रविवार, 1 दिसंबर 2013

सभी परिवर्तनों के वाहक और साधक बनेंगे युवा

अनिल सौमित्र दुनिया में सृजन और विकास के साथ-साथ विनाश भी हो रहा है. शान्ति और अशांति, दोनों के लिये बहुविध प्रयास हो रहे हैं. दोनों तरह के प्रयासों में लगे लोगों में बहुतायत उनकी है जो युवा हैं. युवा वे हैं जो मन, बुद्धि और शरीर से जवान हैं, तरोताजा हैं. भारत में समस्याएँ और चुनौतियाँ दुनिया की ही तरह मुंह बाए खड़ी हैं. यहाँ भी वे सब कुरीतियाँ हैं जो दुनियाभर में मानवीय सभ्यता को बेचैन किये हैं. यहाँ गरीबी है, भूखमरी है, बेकारी है, अशिक्षा है, बेरोजगारी है, अनुशासनहीनता है, अनैतिकता है. वह सबकुछ है जो किसी मुल्क या समाज को उसके अंत की ओर ले जाती है. लेकिन यही क्यों, और भी बहुत कुछ है. युवा है, हौसला है, उत्साह है, ऊर्जा है, संकल्प है, और सबसे अधिक है चुनौती को अवसर में बदल देने का माद्दा. यह है इसलिए दुनिया का, इस मानव सभ्यता का अस्तित्व है. युवा शक्ति, सिर्फ भारत के लिये नहीं अपितु दुनिया के लिये भी महत्वपूर्ण है. युवा, ऊर्जा का स्रोत है, ऊर्जा का भण्डार है. युवाओं की अपनी आकांक्षाएँ जरूर होंगी, लेकिन भारत राष्ट्र को भी उनसे अनेक अपेक्षाएं हैं. भारत को अगर दुनिया का नेतृत्व करना है तो वह युवाशक्ति के बल पर ही संभव है.
देश-दुनिया में ऐसे कई आंदोलन, ऐसी कई क्रांतियां हुई हैं, हो रही हैं जिसके वाहक और साधक युवा ही हैं. युवाशक्ति ही उसके केन्द्र में है। चाहे आतंकवादी हों या सुरक्षाकर्मी- सेना, पुलिस के सिपाही, युवा ही होते हैं. वैज्ञानिकों-चिकित्सकों की बहुसंख्या भी युवा ही है. फिर अपराध करने वालों में भी युवा ही अधिक हैं. राजनीति, विकास, श्रम, समाज-संस्कृति सबकुछ युवाओं के ही भरोसे है. लोकनायक जयप्रकाश नारायण के ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन से लेकर भ्रष्टाचार की मुखालफत का 'अन्ना-आंदोलन' तक युवा केंदित रहा है. भारतीय राजनीति युवा शक्ति के प्रभाव का अनुभव सन् 1977, 1980 और 1989 के लोकसभा चुनावों में कर चुकी है. इसमें युवाशक्ति की भूमिका अहम और निर्णायक रही है. यह मानने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि भविष्य तो युवाओं का है ही, वर्तमान भी उन्हीं का है. युवाओं में जोश है, जूनून है. वह असीमित उर्जा का भंडार है. कुछ सकारात्मक करने की ललक, संकल्प और प्रेरणा मिल जाये तो भारत को स्वर्णिम होने और दुनिया का सरताज बनाने से कोई रोक नहीं सकता। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोळवलकर ने युवकों को संबोधित करते हुए कहा था- हम अपनी सम्पूर्ण शक्ति से देशभक्ति की यह ज्योति जगाएं. उसे देशव्यापी व प्रखर बनाएँ. उस प्रकाश में सम्पूर्ण अज्ञानान्धकार लुप्त हो जाएगा. वह प्रकाश दुनिया की समस्त आसुरी शक्तियों को चुनौती देगा, दृढ नींव पर अजेय खड़ा रहेगा और सम्पूर्ण दुनिया को सिद्ध कर देगा कि हम इस श्रेष्ठ राष्ट्र के सुपुत्र हैं. केवल इसी मार्ग से हम सफल हो सकते हैं. केवल वही राष्ट्र प्रगति में अग्रणी होता जहाँ की युवाशक्ति अपनी क्षमता का एक-एक कण राष्ट्र की प्रगति के लिये दांव पर लगाती है. मैं आग्रह करता हूँ कि स्वयं को प्रसिद्धि, संपत्ति अधिकार की अभिलाषा को देश की वेदी पर न्यौछावर करें इसी में देश की समृद्धि, स्वयं एवं समाज का गौरव है. देश के युवाओं ने विभिन्न क्षेत्रों में अनेक मील के पत्थर स्थापित किये हैं. वर्त्तमान में तो प्रौद्योगिकी एक ऐसा क्षेत्र है जो युवाओं की पहचान बन गयी है. युवाओं ने साफ्टवेयर विकास और निर्माण में भारत को एक नई पहचान दी है. देश में युवाओं की लगातार बढ़ती अहमियत अब कोई नई बात नहीं रह गई है। सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और बौद्धिक क्षेत्र में युवा ही अनेक चुनौतियों से लोहा ले रहा हैं और अपनी काबिलियत का लोहा मनवा रहा है। वे हर तरफ, हर जगह अपनी क्षमता और दक्षता का सबूत दे रहे हैं। कोई भी सामाजिक-राजनैतिक संगठन युवाओं को नजरंदाज नहीं कर सकता। यह तथ्य भारत और संपूर्ण दुनिया के लिए महत्वपूर्ण है कि एक दशक के बाद एक औसत भारतीय की उम्र सिर्फ 29 साल होगी। जबकि औसत चीनी और अमेरिकी नागरिक 37 साल का होगा। इसी दरम्यान यूरोप में यह औसत उम्र 45 और जापान में 48 वर्ष होगी। जाहिर है कि सभी सरकारों और संगठनों से यह अपेक्षा स्वाभविक ही होगी कि इतनी महत्वपूर्ण आबादी को प्राथमिकता सूची में सबसे उपर रखें। हालांकि दुनिया में युवकों की संख्या कभी भी बहुत अधिक नहीं रही। किन्तु हर दस में से नौ युवा विकासशील देशों में हैं। हमारा सौभाग्य है कि आज दुनियाभर में भारत सर्वाधिक युवा देश है, क्योंकि यहां की 55 प्रतिशत आबादी युवा है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था- ‘‘मेरा विश्वास आधुनिक पीढ़ी में है। उसमें से मेरे कार्यकर्ता आयेंगे और सिंह के समान सभी समस्याओं का समाधान करेंगे।’’ अनेक विविधताओं के कारण युवा आबादी में भी कई प्रकार की विभिन्नताएं विद्यमान हैं। यही कारण है कि इनका प्रबंधन या नियोजन एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। युवा उर्जा को अगर उचित तरीके से नियोजित नहीं किया गया तो यह समस्या भी बन सकती है। उम्र के आधार पर युवा वर्ग का निर्धारण कर भी लें तो क्षेत्रीय (ग्रामीण-शहरी), आर्थिक, सामाजिक (जातीय), सांप्रदायिक और सांस्कृतिक विभिन्नताओं के कारण इनके लिए किसी नीति या योजना का निर्माण सरल नहीं है। युवाओं के बीच ही समता और समानता एक बड़ा सवाल है। प्रदेश के युवाओं को संस्कार, शिक्षा, प्रशिक्षण, कौशल उन्नयन और क्षमता विकास के द्वारा न सिर्फ रोजगार दिया जा सकता है, बल्कि युवा उर्जा के इस अक्षय भंडार को समाज, राष्ट्र और प्रदेश के विकास के लिए सदुपयोग हो सकता हैं। वक्त का तकाजा है कि युवाओं को नालायक समझने की भूल न की जाए, बल्कि उन्हें और अधिक लायक बनाने की कवायद हो। सरकारों और नीति-निर्माताओं को यह विचार करना चाहिए कि आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थितियां हैं, जो इस पीढ़ी को उनके उद्देश्यों से विमुख कर देती है, उन्हें असंयमित और अनुशासनहीन बना देती है। ब्रिटिश शासन काल के मंदी के दौर में भी लूट-पाट एवं हिंसा की घटनाएं कम ही होती थी। क्योंकि तब समाज में आदर्शो के प्रति गहरा मूल्यबोध था। मूल्यों का अंकुश समाप्त हो जाने के कारण हिंसा और लूटपाट की घटनाओं का विस्फोट स्वाभाविक है। टी.वी., फिल्मों और साहित्य ने अवांछित तत्वों के प्रति रोमांच और आकर्षण पैदा किया है। जिसके कारण युवाओं में भी काल्पनिक जीवन जीने की लालसा पैदा हुई है। अमीरी-गरीबी के बीच बढ़ती खाई, बेरोजगारी, सामाजिक रिश्तों का अभाव, पारिवारिक विघटन, उपभोगवादी संस्कृति का प्रसार, कानून व्यवस्था के प्रति घटता सम्मान और टूटते सामाजिक-राजनैतिक मूल्यों ने युवकों के भीतर निराशा पैदा कर दी है, अनेक युवा दिग्भ्रमित हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में युवाओं को सही मार्गदर्शन, सक्षम नेतृत्व और समाज व सरकार के स्तर पर समुचित सहयोग के द्वारा ही बेहतर परिणाम की अपेक्षा की जा सकती है। उनकी ऊर्जा और क्षमता को सदमार्ग, सही दिशा और निश्चित लक्ष्य की जरूरत है. अर्नाल्ड टॅायनबी ने अपनी पुस्तक ‘सरवाइविंग द फ्यूचर’ में नव-जवानों को सलाह देते हुए लिखा है कि ‘मरते दम तक जवानी के जोश को कायम रखना।’ जो राजनीति में होता है वही साहित्य और कला के क्षेत्र में भी होता है। नवयुवकों का दिमाग उपजाऊ जमीन की तरह होता है, उन्नत विचारों के बीज बो दें तो वही ऊग आते हैं। इसीलिए ऐथेंस के शासकों को सुकरात का भय था कि वह नवयुवकों के दिमाग में अच्छे विचारों के बीज बोने की क्षमता रखता था। आज इस पीढ़ी के दिल-ओ-दिमाग में विचारों के बीज पल्लवित कराने वाले दिनोंदिन घटते जा रहे हैं। हर क्षेत्र में, चाहे वह कला, संगीत और साहित्य का हो, राजनीति और विज्ञान का हो, उसमें नई प्रतिभाएं उभरती रहती हैं। प्रश्न यह है कि क्या हम उन्हें उभरने का पूरा मौका देते हैं? युवाओं के लिये वर्ष 2013-14 काफी महत्वपूर्ण है. अन्य कारणों के अलावा दो महत्वपूर्ण कारण हैं. पहला कारण है- युवाओं के आदर्श स्वामी विवेकानंद के जन्म की सार्ध सदी और दूसरा कारण है भारत में होने वाला लोकसभा का निर्वाचन. आने वाला समय राजनैतिक दृष्टि से भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है। आगामी लोकसभा चुनाव के परिणाम नये भारत के निर्माण के लिये निर्णायक होंगे. एक सशक्त, स्वावलंबी और सक्षम भारत के लिये साहसी और पराक्रमी नेतृत्व की जरूरत आ पडी है. भारतीय राजनीति, अर्थनीति और समाजनीति में व्यवस्था परिवर्तन की मांग है. इस मांग को भारत का युवा ही पूरा कर सकता है. आकडों के अनुसार दुनिया में बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है, तो भारत में तरुणों की. दुनिया बूढ़ी हो रही है, भारत जवान हो रहा है. लेकिन इस जवान और ऊर्जा से भरपूर भारत को विवेकशील भी होना होगा. यहाँ का लगभग ३५ प्रतिशत मतदाता युवा है. इसीलिये लगभग सभी राजनीतिक दल युवा मतदाताओं पर विशेष ध्यान दे रहे हैं. सबको मालूम है यही युवा देश भविष्य को गढ़ने वाला है. जो राजनीतिक दल युवाओं के मनोविज्ञान को समझ सकेगा, उसकी आशा-अपेक्षाओं को पढ़ सकेगा, वही युवाओं के समर्थन का हकदार होगा. देश की सरकारों, राजनीतिक दलों और संगठनों को समझना होगा कि युवा अगर हिंसक और आक्रामक हो रहा है तो कहीं-न-कहीं उनकी भी असफलता है. नीतियों, कार्यक्रमों और गतिविधियों में जरूर कोई कमी रही है. हालांकि केन्द्र और राज्यों की सरकारों ने युवा विकास की दृष्टि से काफी प्रयास किए हैं, किन्तु ये सभी प्रयास नाकाफी सिद्ध हुए हैं। अब समय आ गया है कि युवाओं के समझाने की बजाये, पहले उनको समझा जाए. युवा ऊर्जा के सकारात्मक उपयोग के लिये सुदीर्घ नीति, योजना और रणनीति बने. युवा वर्ग स्वयं भी ज्ञान अर्जित करने में दो कदम आगे है. भारत में साक्षरता और ज्ञान का स्तर लगातार बढ़ रहा है. युवाओं को एक बार यह विश्वास हो गया कि उनके ज्ञान, कौशल और श्रम का सदुपयोग होगा तो वे अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तैयार होंगे. बशर्ते वे जिन्हें अपना आदर्श और नेता मानते हैं वे फिर उन्हें निराश न करें. भारत में करोड़ों युवाओं को सक्षम, योग्य और कुशल बनाने के विज्ञान और प्रौद्योगिकी का अभाव है. दुनिया का सबसे बड़ा सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन होने का दावा करने वाला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जरूर यह दावा करता है कि उसके पास युवाओं को आवश्यकतानुसार ढालने और गढने का विज्ञान है, प्रौद्योगिकी भी है और साफ्टवेयर भी. कहने को तो आरएसएस स्वयं संगठन का विज्ञान है. संघ की शाखा युवा स्वयंसेवकों के निर्माण की प्रौद्योगिकी और शाखा के विविध कार्यक्रम विभिन्न साफ्टवेयर हैं जिसके माध्यम से समाज और राष्ट्र जीवन के लिये अनेक प्रकार के गुणों से युक्त युवाओं का निर्माण होता है. संघ ने इस प्रकार तकनीक की भाषा में स्वयं को व्यक्त किया है. लेकिन सच्चाई यह भी है कि जिस अनुपात में युवाओं की तादाद बढ़ रही है, उस अनुपात में आरएसएस के प्रयास भी कम पड़ रहे हैं. क्योंकि आतंकवादी और नक्सली संगठन, दूसरे देशों के दुश्मन संगठन भी प्रतिगामी शक्तियों का विस्तार कर रहे हैं. सूचना और संचार तकनीक ने युवाओं में बड़े पैमाने पर नकारात्मक बदलाओं को विकसित किया है. ऐसी स्थिति में चुनौती को अवसर में बदलने वाली युवा शक्ति स्वयं एक चुनौती बनकर देश-समाज के सामने खडी है. अधिकाँश युवा स्वयं के बारे में पहले सोचता है, देश-समाज के बारे में बाद में. इस लिहाज से आज एक ऐसे विज्ञान की सबसे अधिक जरूरत है जो युवाओं को राष्ट्रनिष्ठ बना सके. एक ऐसी प्रौद्योगिकी जो युवाओं को अनुशासित, नैतिक और विवेकशील बना सके. एक ऐसे साफ्टवेयर की जरूरत है जो युवाओं को देश और समाज की आवश्यकता के अनुसार ढाल सके, गढ़ सके. कहना न होगा कि आज देश को एक नए उपकरण की जरूरत है जो युवाओं को सक्षम, कुशल और योग्य बना सके. ताकि ज्येष्ठ और श्रेष्ठ युवा पिछड़े, दरकिनार कर दिए गए युवाओं को साथ लें, उनका विकास करें और उन्हें भी क्षमतावान बनाएँ. यह समय की मांग है. देश, काल और परिस्थिति के लिये आवश्यक भी. अगर ऐसा हो सका तभी सबल, सक्षम और समर्थ भारत का निर्माण हो सकेगा. तभी भारत अपनी समस्याओं से निजात पा दुनिया को समस्याहीन करेगा. तभी स्वामी विवेकानन्द का कहा साकार होगा कि - यह देखो, भारतमाता धीरे-धीरे आँखें खोल रही हैं. वह कुछ ही देर सोयी थी. उठो, उसे जगाओ और पहले की अपेक्षा और भी गौरवान्वित करके भक्तिभाव से उसे उसके चिरन्तन सिंहासन पर प्रतिष्ठित कर दो! (लेखक मीडिया एक्टिविस्ट हैं)

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