रविवार, 1 दिसंबर 2013

8 दिसंबर तक रहस्य, चुप्पी और जीत के दावे

मध्यप्रदेश में 25 दिसंबर को सांय 5 बजे मतदान समाप्त हो गया। मतदान के बाद प्रचार और पार्टियों की सक्रिय खत्म हो गई, लेकिन जीत के दावे, मतों के रहस्य, और चुप्पी बरकरार है। दावों के साथ अनुमानों का दौर भी जारी है। यह सब कुछ 8 दिसंबर तक चलेगा। इसी दिन सभी जनमत सर्वेक्षणों, मतदानपूर्व सर्वे, पार्टियों के दावों और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुमानों की पोल भी खुल जायेगी। फिर मतदान बाद की स्थितियों के विश्लेषण, जीत का जश्न और हार के बहानों का सिलसिला भी शुरू होगा। उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश में कुल 4,64,47,767 मतदाताओं में से 72.58 प्रतिशत ने अपना मत दिया है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ने ही अंतिम समय में प्रत्याशी तय किए। इस बार के चुनाव में कमोबेश दोनों ही बड़ी पार्टियों के कार्यकर्ताओं के उत्साह में कमी देखने को मिली। राजनीतिक विश्लेषक भी यह बता रहे हैं कि चुनाव आयोग ने जिस प्रकार से मतदाता जागरूकता का अभियान चलाया उसके बाद यह अनुमान था कि मध्यप्रदेश में भी छत्तीसगढ़ की तरह 75 फीसदी से अधिक मतदान होगा। लेकिन दोनों बड़ी पार्टियों के कार्यकर्ताओं में अपेक्षाकृत कम उत्साह और सक्रियता ने मतदान के अनुमानों पर पानी फेर दिया। इस प्रकार 1998 में जहां 60.22 प्रतिशत मतदान हुआ, वहीं 2003 में 67.25 प्रतिशत और 2008 में 69.78 प्रतिशत। 2013 के विधानसभा चुनाव में मात्र 2.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी सामान्य ही मानी जायेगी। यह बढ़ोतरी भी युवा और नये मतदाओं के कारण है। राजनीतिक विश्लेषकों के द्वारा अपेक्षा और अनुमान के मुताबिक मतदान में बढ़ोतरी न होना सत्ता विरोधी भावना के बेअसर होने के तौर पर देखा जा रहा है। इसी प्रकार बढ़े हुए मतदान पर शिवराज और नरेन्द्र मोदी का प्रभाव देखा जा रहा है। कहा जा रहा है कि युवाओं में ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रति आकर्षण तो है, लेकिन शिवराज सिंह चौहान और नरेन्द्र मोदी जैसा प्रभाव नहीं। राजनीतिक दलों के सार्वजनिक दावों से अलग आंतरिक मूल्यांकन, खुफिया रिपोर्ट और विश्लेषकों के अनुमानों का गणित यह बता रहा है कि भाजपा के मतों और सीटों में कुछ कमी तो होगी, लेकिन लगभग 120 सीटों के साथ भाजपा सरकार बनाने की स्थिति में होगी। कांग्रेस के मतों और सीटों में कुछ वृद्धि हो सकती है। लेकिन कांग्रेस 100 सीटों के भीतर ही रहेगी। बाकि बचे 10-15 सीटों पर बसपा, सपा और निर्दलियों की दावेदारी रहेगी। भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर ने भी भाजपा सरकार की दावेदारी करते हुए कुछ मंत्रियों के चुनाव हारने की आशंका भी व्यक्त की है। जबकि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर ने भाजपा द्वारा पिछली बार से अधिक सीटें जीतने और सरकार बनाने का दावा किया है। उन्होंने इस आशंका को सिरे से अस्वीकार कर दिया है कि भाजपा का कोई मंत्री कड़े मुकाबले में है, या किसी पर हार का संकट है। कांग्रेस ने 130 से अधिक सीटें जीतने का दावा किया है। हालांकि 2008 में भाजपा ने दूसरी बार जीत हासिल कर सरकार का गठन किया था और कांग्रेस के मतों और सीटों में वृद्धि हुई थी। कांग्रेस का लगभग एक प्रतिशत वोट बढ़ने के साथ सीटें 38 से बढ़कर 71 हो गई। गौरतलब है कि पिछले चुनाव में जहां भाजपा के सात और कांग्रेस के 20 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई थी। मध्यप्रदेश में हर बार की तरह इस बार भी मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच ही है। लेकिन चुनावी निर्णय के बाद यह भी पता चलेगा कि भाजपा और कांग्रेस के कितने प्रत्याशियों की जमानत जब्त होती है। गौरतलब है कि 2008 में कुल 3179 प्रत्याशियों में से 2654 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई थी। इस बार विधानसभा चुनाव में मुददों पर आरोप-प्रत्यारोप और चेहरे हावी रहे। भाजपा ने शिवराज के चेहरे और सरकार की उपलब्धियों तथा कांग्रेसनीत यूपीए सरकार के घोटालों, भ्रष्टाचार और महंगाई को मुद्दा बनाने की कोशिश की थी, वहीं कांग्रेस ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह पर आरोप को ही अपना मुख्य मुददा बना दिया था। हालांकि कांग्रेस ने ज्योतिरादित्य सिंधिया का चेहरा आगे करने की कोशिश की, लेकिन वह कांग्रेस क्षत्रपों के चेहरों में ओझल हो गया। आमजनता और विश्लेषकों की माने तो मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान, नरेन्द्र मोदी और स्थानीय एन्टी-इनकम्बेंसी सबसे बड़ा मुद्दा रहा। न तो कोई लहर, न ही कोई अंडर करेंट। मतदाताओं ने विश्लेषकों के लिए भी सटीक आंकलन और अनुमान के लिए बहुत कम गुंजाईश छोड़ी है। अनिल सौमित्र भोपाल से

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