मूलमन्त्र है ‘त्याग’, दूसरे का ‘भोग’य एक की सब चेष्टाएं अन्तर्मुखी हैं, दूसरे की बहिर्मुखीय एक की प्रायः सब विद्याएं आध्यात्मिक हैं, दूसरे की आधिभौतिकय एक मोक्ष का अभिलाषी है, दूसरा स्वाधीनता को प्यार करता हैय एक इस संसार के सुख प्राप्त करने में निरुत्साह है, और दूसरा इसी पृथ्वी को स्वर्ग बनाने में सचेष्ट हैय एक नित्य सुख की आशा में इस लोक के अनित्य सुख की उपेक्षा करता है, दूसरा नित्य सुख में शंका करके अथवा उसको दूर जानकर यथासंभव ऐहिक सुख प्राप्त करने में उद्यत रहता है।’(विवेकानन्द, 1997) हालांकि स्वामी विवेकानन्द ने किसी नये सिद्धान्त या दर्शन का प्रतिपादन तो नहीं किया और न ही भारतीय समाज के लिए किसी वैकल्पिक संरचनात्मक प्रारूप का विकास ही किया, किन्तु दुनिया में हिन्दू धर्म और संस्कृति की प्रबल पैरोकारी जरूर की। वे दोहरा काम करते रहे। एक तरफ वे विश्व में भारत की धर्म पताका फहराते रहे, वहीं दूसरी ओर भारत के लोगों, समाज और धर्म का परिष्कार भी करते रहे। काल प्रवाह के साथ हिन्दू धर्म में आई बुराइयों से वे जीवनपर्यन्त संघर्ष करते रहे। स्वतंत्रता और समानता की अवधारणा पर आज यूरोपीय मुलम्मा जरूर चढ़ गया है, लेकिन विवेकानन्द ने उपनिषद् के दर्शन - ‘‘ईशावास्यं इदं सर्वम यत्किंच जगत्यांजगत’’ की प्रस्थापना का हवाला बार-बार देते हुए पश्चिम को स्वतंत्रता, समानता और एकता के सूत्र समझाते रहे। भारत में भ्रमण करते हुए उन्होंने बार-बार सामाजिक और धार्मिक बुराइयों का उल्लेख किया, लेकिन शिकागो सहित अपने तमाम भाषणों में वे इस्लाम और ईसाइयत को चुनौती देते हुए हिन्दू धर्म से सीख लेने का आह्वान करते रहे। भारतीयों को आह्वान करते हुए विवेकानन्द ने कहा- हमारे धर्म का यूरोप और अमेरिका में प्रचार होना चाहिए। आधुनिक विज्ञान ने ईसाई आदि धर्मों की भित्ति बिलकुल चूर-चूर कर दी है। इसके सिवाय, विलासिता ने तो धर्मवृत्ति का प्रायः नाश ही कर डाला है। यूरोप और अमेरिका आशा भरी दृष्टि से भारत की ओर ताक रहे हैं। परोपकार का यही ठीक समय है, शत्रु के किले पर अधिकर जमाने का यही उत्तम समय है। पश्चिमी देशों में नारियों का ही राज, नारियों का ही बल और नारियों की ही प्रभुता है। यदि वेदान्त जानने वाली तेजस्विनी और विदुषी महिलाएं प्रचार के लिए इंग्लैण्ड जाएं, तो मैं निश्चित कहता हूं कि प्रत्येक वर्ष सैकड़ों स्त्री-पुरूष भारतीय धर्म ग्रहण कर कृतार्थ हो जायेंगे। अकेली रमाबाई ही हमारे यहां से गयी थीं, अंग्रेजी भाषा, पश्चिमी विज्ञान और शिल्प आदि में उनका ज्ञान बहुत ही कम था, तो भी उन्होंने सबको चकरा दिया। यदि आप जैसी कोई पधारें तो इंग्लैण्ड हिल जायेगा, फिर अमेरिका की क्या बात है! स्वामी विवेकानन्द ने कहा कि मैं दिव्य दृष्टि से देख रहा हूं कि यदि भारतीय नारियां देशी पोशाक पहने भारत के ऋषियों के मुँह से निकले हुए धर्म का प्रचार करें, तो एक ऐसी बड़ी तरंग उठेगी, जो सारी पश्चिमी भूमि को डुबो देगी। क्या मैत्रेयी, खना, लीलावती, सावित्री और उभयाभारती की इस जन्मभूमि में किसी और नारी को यह साहस नहीं होगा? प्रभु ही जानें! इंग्लैण्ड पर हम लोग धर्म के बल से अधिकार करेंगे, उसे जीत लेंगे - ‘‘नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय’’ - इसे छोड़ और कोई दूसरा मार्ग ही नहीं। क्या कभी सभा-समितियों के द्वारा इस प्रतापी असुर का उद्धार हो सकता है? अपनी आध्यात्मिकता के बल पर हमें अपने विजेताओं को देवता बनाना होगा। इंग्लैण्ड, यूरोप और अमेरिका पर विजय पाना- अभी यही हमारा महामन्त्र होना चाहिए। इसी से देश का भला होगा। विस्तार ही जीवन का चिन्ह है, ओर हमें सारी दुनिया में अपने आध्यात्मिक आदर्शों का प्रचार करना होगा।(विवेकानन्द, 1997) दरअसल स्वामी विवेकानन्द एक तरफ तो पाश्चात्य के गुणों का अनुकूलन कर भारत को सशक्त और समृद्ध करना चाहते थे, वहीं प्राच्य की सीख पाश्चात्य को भी देना चाहते थे। कहना न होगा कि पश्चिमी शिक्षा और संस्कृति का विवेकानन्द पर गहरा प्रभाव था। स्वामीजी के दृष्टिकोण में तर्कवाद और प्रगतिशीलता का एक बड़ा कारण पाश्चात्य चिंतन का प्रभाव था। उनमें एक तरफ जहां आध्यात्मिकता के प्रति जन्मजात प्रवृत्ति तथा प्राचीन धार्मिक प्रथाओं के प्रति आदर था, वहीं दूसरी ओर उनका प्रखर बुद्धियुक्त तार्किक स्वभाव था। बहुत समय तक विवेकानन्द के भीतर दोनों विचारों के बीच संघर्ष चलता रहा। बाद में स्वामी जी ने भारतीय और पाश्चात्य अर्थात् आध्यात्मिक और तार्किक विचारों में सामंजस्य का मार्ग विकसित किया। वे विश्वबन्धुत्व के वाहक बने। उनकी प्रेरणा और प्रयासों से अमेरिका में वेदान्त समिति की स्थापना हुई, थाउजैन्ड आइलैण्ड पार्क में अनेक अन्तरंग शिष्यों का मण्डल तैयार हुआ, राजयोग ग्रन्थ की रचना हुई। इंग्लैण्ड में अनेक व्यक्तियों ने उनका शिष्यत्व ग्रहण किया। हालांकि विश्व के समस्त धर्मों के आधारभूत वेदान्त के संदेश को पश्चिम में पहुँचाने में स्वामीजी का काफी समय और श्रम लगा, लेकिन भारत और दुनिया को उसका लाभ आज स्पष्ट दिख रहा है। संयुक्त राष्ट्र अमरिका में वेदान्त प्रचार कार्य को स्थायी आधार मिल गया। लन्दन में वेदान्त प्रचार के लिए अनुकूल वातावरण तैयार हुआ। स्वामी जी की यह धारणा दृढ़तर होती गई कि प्राच्य तथा प्राश्चात्य दोनों को पारस्परिक सहायता करनी चाहिए तथा दोनों में सहकारिता की वृद्धि होना जरूरी है। पाश्चात्य की भौतिक चमक-दमक उन्हें चकाचौंध नहीं कर सकी, लेकिन वे पश्चिम की इस चमक-दमक का उपयोग भारत की सामाजिक तथा आर्थिक निर्बलताओं को दूर करने में करना चाहते थे। भगिनी निवेदिता से उन्होंने एक बार कहा था- ‘‘पाश्चात्य में सामाजिक जीवन ब्राह्य उल्लास का ढेरमात्र है, किन्तु उसके नीचे छिपा है भीषण रुदन, उसकी समाप्ति होती है सिसकियों में ... और यहां भारतवर्ष में बाह्यतः दुःख और क्षोभ है, किन्तु अन्तस्तल में है ब्रेफ्रिकरी और आनन्द। पाश्चात्य ने बाह्य जगत् पर विजय प्राप्त करने का प्रयास किया, भारत ने अन्तर्जगत् पर। अब श्रेयस्कर यह है कि प्राच्य और पाश्चात्य दोनों हाथ में हाथ डालकर एक-दूसरे के हितसाधन में लगे, किन्तु इतना अवश्य है कि बिना एक दूसरे के वैशिष्ट को नष्ट किये। पाश्चात्य को प्राच्य से बहुत कुछ सीखना है और इसी प्रकार प्राच्य को पाश्चात्य से। असल में भविष्य गढ़ा जाये दोनों आदर्शों के समुचित सामंजस्य से। तब न प्राच्य रहेगा न पाश्चात्य, बल्कि रहेगी एकमात्र मानवता।’’ (स्वामी विवेकानन्द, 1997)। भारतीयों को संबोधित करते हुए स्वामीजी ने कहा था - पाश्चात्य जातियों से हम थोड़ा-बहुत सीख सकते हैं कि भोग में किस प्रकार सफलता मिल सकती है। किन्तु यह शिक्षा ग्रहण करते समय हमें बहुत सावधान रहना होगा। मुझे बड़े दुःख से कहना पड़ता है कि आजकल हम पाश्चात्य शिक्षा में शिक्षित जितने लोगों को देखते हैं, उनमें से एक का भी जीवन आशाप्रद नहीं है। इस समय हमारी एक ओर प्राचीन हिन्दू समाज और दूसरी ओर अर्वाचीन यूरोपीय सभ्यता है। इन दोनों में यदि कोई मुझसे एक को पसन्द करने के लिए कहे, तो मैं प्राचीन हिन्दू समाज को ही पसन्द करूंगा, क्योंकि अज्ञ होने पर भी, कुसंस्कार के घिरे होने पर भी, हिन्दू के हृदय में एक विश्वास है - उसी विश्वास के बल पर वह अपने पैरों पर खड़ा हो सकता है। भारत में रजोगुण का प्रायः सर्वथा अभाव ही है। इसी प्रकार पाश्चात्य में सत्वगुण का अभाव है। इसीलिए यह निश्चित है कि भारत से बही हुई सतवधारा के ऊपर पाश्चात्य जगत् जीवन का जीवन निर्भर रहता है, और यह भी निश्चित है कि तमोगुण को रजोगुण के प्रवाह से बिना दबाये हमारा ऐहिक कल्याण नहीं होगा और बहुधा पारलौकिक कल्याण में भी विघ्न उपस्थित होंगे। हमको अपने घर की सम्पत्ति सर्वदा सम्मुख रखनी होगी... और फिर संसार के चारों ओर से प्रकाश की किरणें आयें, पाश्चात्य का तीव्र प्रकाश भी आये! जो वीर्यवान है, बलप्रद है, वह अविनाशी है, उसका नाश कौन कर सकता है? विवेकानन्द ने अपने संदेश में हमेशा इस बात पर जोर दिया कि राष्ट्रीय जीवन मूल्य का आधार धर्म है-एक ऐसा धर्म जो समस्त विश्व के आध्यात्मिक ऐक्य का प्रचार करे और जब वह प्राप्त हो जाएगा तब हर चीज स्वतः सिद्ध अपने आप सुधर जायेगी। अपने देशवासियों की पाश्चात्य के प्रति अन्ध-अनुकरण-वृत्ति की भी उन्होंने तीव्र आलोचना की और इसी प्रकार लोगों की रूढ़िवादिता, जातिसंकीर्णता आदि आदि की भी। हिन्दू धर्म में वर्षों से हो रहे क्षरण के बावजूद ईसाइयत और इस्लाम के बरक्श हिन्दू श्रेष्ठता को स्थापित करने का उन्होंने सफल प्रयास किया। विवेकानन्द मूलतः एक धार्मिक व्यक्ति थे। दुनिया में उनकी ख्याति भी एक धार्मिक परिव्राजक के रूप में हुई। वे भारतीय धर्म-तत्व के व्याख्याकार के रूप में प्रसिद्ध हुए। यह महज संयोग नहीं है कि यूरोप और अमेरिका को अब ईसाई और इस्लामिक दृष्टि के अतिरिक्त एक सर्वथा नई दृष्टि- ‘हिन्दू दृष्टि’ मिली है। अब वे स्वयं को हिन्दू दृष्टि से देखने लगे हैं। यूरोप और अमेरिका के विद्वान भारतीय दर्शन, चिंतन और तात्विक विवेचनाओं में अब पहले से अधिक रूचि ले रहे हैं, शायद भारतीय विद्वानों से भी अधिक। अमेरिका पुनः अपनी खोज में, अपनी पुनरन्वेषणा में लगा है, वह भी हिन्दू रीति-नीति से। अनेक पश्चिमी देशों में अपनी प्राचीन श्रेष्ठताओं का तलाशने और गर्व की अनुभूति का दौर शुरू हो चुका है। वे अब देख पाने की चेष्टा कर रहे हैं कि उनका पुराना पंथ बहुत गहरा था, उनमें भी आध्यात्मिक गहराई थी। वे अब यह जानने, समझने और मानने लगे हैं कि उनके पुरखे इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते थे कि मनुष्य का जन्म पापपूर्ण गर्भ में से ही हुआ है। बल्कि वे मानते थे कि चारों ओर व्याप्त एक महान आत्मा है और उसका महान रहस्य सब ओर व्याप्त है। पश्चिम के अनेक विद्वान अब हिन्दुओं की कही बातों में अपने प्राचीन चिंतन की समानता देखने लगे हैं। अब वे भी प्रकृति में संतुलन और सामंजस्य के नियम पर आस्थावन होने लगे हैं। बहुत कुछ हिन्दू चिंतन के करीब अपने को देखने, तलाशने की एक कोशिश शुरू हो चुकी है। वे अब हिन्दुओं की - ‘सर्वम खलु इदम् ब्रह्म’ की धारणा को स्वीकार करने लगे हैं। स्वामी विवेकानन्द भारत को विश्वगुरू के देखना चाहते थे। वे मानवीयता के श्रेष्ठता के पक्षधर थे। वे चाहते थे कि दुनिया के मानव श्रेष्ठ बनें। इसीलिए वे बार-बार भारत को आर्यावर्त के उद्घोष ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ का स्मरण दिलाते रहे। वे इसे सफल होता हुआ देखना चाहते थे। वे यूरोप और भारत दोनों की तत्कालीन स्थिति और भविष्य के प्रति चिंतित थे। कई अवसरों पर स्वामीजी ने भारत और यूरोप-अमेरिका पर अपनी ऐतिहासिक श्रेष्ठताओं को भूलने का आरोप लगाया और प्राचीन गौरव को प्राप्त करने का संकल्प दिलाया। वे अपने भाषण में कहते हैं-‘यूरोप तथा अमेरिकावासी तो यवनों की समुन्नत, मुखोज्ज्वलकारी संतान हैं, पर दुःख है कि आधुनिक भारतवासी प्राचीन आर्यकुल के गौरव नहीं रहे। किन्तु राख से ढकी हुई अग्नि के समान इन आधुनिक भारतवासियों में छिपी हुई पैतृक शक्ति अब भी विद्यमान है। यथा समय महाशक्ति की कृपा से उसका पुनः स्फुरण होगा। भारत जबकि सदियों से विदेशी शासन से ग्रस्त था, यूरोप, इंग्लैण्ड और अमेरिका का वर्चस्व दुनिया में हावी था, ईसाइयत और इस्लाम का दबदबा दुनिया के सिर चढ़कर बोल रहा था। स्वामी विवेकानन्द का प्रयास एक युगान्तकारी पहल थी। बहुत समय बाद भारत लोगों के मन में स्वधर्म का स्वाभिमान जागृत हुआ। आज यूरोपीय देशों, इंग्लैण्ड और अमेरिका में हिन्दू धर्म का जो प्रभाव दिखता है उसकी पृष्ठभूमि में स्वामी विवेकानन्द के प्रयासों को नजरंदाज नहीं किया किया जा सकता। एक समय था जब अत्यन्त शुद्धतावादी विचारों के कारण भारतीय समुद्रपार जाने के खिलाफ थे। प्राचीन भारत में किन्हीं कारणों से समुद्रपार यात्रा के बारे में नकारात्मक या निषेधात्मक धारणाओं का उल्लेख मिलता है। शायद यही कारण रहा कि भारत के सनातन धर्म प्रचार-प्रसार समुद्रपारीय देशों में कम हो सका। प्राचीन हिन्दू समाज आर्यावर्त से बाहर न जा सका। धार्मिक और सांस्कृतिक विस्तार के मामले में हम बहिर्मुखी कम, अन्तर्मुखी ज्यादा रहे। आक्रमण न करना सुरक्षा की गारंटी नहीं होती। भारत धार्मिक व सांस्कृतिक मामलों में भी सदैव सुरक्षात्मक ही रहा, जबकि अन्य सभ्यताएं साम्राज्य की ही दृष्टि से नहीं, अपितु मतों के प्रचार-प्रसार की दृष्टि से भी आक्रामक ही रहीं। किन्तु विवेकानन्द ने उस मिथक को तोड़ने का काम किया। उन्होंने पश्चिम के लोगों पर हिन्दू धर्म की अमिट छाप छोड़ी थी। पहले आचार्य रजनीश, महर्षि महेश योगी और आज आध्यात्मिक गुरू श्री श्री रविशंकर, योग गुरू बाबा रामदेव, इस्कॉन, चैतन्य स्वामी मठ या अन्य आध्यात्मिक व्यक्तियों व संगठनों की जो धाक् पाश्चात्य देशों में दिखाई देती है उसकी पार्श्व भूमि स्वामी विवेकानन्द का व्यक्तित्व और कृतित्व ही है। विवेकानन्द ने हिन्दू धर्म की सरल और स्वीकार्य व्याख्या की। दुनिया में हिन्दू धर्म को प्रतिष्ठित किया। आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दुनिया के अनेक देशों में हिन्दू धर्म की पताका फहरा रहा है तो इसके पीछे भी स्वामीजी के योगदान को श्रेय दिया जाना चाहिए। उल्लेखनीय बात यह है कि यूरोप, इंग्लैण्ड और अमेरिका जैसे शक्तिशाली देशों में गरीब, निर्धन या लाचार हिन्दू धर्म के प्रति आकर्षित नहीं हो रहे, बल्कि वहां का अभिजात्य, सम्पन्न और बुद्धिजीवी हिन्दू धर्म स्वीकार कर रहा है। कुछ वर्ष पूर्व हॉलीवुड अभिनेत्री जुलिया राबर्ट्स ने हिन्दू धर्म स्वीकार किया। इसी प्रकार अमेरिका के विद्वान डेविड फ्रॉली ने हिन्दू धर्म अपना लिया। अब वे वामनदेव शास्त्री हो गये हैं। वे दुनिया में वैदिक परम्परा के प्रमुख बुद्धिजीवी माने जाते हैं। वामदेव शास्त्री अमेरिका में ‘अमेरिकन वैदिक इन्सट्टीयूट’ का संचालन करते हैं। ऐसे एक नहीं अनेक उदाहरण हैं। अमेरिकी समाज हिन्दू धर्म को सनातन जीवन पद्धति से जोड़कर देखने लगा है। विवेकानन्द पहले भारतीय थे जिन्होंने अमेरिका को पहली बार हिन्दू धर्म से प्रत्यक्ष अवगत कराया। हालांकि इसके काफी पहले ही राल्फ वाल्दो इमर्सन ने हिन्दू धर्म का पाठ अमेरिका में किया था। वस्तुतः स्वामी विवेकानन्द ने अमेरिकी धरती पर जिस आध्यात्मिकता की शुरूआत की वह कालान्तर में एक प्रवाह बन गई। यह प्रवाह निरन्तर है। आज सामान्य अमेरिकी भी बड़े पैमाने पर हिन्दू जीवन पद्धति अपना रहा है। अमेरिकी लाग दु्रत गति से उदारमना होते जारहे हैं...और यह महान् राष्ट्र शीघ्रता से उस आध्यात्मिकता की ओर अग्रसर होता जा रहा है, जिसका हिन्दुओं को गौरवपूर्ण अभिमान है। (रंगनाथानन्द, 1985)। दरअसल विश्व को भारतीय दृष्टि से देखना भी वैश्विक संतुलन एवं ऋत तथा सत्य की दृष्टि से आवश्यक है और यह हमारा स्वधर्म भी है। दुनिया में ईसाई और इस्लाम का विस्तार तो हो रहा है, लेकिन जीवन पद्धति के नाते यह व्यक्तिगत स्तर पर बड़े पैमाने पर अस्वीकृत हो रहा है। इसके विपरीत हिन्दू जीवन पद्धति का दुनिया में तीव्र विस्तार भले न हो रहा हो, लेकिन विभिन्न वर्गों में व्यक्तिगत स्तर पर यह बड़े पैमाने पर स्वीकार्य और ग्राह्य हो रहा है। भले ही व्यक्तिगत या संस्थागत तौर असंगठित प्रयास ही हो रहा हो, लेकिन हिन्दू जीवन पद्धति के प्रचार-प्रसार की निरन्तरता समकालीन वैश्विक संदर्भों में एक बड़ी उपलब्धि है। भारत ही नहीं, दुनिया के विद्वान मानने लगे हैं कि आज की छोटी-बड़ी लगभग सभी समस्याओं का समाधान हिन्दू जीवन पद्धति में है। आवश्यकता है इसे ईमानदारीपूर्वक आजमाने की। भारत के राष्ट्रवादियों द्वारा यह कहा जाना अतिश्योक्तिपूर्ण हो सकता है कि दुनिया की सभी समस्याएं अपने अंतिम चरण में भारत में आती हैं, अपने खात्मे के लिए। इसलिए चाहे वह आर्थिक विकास का प्रारूप हो या सामाजिक-सांस्कृतिक उन्नति का मार्ग, हिन्दू जीवन पद्धति एक सफल प्रयोग सिद्ध हो रहा है। आतंकवाद, कट्टरता, साम्प्रदायिक उन्माद, शोषण, गरीबी, असमानता और युद्ध जैसी अन्तरराष्ट्रीय समस्याओं का समाधान भारतीय या हिन्दू जीवन पद्धति में प्रत्याशित है। क्योंकि ‘वसुधैव कुटुम्बकम््’ और ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ दोनों एक ही सिक्के के पहलू हैं, दोनों वैदिक उद्घोषणाएं हैं। इन उद्घोषणाओं का पूर्ण होना, साकार होना विश्व मानवता के लिए शुभ है। यह विश्व सभ्यता के लिए आवश्यक भी है। यह हमारी मानवता के प्रति जिम्मेदारी भी है। स्वामी विवेकानन्द ने अपने दायित्व का निर्वहन बखूबी किया। उनकी प्रेरणाएं हमें उद्वेलित करती हैं कि विश्व मानवता को श्रेष्ठ बनाने के लिए हम अपने गुरुतर दायित्व का निर्वहन करें। स्वामी विवेकानन्द की सार्ध शती वर्ष में हर भारतीय के लिए यह संकल्प का अभिनव अवसर है। संकल्प - ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ का। (लेखक मीडिया एक्टिविस्ट हैं) संदर्भ: स्वामी विवेकानन्द 1997 हे भारत! उठो! जागो! रामकृष्ण मठ नागपुर स्वामी विवेकानन्द 1997 हे भारत! उठो! जागो! रामकृष्ण मठ नागपुर स्वामी रंगनाथानन्द 1985 स्वामी विवेकानन्द का मानवतावाद अद्वैत आश्रम कलकत्ता रामस्वरूप, 2007 योग की अध्यात्म विद्या एवं सेमेटिक धर्मपंथ प्रो. रामेश्वर मिश्र ‘पंकज’ (अनूदित एवं संपादित) भोपाल, मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी

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