मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

सैन्य अधिकारियों के चयन में धांधली पर उठते सवाल

भारतीय सेना , देश की गौरव का प्रतीक। आज भी जब देश के राजनीतिक नेतृत्व और नौकरशाही को लेकर आम आदमी के मन में संशय घर कर चुका है। भारतीय सेना की गौरवमयी परंपराओं के प्रति उसी आम आदमी के मन में एक प्रतिष्ठा है। यही भारतीय सेना एक तरफ अधिकारियों की कमी का सामना कर रही है तो दूसरी तरफ सिविल पेशेवरों को सेना से जोड़ने के लिए जो योजनाएं बनी उसमें बहाली के दौरान सेना के उच्चाधिकारी जम कर मनमानी कर रहे हैं। लोकस्वामी/ न्यूज़लिक्स को मिले दस्तावेजों के मुताबिक टेक्निक्ल ग्रेजुएट कोर्स से लेकर मिलिट्री नर्सिंग सर्विस , युनिवर्सिटी इंट्री स्कीम और आर्म्ड मेडिकल कार्प्स के जरिए कमिशंड रैंक के प्रोफेश्नल्स को लेने के लिए बनाई गई योजनाओं में पेशेवरों को मेडिकल चेकअप में फीट और अनफीट करके न केवल नियमों को अपनी सुविधा के मुताबिक तोड़ा मरोड़ा जा रहा है बल्कि हमारे सूत्र यहां तक दावा कर रहे हैं कि इस तरह मनमाने तरीके से काम करने के पीछे सेना के उच्चाधिकारियों का काकस है जो इन योजनाओं के जरिए अपने रिश्तेदारों को कमिशनिंग दिलाते हैं जो कई मामलों में सच भी है। 

कई मामलों में एक बार नहीं कई बार रिव्यू मेडिकल बोर्ड बिठाया जाता है, उसकी सिफारिश को भी चुनौती दी जाती है, बदला जाता है और अभ्यर्थियों को ज्वाइनिंग दी जाती है। कई मामलों में मेडिकल जांच में फीट अभ्यर्थी को मेडिकल तौर पर चुस्त दुरस्त बताए जाने के बाद ज्वाइनिंग के वक्त दुबारा मेडिकल बोर्ड बनाकर अनफिट घोषित कराकर ज्वाइन करने से रोक दिया जाता है। न्यूजलिक्स / लोकस्वामी को मिले दस्तावेजों में से एक मामले में तो नियमों की धज्जियां उडाते हुए टेक्निक्ल ग्रेजुएट कोर्स -115 के एक अभ्यर्थी सचिन कश्यप को जिसे मेडिकल बोर्ड में अनफिट करार दिया जाता है, अपील मेडिकल बोर्ड में भी इस फैसले को बरकरार रखा जाता है। फिर ये अभ्यर्थी रिव्यु मेडिकल बोर्ड में जाता है। मजे की बात ये कि रिव्यू मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट का इंतजार किये बना ही टेलिफोन पर ही अभ्यर्थी के फीट होने की जानकारी ली जाती है, और उन्हें ज्वाइन करा लिया जाता है। हालांकि बाद में रिव्यू मेडिकल बोर्ड उसे अनफीट करार देता है। हद तो तब होती है जब कानूनी पचड़े में फंसने से बचने की सलाह देते हुए सेना के उच्च अधिकारी उस अभ्यर्थी के उपर एक बार फिर रिव्यू मेडिकल बोर्ड बिठाने की उदारता दिखाते हैं और अंतत उसे ज्वाइनिंग दे देते हैं। पूरे मामले में अंतिम दफे जो मेडिकल रिव्यू बोर्ड बैठता है उसमें अध्यक्ष सहित दो सदस्य से पहले आएमबी से लिए जाते हैं, लेकिन एक सदस्य को बदल दिया जाता है और अंतत सचिन कश्यप टेक्निक्ल ग्रेजुएट कोर्स के लिए अंतिम तौर पर चयनित कर लिए जाते हैं। 


अब दूसरा मामला देखिए साहिल बेनीवाल का जो भारतीय सेना के ऐसे ही एक योजना युनिवर्सिटी इंट्री स्कीम के जरिए भारतीय सेना में अधिकारी बनने के लिए लिखित और मौखिक परीक्षा पास करके मेडिकल जांच परीक्षा तक पहुँचते हैं। साहिल बेनिवाल का परीक्षा क्रमांक 625829, UES ENTRY Candidate है। मेडिकल परीक्षा में बेनिवाल को हार्निया की वजह से मेडिकल तौर पर अनफिट करार दिया जाता है। बेनिवाल सेना से रिव्यू मेडिकल बोर्ड बिठाने की मांग करता है जिसे सेना के स्वास्थ्य महानिदेशक द्वारा यह कह कर अस्वीकार कर दिया जाता है कि डीजीएएफएमएस के अनुमोदन के बाद रिव्यू मेडिकल बोर्ड का जो परीक्षण है वो अंतिम है जिसके बाद फिर किसी रिव्यू मेडिकल बोर्ड की गुंजाइश नहीं रह जाती है। पत्रांक 76054/comp/DGMS-5A। हालांकि बाद में न केवल इस मामले में बल्कि पेशेवरों को भारतीय सेना में शामिल किए जाने को लेकर आयोजित किए जाने कई और योजनाओँ में सफल अभ्यर्थियों के मामले में भी नहीं माना जाता है। बेनिवाल के ही मामले में पुराने पत्र में बताए गए नियम को मनमाने तरीके से बदलते हुए फीट करार देकर नियुक्ति दे दी जाती है। पत्रांक 76064/DGMS-5A । न्यूजलिक्स / लोकस्वामी को मिली जानकारी के मुताबिक बेनिवाल के मामले में उसकी नियुक्ति के पीछे ब्रिगेडियर रैंक के उनके रिश्तेदारों का दबाव भी काम कर रहा था।

न्यूज़लिक्स / लोकस्वामी को मिले दस्तावेजों में से तीसरा मामला और भी मजेदार है जिसमें  टेक्निक्ल इंट्री स्कीम के एक अभ्यर्थी पंकज मेहरा जो की स्वास्थ्य परीक्षण में अनफीट करार दिये गये। बाद में रिव्यू मेडिकल बोर्ड बिठाने की दरख्वास्त को डीजीएएफएमएस की तरफ से ठुकरा दी जाती है ( पत्रांक 76064/DGMS - 5A )। लेकिन फिर आनन फानन में रिव्यू मेडिकल बोर्ड स्वीकार कर उन्हें मेडिकली फीट घोषित कर नियुक्ति के योग्य बना दिया जाता है। 


दरअसल इन सारे मामले में नियुक्ति को लेकर बनाए गए सेना के ही नियम कानूनों की धज्जियां उड़ाई गई। सेना भवन के हमारे सूत्र बताते हैं कि भर्ती के लिए पहुंचे अभ्यर्थी के मेडिकल जांच में एक बार अनफिट होने के बाद अभ्यर्थी स्पेशल मेडिकल बोर्ड यानि एसएमबी में सात दिन के अंदर अंदर अपील कर सकता है। वहां भी अनफिट होने के बाद अभ्यर्थी अपील मेडिकल बोर्ड यानि एएमबी में अपील करता है। 42 दिन के भीतर एएमबी के सामने पहुंचना होता है। इसके बाद अंतिम विकल्प के तौर पर अभ्यर्थी के पास आरएमबी रिव्यू मेडिकल बोर्ड का विकल्प होता है जो पूरी तरह से प्राधिकरण के विवेक पर निर्भर करता है। लेकिन आरएमबी के पास अपील पर जाने के लिए एक दिन के अंदर दरख्वास्त देनी होती है। रेग्युलेशन फार मेडिकल सर्विस आफ द आर्म्ड फोर्सेज यानि आरएमएसएएफ के पारा 482 के मुताबिक रिव्यू मेडिकल बोर्ड यानि आरएमबी का फैसला अंतिम होता है और उसको किसी भी कीमत पर नहीं बदला जा सकता है।
जबकि इन सभी मामले में इन नियमों का पालन किया गया हो , ऐसा शायद ही लगता है। ऐसे में सेना में नियुक्ति के मामलों के जानकार दिल्ली उच्च न्यायालय के वरिष्ठ वकील ओ पी सक्सेना कहते हैं कि इन सभी मामलों में न केवल सेना की नियुक्ति संबंधी नियमों को तोड़ा मरोड़ा गया और मनमाने तरीके से उसका उपयोग किया गया बल्कि भारतीय संविधान की अनुच्छेद 14 के जरिए हर व्यक्ति को मिले समता के अधिकार का भी ये सरासर उल्लंघन है। जाहिर है गोपनीयता कानून का हवाला देते हुए ये मामले सेना की फाइलों में ही दम तोड़ जाते हैं , लेकिन क्या ये भारतीय सेना की गौरवमयी परंपरा पर एक दाग की तरह नहीं है। सक्सेना आगे कहते हैं कि ऐसे मामले में जहाँ मेडिकल बोर्ड और अपील मेडिकल बोर्ड और रिव्यू मेडिकल बोर्ड के बीच विरोधाभास की स्थिति बनती है तो उन मामलों को सिविल मेडिकल बोर्ड में जांच के लिए भेजा जाना चाहिए ताकि चयन में किसी भी तरह की पूर्वाग्रह से बचा जा सके। 

ज़ाहिर है सेना की नियुक्ति के दौरान स्वास्थ्य परीक्षण के नाम पर धांधली के आरोप अपने आप में गंभीर मामला है। देश की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े इन मामलों को कही न कहीं सेना को और सरकार को गंभीरता से लेने की जरूरत है ताकि किसी भी अभ्यर्थी के साथ इस तरह मनमाने तरीके से व्यवहार न किया जा सके। साथ ही एक ऐसी प्रक्रिया विकसित की जा सके जो पूरी तरह से पारदर्शी हो।
( पाक्षिक पत्रिका लोकस्वामी से साभार)

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