शनिवार, 12 जनवरी 2013

प्रवेश परीक्षा के मुद्दे पर निजी मेडिकल कालेजों और एमसीआई के बीच तकरार



सुप्रीम कोर्ट ने निजी कालेजों, विश्वविद्यालयों और राज्य सरकारों को मेडिकल की पोस्ट ग्रेजुएट पाठ्यक्रमों के लिए अपने प्रवेश परीक्षा आयोजित करने की अंतरिम अनुमति दी है। एमबीबीएस औऱ बीडीएस कोर्सेज़ के लिए सरकार द्वारा कराये जाने वाले राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षा पर आपत्ति कर रही प्राइवेट मेडिकल कालेजों को सुप्रीम कोर्ट ने खुद की प्रवेश परीक्षा संचालित करने की अनुमति दी  है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इस मामले पर अगले आदेश आने तक प्रवेश परीक्षा के परिणाम न घोषित किए जाएं। गत 13 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के बाद ये फैसला दिया। कोर्ट इस मामले की अगली सुनवाई 15 से 17 जनवरी को करेगा।

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति अल्तमस कबीर न्यायामूर्ति एस एस निज्झर और जे छेलेमश्वर की तीन सदस्यीय बेंच ने अपने अंतरिम आदेश में तकरीबन 76 प्राइवेट मेडिकल कालेजों जिसमें से कई धार्मिक औऱ भाषायी अल्पसंख्यक कालेज हैं को ये राहत देते हुए कहा है कि 18 जनवरी तक ये कालेज अपनी प्रवेश परीक्षा के परिणाम घोषित न करें जब तक की प्राइवेट कालेजों के इस समूह की आपत्तियों पर बेंच फैसला न दे। कोर्ट के इस अंतरिम फैसले को क्रिश्चियन मेडिकल कालेज वेल्लोर और उन तमाम मेडिकल कालेजों के लिए एक बड़ी राहत माना जा रहा है जिन्होंने प्रवेश परीक्षाओं के लिए तारीखों का एलान कर दिया था। कुछ कालेजों ने अभ्यर्थियों से आवेदन भी मंगवा लिए थे। क्रिसमस की आगामी छुट्टियों के मद्देनज़र निजी संस्थानों ने कोर्ट से प्रार्थना किया था कि कालेजों और छात्रों के हितों को नुकसान न पहुंचे इसके लिए सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर अंतरिम निर्देश दे।

मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया ने वर्ष 2013 -14 के लिए राष्ट्रीय पात्रता प्रवेश परीक्षा ( नेशनल इलिजिब्लिटी इंट्रेस टेस्टएनईईटी) के आयोजन के लिए हाल ही में अधिसूचना जारी की थी। कई राज्यों ने पोस्ट ग्रेजुएट पाठ्यक्रमों में नामांकन के लिए एनईईटी का विरोध किया है क्योंकि इससे प्राइवेट कालेज और विश्वविद्यालय अपनी तरफ से ली जाने वाली प्रवेश परीक्षाओं का आयोजन नहीं कर सकेंगे। आंध्र प्रदेश सहित कई राज्यों ने इस राष्ट्रीय प्रवेश पात्रता परीक्षा का विरोध करते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरबाजा खटखटाते हुए इससे छूट पाने के लिए याचिका दायर की। इस प्रवेश परीक्षा से संबंद्ध और भी कई मामले विभिन्न उच्च न्यायालयों में दायर किए गए जिसे मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया के अनुरोध के बाद सुप्रीम कोर्ट स्थानांतरित कर लिया गया।   निजी मेडिकल कालेजों की तरफ से एनईईटी का हिस्सा बनने का इस वजह से भी विरोध किया गया कि अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों को इसके लिए संवैधानिक छूट प्राप्त है।

प्रवेश पात्रता परीक्षा पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया , निजी मेडिकल कालेज और राज्य सरकारों को इस मामले से संबंधित अपना पक्ष लिखित रूप में सात जनवरी 2013 से पहले सुप्रीम कोर्ट के सामने रखने के निर्देश दिए हैं। विभिन्न राज्यों ने राष्ट्रीय प्रवेश पात्रता परीक्षा का विरोध करते हुए ये दलील दी है कि उनके राज्य में ग्रामीण इलाकों में क्षेत्रीय भाषा में इंटरमीडिएड की पढ़ाई कर रहे छात्रों को एनईईटी में नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसके साथ ही ये भी कहा गया है कि चूंकि सभी राज्यों में इंटरमीडिएट के पाठ्यक्रम में एकरूपता नहीं हैइसलिए छात्रों को एक राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षा में कठिनाइयां आ सकती हैं। 
 हालांकि एमसीआई का पक्ष रख रहे वकील निधेश गुप्ता ने निजी मेडिकल कालेजों द्वारा प्रवेश परीक्षा आयोजित करने की मांग का विरोध करते हुए कहा गया कि इससे छात्रों को अनावश्यक उत्पीड़न का शिकार होना पड़ सकता है। और छात्रों को ऐसी परेशानी से बचाने के लिए ही राष्ट्रीय पात्रता कम प्रवेश परीक्षा का संधान किया गया था। एमसीआई की ओर से बेंच के सामने ये तर्क भी दिया गया कि अगर जनवरी तक भी फैसला आता है तो भी प्राइवेट कालेजों के पास फरवरी में प्रवेश परीक्षा आयोजित कराने का विकल्प है। बेंच ने बीच का रास्ता निकालते हुए प्राइवेट कालेजों और केंद्र सरकार दोनों को प्रवॆश परीक्षा आयोजित करने की अनुमति दे दी। साथ ही ये निर्देश भी दिया कि परिणाम न घोषित किए जाएं जब तक कि याचिका पर पुरी सुनवाई न हो जाए। कोर्ट को अब ये तय करना है कि क्या प्राइवेट कालेज एनईईटी के परिणाम से बाध्य हैं या नहीं।
हालांकि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व के अपने फैसले में अखिल भारतीय स्तर पर कामन एंट्रेस टेस्ट कराने की बात कही है। एमसीआई के रिटेलर अमीत कुमार के मुताबिक पी ए इनामदार बनाम भारत सरकार के 2005 के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यीय पीठ ने ये कहा था कि पूरे देश के लिए एक कामन एंट्रेस टेस्ट होना चाहिए जो किसी एक एजेंसी के नियमन में किया जाना चाहिए। अमित कुमार मानते हैं कि इस दिशा में सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम निर्देश को सकारात्मक पहल के रूप में देखा जाना चाहिए। लेकिन जब देश में मेडिकल शिक्षा का नियमन करने वाली संस्था मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया ने निजी कालेजों के लिए कामन एंट्रेस टेस्ट कराने की शुरूआत की तो फिर इस पर बवाल क्यों जानकार मानते हैं कि इसके पीछे मेडिकल शिक्षा में चल रही भ्रष्ट तंत्र का बहुत बड़ा हाथ है जिसमें न केवल निजी कालेज बल्कि एमसीआई भी बढ़ावा देती रही है। एक अनुमान के मुताबिक देश भर में फैले 150 से ज्यादा निजी मेडिकल कालेजों और डिम्ड विश्वविद्यालयों में एमबीबीएस की मौजूदा चालीस हजार से भी अधिक सीटों पर डोनेशन के जरिए खड़े भ्रष्टाचार के तंत्र में सालाना पंद्रह हज़ार करोड़ रूपए के वारे न्यारे किए जाते हैं। इसमें दस हजार से भी अधिक पीजी सीट पर जहां रेडियोलाजी जैसी लोकप्रिय विभागों में प्रति सीट एक करोड़ रूपए से भी अधिक का रेट फिक्स हैका सालाना लेन देन का हिसाब शामिल नहीं है। ज़ाहिर है ये सब देश में डाक्टर बनाने के नाम पर होता है। दिल्ली हाई कोर्ट ने हरीश भल्ला बनाम भारत सरकार के मामले में 23 नवंवर 2001 को निजी मेडिकल सीटों पर डोनेशन के जरिए एडमिशन और निजी मेडिकल कालेजों की मान्यता को लेकर एमसीआई में चल रहे पैसे के खुले खेल पर पहली बार कहा कि एमसीआई भ्रष्टाचार का अड्डा बन गई है। मामला सिर्फ कोर्ट के इस बयान तक ही सीमित नहीं रहा , कोर्ट ने एमसीआई में धांधली की जांच के लिए सीबीआई को निर्देश दिए और एमसीआई के तत्कालीन अध्यक्ष केतन देसाई को उनकी संदिग्ध भूमिका के लिए उनके पद से हटाने के आदेश दिए। इस पूरे मामले में केंद्र सरकार की भूमिका पर भी सवालिया निशान लगे और उन आरोपों को बल मिला कि पैसे के इस खुले खेल में सबकी साझेदारी है। केतन देसाई को उनके पद से हटाने के ठीक बाद केंद्र सरकार ने कोर्ट में हलफनामा देकर ये कहा कि केतन देसाई को उनके पद से हटाया जाना ठीक नहीं था। हालांकि केतन देसाई पद से हटकर भी एमसीआई पर साए की तरह मंडराते रहे। पहले देसाई की कोर्स करिकुलम कमिटी के अध्यक्ष के तौर पर वापसी हुई और फिर सुप्रीम कोर्ट से 2009 में चुनाव की अनुमति मिलने के बाद वो निर्विरोध फिर से एमसीआई के अध्यक्ष पद पर आसीन हुए। हालांकि बाद में फिर 2010 में सीबीआई की एक छापेमारी में एडमिशन के नाम पर दो करोड़ की घूस लेने के आरोप में केतन देसाई सीबीआई के हत्थे चढ़ा। केतन देसाई की कारगुजारियों से संबंधित सौ से भी ज्यादा शिकायतें सीबीआई ने एमसीआई को सौंपे। इसके अलावा कैसे केतन देसाई के जमाने में निजी मेडिकल कालेजों को मान्यता देने और इंश्पेक्सन का भय दिखानाऔर एमसीआई की बैठकों के एजेंडे को अपने एजेंडे में बदलने का खुला खेल फर्रूखाबादी चलता रहा , उससे सीबीआई और कोर्ट भी वाकिफ है। बहरहाल आनन फानन में सरकार की ओर अध्यादेश लाकर केतन देसाई को अध्यक्ष पद से हटाया गया और एमसीआई को एक छह सदस्यीय कमिटी के हवाले कर दिया गया।

यहीं से शुरूआत हुई कि आखिर काले धन के इस साम्राज्य को कैसे तोड़ा जाए और कैसे मेडिकल शिक्षा को डोनेशन के दुश्चक्र से मुक्ति दिलाई जाए। इसी पृष्ठभूमि में कमिटी के चैयरमैन डा एस के सरीन और गवर्नर डा साल्हान और ओएसडी डा प्रेम कुमार के प्रयासों से एमसीआई के बोर्ड आफ गर्वनर ने पहली बार कामन एंट्रेस टेस्ट के प्रस्ताव को परवान चढ़ाने की कोशिश की। हालांकि खुद केंद्र सरकार की तरफ से  इस प्रस्ताव के रास्ते में रोड़े अटकाने की कई कोशिशें हुईं। पहले दो अक्टूबर 2010 को तत्कालीन स्वास्थ्य सचिव के सुजाता राव ने एमसीआई की गर्वनिंग बाडी को सुधार के रास्ते पर आगे बढ़ने से पहले सरकार की स्वीकृति जरूरी है का डर दिखाया। के सुजाता राव द्वारा एमसीआई के चैयरमैन एस के सरीन को लिखा गए उस पत्र की कापी जिसमें सुजाता राव सुधार के मुद्दे पर सरकार की स्वीकृति की याद दिलाती है सरीन कोऔर ये भी कहती हैं कि याद रखिए सरकार केवल रबर स्टांप नहीं है। ऐसा ही एक दूसरा पत्र तीन जनवरी 2011 को केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के एक उप सचिव  सुबे सिंह के अधोहस्ताक्षरी से एमसीआई के अध्यक्ष को भेजा जाता है जिसमें साफ तौर पर लिखा जाता है कि सरकार की अनुमति के बगैर आखिर कैसे एमसीआई कामन एंट्रेस टेस्ट कराने की अधिसूचना जारी कर सकती है। पत्र में संबंधित अधिसूचना को तुरंत वापिस लेने का निर्देश एमसीआई को दिया जाता है।

एमसीआई की कारगुजारियों को करीब से देखने वाले कई जानकार मानते हैं कि इसी पृष्टभूमि में राष्ट्रीय स्तर पर एक पात्रता प्रवेश परीक्षा का विरोध हो रहा है। नाम न छापे जाने की शर्त पर  बातचीत में एमसीआई के कई पूर्व और वर्तमान अधिकारियों ने बताया कि निजी मेडिकल कालेजों और सरकार की तरफ से इसके विरोध के पीछे की वजह भी डोनेशन के खुले खेल को जारी रखने का स्वार्थ ही है। हालांकि वो भी ये मानते हैं कि इससे भ्रष्टाचार के पूरे खेल पर पूरे हद तक न सही लेकिन बहुत हद तक काबू पाया जा सकेगा। निजी मेडिकल कालेजों की ओर से स्वायत्ता की दलील को ये जानकार डोनेशन के नाम पर पैसे लेते रहने का सिस्टम जिंदा रहेइसका बहाना मानते हैं । उनका कहना है कि अगर एमसीआई अपने खर्च पर देश भर के निजी मेडिकल कालेजों के लिए मेरिट लिस्ट तैयार करती है तो उन्हें तो सहर्ष इसे स्वीकार करना चाहिए। आगे कहते हैं कि इससे हरेक मेडिकल कालेज या राज्य सरकार को अपने तरफ से आयोजित किए जाने वाले प्रवेश परीक्षा में होने वाले खर्च की भी बचत होगी। निजी मेडिकल कालेजों की ओर से दिए जा रहे इस दलील को की इससे अल्पसंख्यक चरित्र वाले संस्थानों को नुकसान होगा , उनका कहना है कि मेरिट लिस्ट से अपने अपने हिसाब के अल्पसंख्यक अभ्यर्थी चुन लेंउन कालेजों का ये संकट भी दूर हो जाएगा। जानकार मानते हैं कि इससे छात्रों को भी सुविधा होगी। फिलहाल छात्रों को कम से कम दो तीन दर्जन अलग अलग प्रवेश परीक्षाएं देनी पढ़ती हैं। अलग अलग पाठ्यक्रम के संकट का तर्क को कुछ हद तक यानि अंडर ग्रेजुएट कोर्सेज या एमबीबीएस के लिए तो ये लोग सही मानते हैं लेकिन पोस्ट ग्रेजुएट कोर्सेज के लिए इस तर्क को भी ये खारिज करते हुए कहते हैं कि पूरे देश की सभी मेडिकल कालेजों में एमसीआई द्वारा तय की गई पाठ्यक्रम के मुताबिक ही एमबीबीएस की पढ़ाई होती है। लिहाजा पीजी कोर्सेज के लिए एक प्रवेश परीक्षा नहीं होने देने के लिए ये तर्क कहीं से भी उचित नहीं है।

राष्ट्रीय स्तर पर एक पात्रता एवं प्रवेश परीक्षा का तर्क देने वाले मानते हैं कि सिर्फ निजी मेडिकल कालेज संचालक ही नहीं राजनीतिज्ञों की भी इसको लेकर चिंताएं सिर्फ पैसे की माया है। उनका मानना है कि वर्तमान व्यवस्था का समर्थन करना सिर्फ डाक्टरी के पेशे में प्रवेश के पिछले दरबाजे को खोले रखने की कबायद है।

दूसरी तरफ एमसीआई के अतीत को देखते हुए जानकार ये भी मानते हैं कि एनईईटी खुद लूटतंत्र का नया पैमाना खड़ा न कर दे,इसकी क्या गारंटी है। प्रवेश परीक्षा की नियमन के लिए कौन सी एजेंसी जिम्मेदार होगी। विजिलेंस की क्या व्यवस्था होगी। सिलेबस औऱ पूछे जाने वाले प्रश्नों को लेकर क्या मापदंड होगा और उसकी वस्तुनिष्ठता कैसे सुनिश्चित की जाएगी। इन सवालों का जबाव अब भी एमसीआई और परीक्षा लेने वाली एजेंसी को देना होगा।

ऐसे में डाक्टरी पेशे से जुड़े हर व्यक्ति को बेसब्री से इंतजार है 18 जनवरी का जब सुप्रीम कोर्ट एक बेहद अहम और संवेदनशील मसले पर पक्ष और विपक्ष के तर्कों को सुनकर एक एतिहासिक फैसला सुनाएगी।

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