सोमवार, 13 मई 2013

सबक सीखे भाजपा

कर्नाटक विधानसभा का परिणाम आ चुका है। दलीलें चाहे जो भी हों, सच्चाई सबके सामने है। भाजपा और जनता दल सेकुलर बराबरी पर आ खड़े हुए हैं। राज्य में कांग्रेस को 121, जनता दल (एस) और भाजपा को 40-40 तथा अन्य को 21 सीट मिली है। प्रदेश में भाजपा को सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ा है। भले ही भाजपा के प्रवक्ता सार्वजनिक तौर पर इस बात को स्वीकार न करें, लेकिन वे भी इस बात को मानते हैं कि कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भाजपा की स्थिति का प्रभाव राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ना तय है। यह प्रभाव भाजपा के खिलाफ और कांग्रेस के पक्ष में है। भाजपा को सबसे अधिक नुकसान पार्टी से अलग हुए पूर्व मुख्यमंत्री येदियुररप्पा के कारण हुआ है। हालांकि इस तरह की स्थिति का सामना भाजपा पूर्व में भी कर चुकी है। लेकिन हमेशा सबक न लेने और अपने नेताओं को कमतर आंकने के कारण भाजपा को नुकसान उठाना पड़ा है। झारखंड, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और गुजरात का उदाहरण सबके सामने है। झारखंड में बाबूलाल मरांडी, उत्तरप्रदेश में कल्याण सिंह और मध्यप्रदेश में उमा भारती के कारण भाजपा को काफी हानि हुई। यह बात दीगर है कि मध्यप्रदेश और गुजरात में नुकसान इतना नहीं था कि भाजपा कांग्रेस से पीछे रह जाती। फिर भी सीटों और वोटों के मामले में 2003 की तुलना में काफी बड़ा फर्क देखने को मिला था। झारखंड और उत्तरप्रदेश में अपेक्षाकृत अधिक नुकसान हुआ। सवाल यह है कि क्या बदली हुई परिस्थितियों भाजपा कोई सबक लेगी? क्या राष्ट्रहित के मददेनजर वह अपने मतभेदों को भुलाकर एकजुटता प्रदर्शित करते हुए कांग्रेस को परास्त करने की रणनीति पर काम करेगी? क्योंकि आने वाले कुछ ही महीनों में चार बड़े महत्व के राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। राष्ट्रीय राजनीति में मनोवैज्ञानिक रूप से हार चुकी कांग्रेस को कर्नाटक चुनाव से संजीवनी मिली गई है। इस संजीवनी के सहारे वह भाजपा और अन्य विपक्षी दलों को कुछ समय तक जवाब देती रहेगी। कुछ समय के लिए भाजपा निश्चित तौर पर एक कदम पीछे आ गई है। भ्रष्टाचार, महंगाई और चीन के मुददे पर मुहं छुपाती कांग्रेस को कर्नाटक में जीत का मास्क मिल गया है। अब कांग्रेस यही मुखौटा लगाकर अपने विरोधियों का सामना करेगी। भाजपा ने दक्षिणी मुहाने पर सरकार बनाकर एक बड़ी सफलता अर्जित की थी। लेकिन नेताओं की आपसी प्रतिस्पद्र्धा और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की ओछी मानसिकता के कारण कर्नाटक में लंबे समय तक उठा-पटक चलती रही। कर्नाटक की जनता ने कांग्रेस को सबक सिखाने के लिए भाजपा को सिर-आंखों पर बैठाया था, उसी ने भाजपा को अपनी नजरों से गिरा दिया। राजनीति में, खासकर चुनावी राजनीति में नेता क्या सोचते हैं इससे अधिक यह महत्वपूर्ण है कि जनता क्या सोचती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या भाजपा नेताओं को दक्षिण में अपने एकमात्र किले के हाथ से जाने का दर्द है? क्या भाजपा के बड़े कद वाले नेता अपना मन बड़ा करने के लिए तैयार हैं? उमा भारती और कल्याण सिंह की ही तरह बाबूलाल मरांडी, येदियुररप्पा और गुजरात के नेता पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल जैसे कई नेता हैं जिन्हें भाजपा से अलग होकर लाभ तो नहीं मिला, लेकिन पार्टी को काफी नुकसान हुआ। लेकिन इससे भी बड़ी बात यह कि भाजपा के बड़े नेताओं ने हंसते-हंसते इस नुकसान को लंबे समय तक देखा। उन्हें कोई मलाल नहीं हुआ। आपसी अहं और प्रतिस्पद्र्धा के कारण उन्होंने जनता की नजरों में एक-दूसरे को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ऐसे कई अवसर आए जब भाजपा ने अपनों को छोड़ परायों को गले लगाया। भाजपा के वरिष्ठ नेता और विचारक के एन गोविन्दाचार्य भी एक ऐसा ही नाम है। जिन्हें दूसरे दल के नेता तो तवज्जो देते हैं, लेकिन भाजपा नेता ही उन्हें अपना नहीं मानते। आम धारणा तो यही है कि गोविन्दाचार्य जैसे नेता अगर भाजपा जैसे स्थापित और बड़े संगठन के माध्यम से अपना योगदान दें तो परिणाम दूरगामी और असरकारक होगा। खैर ! कर्नाटक चुनाव से एक बात तो स्पष्ट है कि कांग्रेस चाहे कुछ भी करती रहे, देशभर में उसकी पैठ है। कांग्रेस का राष्ट्रव्यापी जनाधार है। भ्रष्टाचार, महंगाई या किन्हीं और कारणों से थोड़ा-बहुत अन्तर जरूर पड़ता है, लेकिन इतना नहीं कि कांग्रेस का आधार खत्म हो जाये। देश और प्रदेश में कांग्रेस का एकछत्र राज भले न रहा हो, लेकिन वह सरकार बनाने का एक सशक्त विकल्प तो है ही। यही कारण है कि मनमोहन सिंह और राहुल-सोनिया गांधी जैसे जनाधारविहीन नेताओं के रहते भी कांग्रेस का आधार बरकरार है। ऐसे एक नहीं अनेक अवसर आए जब देश में कांग्रेस के खिलाफ जबर्दस्त माहौल देखा गया। लेकिन संगठित और सक्रिय प्रतिपक्ष न होने के कारण कांग्रेस को जनता ने बक्श दिया। कई चुनावों में भाजपा के नकारात्मक वोट कांग्रेस को मिले हैं। कर्नाटक चुनाव में भी यही हुआ। वहां जातीय प्रभाव और भाजपा के नकारात्मक मतों का धु्रवीकरण कांग्रेस के पक्ष में हो गया। भाजपा के राजनीतिक प्रबंधक असफल सिद्ध हुए। जीती हुई बाजी कांग्रेस के हाथ में दे दी। अब जबकि कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार बनना तय हो चुका है, भाजपा को सबक लेने और चेत जाने का वक्त आ गया है। अगर बड़े नेताओं ने बड़प्पन नहीं दिखाई, बिछुडे़ नेताओं को नहीं अपनाया, अपना अहं नहीं त्यागे और कार्यकर्ताओं के महत्व को नहीं समझा तो आने वाले विधानसभा और लोकसभा के चुनावों में भी ऐसा ही हश्र हो तो कोई आश्चर्य नहीं। भाजपा के लिए एक सबक यह भी है कि किसी एक नेता पर आश्रित होने की बजाए सामूहिक नेतृत्व को स्थापित करे। नरेन्द्र मोदी हों या कि शिवराज सिंह चैहान - इनके नाम पर हवाई किले बनाने की बजाए मध्यम दर्जे के नेताओं को भी अग्रिम पंक्ति में लाने की कवायद जरूरी है। संगठन को किसी भी कीमत पर सत्ता का अनुचर बनने से अगर भाजपा रोक पाई तभी वह जनता और कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं पर खरी हो सकती है। भाजपा की सफलता के लिए यह जरूरी है कि वह समन्वय और संवाद को भाषणों और किताबों से परे जमीन पर उतारने की दिशा में प्रयास करे। राजनीति में मीडिया और प्रचार की भूमिका तो है, लेकिन सीमित है। सिर्फ इसी के भरोसे न तो नरेन्द्र मोदी और न ही शिवराज देश के नेता बन सकते हैं। भाजपा में देश का नेता बनने वाले तो बहुत हैं, लेकिन बनाने वालों की कमी हो गई है। भाजपा में ऐसे नेताओं को भी आगे आने की जरूरत है जो पर्दे के पीछे रहकर अपने नेताओं को देश का नेता बनाएं। इस काम में निजी एजेंसियों से अधिक संगठन की भूमिका है। देश का नेता बनाने में निजी एजेंसियों और सत्ता की भूमिका जितनी बढ़ती जायेगी भाजपा पीछे और कांग्रेस आगे बढ़ती जायेगी। भाजपा के लिए कर्नाटक चुनाव का यह भी एक सबक है। कर्नाटक चुनाव ने आने वाले चुनावों के लिए कांग्रेस को नहीं,भाजपा को कई सबक दिए हैं। सिर्फ पार्टी हित में ही नहीं बल्कि देश हित में भी यह जरूरी है कि भाजपा सबक सीखे और चेते।

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