रविवार, 1 दिसंबर 2013

नक्सलियों के लिए नये स्वर्ग का निर्माण

कांग्रेस कार्यसमिति और यूपीए समन्वय समिति द्वारा अलग तेलंगाना राज्य के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेने के बाद 'पृथक तेलंगाना राज्य' का गठन तय हो गया है. कांग्रेस पार्टी के महासचिव दिग्विजय सिंह के अनुसार हैदराबाद पहले दस साल तक दोनों राज्यों की संयुक्त राजधानी रहेगा. लेकिन राज्य के बँटवारे के विरोध में भी प्रदर्शन हो रहे हैं. समर्थन और विरोध दोनों जोरों पर है. दूसरी तरफ तेलंगाना के अलग राज्य बनने की घोषणा के साथ ही अन्य छोटे राज्यों की दबी माँग भी तेज़ हो गयी है. पृथक विदर्भ, गोरखालैंड, बोडोलैंड, बुंदेलखंड, हरित प्रदेश, मिथिलांचल और पूर्वांचल आदि की मांग भी उठाने लगी है.
तेलंगाना के इतिहास पर गौर करने से स्पष्ट है कि एक पृथक राज्य बनने की राह में सबसे बड़ी रुकावट स्वयं कांग्रेस पार्टी रही है. खुद तेलंगाना के कांग्रेस भी यह स्वीकार करते हैं कि इस मामले में इंदिरा, नेहरू से बड़ी विरोधी थीं. कांग्रेस ने तेलंगाना समर्थक हर आवाज को हमेशा दबाने की कोशिश की, भले ही वह आवाज स्थानीय कांग्रेस के नेताओं ने ही क्यों न उठाई हो. कांग्रेस हर बार अलग राज्य बनाने का वादा करती रही और हर बार मुकरती रही. इस मामले में कांग्रेस तेलंगाना के लोगों और नेताओं के साथ लंबे समय से छल करती रही है. वामदल और भाजपा वैचारिक विरोधों के बावजूद तेलंगाना के समर्थक रहे हैं. भाजपा ने 1998 के चुनाव से पहले अलग तेलंगाना का वादा किया था. भाजपा ने बार-बार कहा है कि केंद्र में एनडीए की सरकार बनने पर वह तेलंगाना राज्य की स्थापना का कदम उठाएगी. वाम दलों में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को छोडकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सहित सभी दल तेलंगाना के समर्थन में हैं. उल्लेखनीय है कि शोषण से मुक्ति, जातीय और भाषाई अस्मिता तथा सांस्कृतिक पहचान के साथ ही स्थानीय संसाधनों की लूट और आर्थिक पिछड़ेपन से मुक्ति पृथक राज्यों की मांग का मुख्य आधार रहा है. राजनीतिक चेतना ने शोषण की पीड़ा और लुप्त होती अस्मिता को आवाज दी है. देश के अनेक राज्यों और जिलों में नक्सली आंदोलन का आधार भी कमोबेश यही मुद्दे रहे है. तेलंगाना के सन्दर्भ में माओवादी आंदोलन अत्यंत महत्वपूर्ण है. यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि बन्दूक के बल पर यह देश पर शासन करने का इरादा रखता है. इसके लिए बकायदा उसने एक कार्ययोजना बना रखी है और उसपर प्रभावी अमल भी कर रहा है. इंस्टीटयूट ऑफ़ कनफ्लिक्ट मेनेजमेंट की एक रिपोर्ट के अनुसार 21 सितम्बर 2004 को पीडब्लूजी और एमसीसी के औपचारिक विलय के बाद माओवादियों का प्रभाव 13 राज्यों के 156 ज़िलों में फैल चुका है. यहाँ यह भी महत्वपूर्ण है कि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) के नाम से देश में युद्धरत माओवादियों का रणनीतिक केंद्र तेलंगाना ही है. माओवादी यहीं से पशुपति से तिरुपति तक फैले अपने रेडकारिडोर को अमलीजामा पहनाना चाहते है. यह महज संयोग नहीं है कि सभी बड़े माओवादी नेता इसी तेलंगाना क्षेत्र के है. समूचे माओवादी आतंक पर उनका ही एकछत्र राज है. केंद्रीय गृहमंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार झारखंड, बंगाल, उडीसा, छात्तीसगढ़, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और आँध्रप्रदेश में फैला माओवाद आज भी इसी क्षेत्र से संचालित है. तेलंगाना के निकटवर्ती राज्य आज भी माओवादी हिंसा से सर्वाधिक प्रभावित हैं. सीपीआई (माओवादी) पोलित ब्यूरो के अधिकांश सदस्य सहित महासचिव मुपल्ला लक्ष्मण राव उर्फ गणपति और मिलिट्री कमांडर कट्टा सुदर्शन भी इसी तेलंगाना क्षेत्र के हैं. कई प्रतिवेदनों में इस बात का संकेत मिलता है कि तेलंगाना के माओवादी संगठन पर अपना वर्चस्व कायम रखना चाहते है और इस मामले में वे किसी पर भरोसा नहीं करते. तेलंगाना के माओवादी नेताओं को जातीय और क्षेत्रीय वर्चस्व से कोई समझौता स्वीकार नहीं है. कोई समर्थन करे या विरोध, माओवादी पहले से ही अलग राज्य का समर्थन करते रहे हैं. अलग तेलंगाना राज्य माओवादियों की 'नक्सली राष्ट्रवाद' के सपने को साकार करेगा. माओवादी अपने क्षेत्र विस्तार के लिए वे सारे हथकंडे अपनाते हैं जो एक आतंकवादी और साम्राज्यवादी संगठन अपनाते हैं. इसमें साम, दाम, दंड और भेद के सभी रूप होते हैं. माओवादी अपने मुखबिर बढाते हैं और दुश्मन के मुखबिर को खत्म करते है. उनके समर्थक भारतीय राज्य के सभी अंगों - विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका सहित मीडिया में भी विद्यमान हैं. सभी राजनीतिक दलों में उनके शुभचिंतक हैं. वे अपने समर्थकों को छल-बल से संसद और विधानसभाओं में भी पहुंचाते हैं. उनके समर्थक वहाँ भी हैं. आने वाले दिनों में तेलंगाना एक ऐसा राज्य हो सकता है जहां माओवाद खत्म होता हुआ दिखे, लेकिन उसका राजनैतिक प्रभुत्व बढ़ जाए. देश में वे भले ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया का विरोध करते हों, लेकिन वे तेलंगाना की विधानसभा में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर काबिज होंगे. उनकी पूरी कोशिश होगी कि वे तेलंगाना में अपनी 'लोकतांत्रिक सरकार' बनाएँ. वे जनता और उम्मीदवार को भय तहा छल-बल से मैनेज करने की पूरी कोशिश करेंगे. एक बार राज्य में शासन मिल जाने के बाद स्वाभाविक रूप से आँध्रप्रदेश में भी उनका दखल बढ़ेगा. फिर क्या यह संभव नहीं कि माओवादी तेलंगाना को रेडकारीडोर की अघोषित राजधानी बना दें. फिर यह भी संभव है कि देश के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में गुपचुप बैठे उनके समर्थक उन्हें नक्सल राष्ट्रवाद को देश में फैलाने में सक्रिय मदद करें. यह शंका अनुचित नहीं है कि आने वाले समय में तेलंगाना नक्सली राष्ट्रवाद का गर्भनाल बनेगा. गौरतलब है कि 114,800 वर्ग किलोमीटर में फैले तेलंगाना में आंध्र प्रदेश के 23 ज़िलों में से 10 ज़िले ग्रेटर हैदराबाद, रंगा रेड्डी, मेडक, नालगोंडा, महबूबनगर, वारंगल, करीमनगर, निजामाबाद, अदिलाबाद और खम्मम आते हैं. आंध्रप्रदेश की 294 में से 119 विधानसभा सीटें और 17 लोकसभा सीटें भी इस क्षेत्र में आती हैं. करीब 3.5 करोड़ आबादी वाले तेलंगाना की भाषा तेलुगु और दक्कनी उर्दू है. तेलंगाना में खनिज की प्रचुर उपलब्धता के कारण यहाँ एक बड़ा आर्थिक आधार है. इस संसाधन पर अधिकार कर माओवादी अपने विस्तारवादी अभियान को गति दे सकते है. तेलंगाना पर प्रभुत्व मिलने के साथ ही माओवादी वहाँ की राजधानी हैदराबाद में भी ताकतवर हो जायेंगे. आंध्रप्रदेश राज्य का गठन भी भाषाई आधार पर किया गया था. तब भी कम्युनिस्ट नेता कामरेड वासुपुन्यया ने अलग तेलंगाना राज्य की मांग की थी. माओवादियों ने उनके संघर्ष को आगे बढ़ाया. आज जब तेलंगाना विरोधी कांग्रेस अलग राज्य के लिए तैयार है तब सिवाय माओवादियों के साम्राज्य विस्तार 'पृथक राज्य' का निहितार्थ पूरा होता हुआ नहीं दिखा रहा है. 'विकास के लिए छोटे राज्यों' की अवधारणा असफल सिद्ध हुई है. उतराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ इसका उदाहरण है. राज्य पुनर्गठन के १० वर्षों के बाद इन राज्यों का अपेक्षित विकास नहीं हुआ है. इसके बावजूद अगर छोटे राज्यों की मांग देश के विभिन्न हिस्सों से उठ रही है तो इसके राजनैतिक कारण हो सकते है. लेकिन इतना तो तय है कि राज्यों के गठन की मांग का वहाँ की जनता और क्षेत्र के विकास से कोई सम्बन्ध नहीं है. यह पहला मुद्दा नहीं है जहाँ जनवादी और राष्ट्रवादी एक साथ दिख रहे हैं. लेकिन वाम और दक्षिण जब कभी एक साथ हों तो वह राष्ट्रहित में ही हो यह जरूरी नहीं. कांग्रेस, भाजपा और माओवादियों के समर्थन के बावजूद तेलंगाना को अलग राज्य बनाने के खतरे है, और ये खतरे राष्ट्रीय हैं. यह राज्यों के पुनर्गठन के बारे में पुनर्विचार करने का मुफीद वक्त है. इसे सिर्फ राजनीतिक ही नहीं, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास की दृष्टि से भी देखा जाना चाहिए.

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