मंगलवार, 10 मई 2011

मध्यप्रदेश में बस्तर बनाने की कवायद


मध्यप्रदेश में माओवादी आतंक के बारे में अब सनसनीखेज खुलासे हो रहे हैं। प्रदेश की राजधानी भोपाल में न सिर्फ नक्सली पर्चे और साहित्य बरामद हुए हैं, बल्कि हथियारों का कारखाना भी पकड़ा जा चुका है। मध्यप्रदेश का एक बड़ा भू-भाग छत्तीसगढ़ की सीमा से लगा हुआ है। नक्सली पहले भी बड़े वारदातों को अंजाम देने से पहले मध्यप्रदेश को अपने पनाहगाह के रुप में इस्तेमाल करते रहे हैं। मध्यप्रदेश अब तक नक्सलियों के लिए पनाहगाह और शरणस्थली के रूप में ही इस्तेमाल हो रहा था, लेकिन इस मामले में अब नया बदलाव हुआ है।

छत्तीसगढ़ और बिहार-झारखंड के नक्सली अब मध्यप्रदेश को ‘आॅपरेशनल एरिया’ के रूप में देख रहे हैं। पिछले दिनों बालाघाट में नक्सलियों ने इसका इसका आगाज भी कर दिया है। नक्सलियों ने ‘नक्सल विरोधी अभियान’ में लगे पुलिस के जवानों पर घात लगाकर हमला कर दिया और इसमें में पुलिस का जवान शहीद भी हो गया था।

अभी छत्तीसगढ़ ओर बिहार-झारखंड के हथियारबंद नक्सलियों ने सीधी-सिंगरौली क्षेत्र में अपनी आमद दे दी है। केन्द्र और राज्य की खुफिया एजेंसियों ने इस बाबत राज्य सरकार को सचेत भी कर दिया है। लेकिन मध्यप्रदेश सरकार की नक्सल विरोधी नीति या योजना के बारे में किसी को कुछ भी पता नहीं हैं। केन्द्रीय गृहमंत्री नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक में अपनी चिंता व्यक्त करते रहे हैं, लेकिन उनकी ये चिंता राज्य सरकारों को चिंतित नहीं करती। हां राज्य की सरकार को नक्सल विरोधी अभियान के लिए विशेष पैकेज की दरकार जरुर रहती है।

मध्यप्रदेश पुलिस ने माओवादी चुनौतियों से निपटने के लिए नये थानों का प्रस्ताव देकर अपना पल्ला झाड़ लिया है। बालाघाट, मंडला, डिंडोरी, शहडोल और अनूपपुर तो पहले से ही नक्सल प्रभावित रहा है। अब नक्सलियों ने सतना-रीवा और सीधी-सिंगरौली की ओर अपना रूख किया है। पिछले दिनों सीधी-सिंगरौली क्षेत्र में भी नक्सलियों के ‘मिलिट्री दलम’ के हथियारबंद दस्ते देखे गए हैं। वहां की पुलिस पहले से ही बदइंतजामी का शिकार है। नक्सलियों की दस्तक ने उनकी चिंता और बढ़ा दी है। अब वे आम जनता की सुरक्षा की बजाए अपनी सुरक्षा के लिए अधिक चिंतित हो गए हैं। पुलिस प्रशासन और नागरिक प्रशासन में विश्वास और तालमेल की कमी हैं। सरकार की विेकास योजनाएं अभी भी नक्सली विस्तार को रोक पाने में सफल नहीं हो पायी है। नक्सलियों के स्थानीय दलम से प्रशासन की संाठ-गांठ की चर्चाएं भी होने लगी है। पुलिस और खुफिया विभाग के आला अधिकारी और विशेषज्ञ इस बात की थाह ले रहे हैं कि क्या कारण है कि नक्सलियों के निशाने पर पुलिस और अद्र्धसैनिक बल ही होते हैं। नागरिक प्रशासन के लोग नक्सली खतरे की जद से बाहर कैसे हैं। खुफिया एजेंसियो ने पिछले दिनों बालाघाट के एक आला अधिकारी को संदेह के घेरे में लिया। इस अधिकारी पर नक्सलियों को लेवी देने का संदेह है। इन स्थितियों में पुलिस का मनोबल कमजोर हो रहा है। प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चैहान नये मंत्रालय, नये जिले और नये तहसील बनाने की घोषणा तो कर रहे हैं, लकिन नये थानों का गठन और पुलिस आधुनिकीकरण की प्रक्रिया काग़जों में ही दौड़ लगा रही है। वाम आतंक के संदर्भ में क्या सरकार ‘‘सहिष्णुता और धैर्य की चाबी’’ का इस्तेमाल कर रही है?

राज्य सरकार इस इस बात पर तो संतोष कर सकती है कि जितने भी बड़े नक्सली हादसे हुए हैं वे सभी दूसरे राज्यों में। सरकार इस बात पर भी अपनी पीठ थपथपा सकती है कि उसकी पुलिस ने राजधानी भोपाल में माओवादियों के केन्द्रीय तकनीकी समिति के सदस्य समेत 5 हार्डकोर नक्सलियों को गिरफ्तार किया और उनके असलहा कारखाने का भंडाफोड़ किया। लेकिन सरकार अपनी ही पुलिस की चिंताओं को कबतक नजरंदाज कर सकती है। वाम आतंक के जानकारों का मानना है कि माओवादियों ने एक खास रणनीति के तहत मध्यप्रदेश में बडे हादसों को अंजाम नहीं दिया है। वे अपने ‘रेड कॉरिडोर’ के निर्माण और विस्तार में मध्यप्रदेश का उपयोग सुरक्षित क्षेत्र के रूप में करते रहे हैं। इसी दौरान माओवादियों ने मध्यप्रदेश में अपने समर्थकों की एक बड़ी फौज खड़ी कर ली। मध्यप्रदेश में बड़ी संख्या में एनजीओ, मानवाधिकार संगठन और बुद्धिजीवियों की जमात इस माओवादी अभियान का समर्थन करती है और उसे सहयोग देती है।

मध्यप्रदेश सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि केन्द्र सरकार ने जिन राज्यों को गंभीर नक्सल प्रभावित माना है उनमें मध्यप्रदेश भी है। सरकार को यह भी सुध लेनी चाहिए कि अधिक बडे नक्सली हादसे पुराने मध्यप्रदेश और वर्तमान पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ में ही हुए हैं। संभव है किसी भी दिन नक्सलियों ने अपनी रणनीति बदली और किसी बड़े हादसे को अंजाम दिया।

नक्सलियों के सर्वोच्च नेता गणपति ने अपने बयान में भले ही पश्चिम बंगाल के ‘‘लालगढ़’’ और उड़ीसा के ‘‘नारायणपट्टन’’ को माओवादी ‘गुरिल्ला जोन’ बनाने का दावा किया हो लेकिन यह भी गौरतलब है कि माओवादियों ने मध्यप्रदेश के बड़े हिस्से को अपने आॅपरेशन एरिया के लिए चुना है। छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में भले ही माओवादियों का पूरा नियंत्रण न हो और वे केन्द्रीय अद्र्धसैनिक बलों के दबाव में हों, लेकिन यह भी सच है कि बस्तर में छत्तीसगढ़ सरकार का भी कोई नियंत्रण नहीं है। सरकार चाहे कितनी भी कोशिश कर ले वहां विकास कार्यक्रमों को संचालित नहीं कर पा रही है। मनरेगा और अन्य विकास कार्यक्रमों का लाभ आम लोगों से अधिक नक्सलियों को मिल रहा है। यह कहना शायद अतिशयोक्ति नहीं होगा कि माओवादी रणनीतिकार मध्यप्रदेश में भी एक ‘बस्तर’ चाहते है। वे इसी रणनीति के तहत कार्य कर रहे हैं। सीधी-सिंगरौली क्षेत्र में माओवादियों ने खदानों और क्रेशर के खिलाफ अभियान छेड़ रखा है। खदान मालिक या तो माओवादियों से लेन-देन के आधार पर तालमेल कर रहे हैं, या फिर वे भयाक्रांत हैं। कई खदान ठेकेदारों ने अपना कारोबार समेटने का मन बना लिया है। नक्सलियों के इस अभियान को इस क्षेत्र में आम जनता का खासा समर्थन भी मिल रहा है। माओवादियों ने आने वाली स्थितियों के मद्देनज़र अभी से अपनी तैयारी शुरु कर दी है। अद्र्धसैनिक बलों के दबाव के कारण छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ से नक्सलियों के पांव उखड़ने की संभावना है। इस स्थिति को भांपकर माओवादी रणनीतिकारों ने छत्तीसगढ़ से मध्यप्रदेश की ओर ‘‘रणनीतिक निकासी मार्ग’ का विकास शुरु कर दिया है ताकि अबूझमाड़ छोड़ने की आपात स्थिति में वे सुरक्षित निकासी सुनिश्चित कर सकें। इसके लिए उन्होंने पूर्व विदर्भ के वनाच्छादित इलाके भंडारा-गोदिया-बालाघाट की पहचान की है। पेंच नेशनल पार्क - नागपुर और सिवनी भी माओवादियों के ‘‘रणनीतिक निकासी मार्ग’ के लिए मुफीद है। हाल के दिनों में इन इलाकों में माओवादी हचलच तेज हुई है। मतलब साफ है संभल सको तो संभल जाओ - लाल सलाम दस्तक दे चुका है।

मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार भले ही अपनी आंखें भींच ले, लेकिन उसके अनदेखा कर देने से मध्यप्रदेश में माओवादी समस्या खत्म नहीं हो जायेंगी। इसके पहले कि आम लोगों की सुरक्षा खतरे की जद में आ जाये और विकास कार्यक्रमों के लिए गुजाईश खत्म हो जाये सरकार को समय रहते एतिहात बरतना होगा। सुरक्षा जरूरतों को प्राथमिकता के आधार पर पूरा करने की पहल करनी होगी। पुलिस बल को आधुनिक, सक्षम और सबल करना होगा। पुलिस और नागरिक प्रशासन के बीच परस्पर भरोसा, विश्वास और तालमेल का विकास जरुरी होगा।

उत्तर प्रदेश के कई जिले भी वाम आतंक से पीड़ित हैं। पंजाब के मुख्यमंत्री और पुलिस महानिदेशक ने भी नक्सली गतिविधियों के प्रति चिंता व्यक्त की है। स्पष्ट तौर पर माओवादी देश के उन हिस्सों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं जहां अभी तक उन्हें देखा नहीं गया था, या कम देखा गया। मध्यप्रदेश तो उनकी नजऱ में पहले से ही काफी उर्वर जमीन रही है। कांग्रेस के शासन काल में नक्सलियों को सरकार का सक्रिय समर्थन मिला। भाजपा राज में भी एक अजीब-सी चुप्पी दिखती है। जाहिर-सी बात है संकट के समय अगर कोई आपका विरोध नहीं करे तो संकटग्रस्त के लिए यही काफी होता है। मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार नक्सलियों के प्रति ऐसा ही व्यवहार करती हुई दिख रही है।

तेलंगाना क्षेत्र में माओवादी पुनः अपना मजबूत आधार बनाने की फिराक में हैं। पृथक तेलंगाना राज्य की मांग और पोलावरम डैम विरोधी भावना को वे भुनाना चाहते हैं। मध्यप्रदेश के शहडोल और रीवा संभाग के क्षेत्रों में भी वे शासन की खदान विरोधी भावना निजी क्रेशर विरोधी भावना को अपने पक्ष में करना चाहते हैं। इस क्षेत्र में माओवादियों ने आम लोगों को वैध-अवैध क्रेशर उद्योग से मुक्ति दिलाने का वादा किया है। इसके कारण उन्हें किसानों और जनजातीय लोगों का समर्थन प्राप्त हो रहा है। प्रशासन के जनविरोधी रवैये के कारण पहले से ही माओवाद समर्थक माहौल तैयार हैं।

केन्द्र सरकार ने नक्सल प्रभावित राज्यों को और अधिक अद्र्धसैनिक बल उपलब्ध कराया है। लेकिन केन्द्र की यह अपेक्षा भी है कि राज्य सरकारें भी और अधिक सुरक्षा जवानों की भर्ती करें, प्रशिक्षण कार्यक्रम पर पहले की तुलना में अधिक निवेश करें, श्रेष्ठ गुणवत्ता और अधिक संख्या में आधुनिक शस्त्रों का भंडारण करें और जवानों को उपलब्ध कराएं और माओवादियों की की सख्त घेरेबंदी करें। लेकिन केन्द्र की अपेक्षाओं के बारे में मध्यप्रदेश की राज्य सरकार कितनी संजीदा है! मध्यप्रदेश सरकार अपने पड़ोसी राज्यों खासकर छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र से कितना और किस प्रकार का ताल-मेल और समन्वय विकसित कर रहा है यह भी एक पहेली जैसा ही है।

सरकार के पास तात्कालिक, अल्पकालिक, मध्यकालिक और दीर्घकालिक तौर पर क्या उपाय या योजना है, इसका किसी को पता नहीं। पुलिस के उच्च अधिकारी फरमाते हैं - योजना हो तब तो किसी को पता हो। सरकार की माओवादी विरोधी नीति, योजना और रणनीति भगवान भरोसे है। राजनैतिक नेतृत्व शायद यह सोचता हो कि जब आग लगेगी तो कुंआ खोद ही लेंगे। आग बुझाने लायक पानी तो मिल ही जायेगा। लेकिन माओवादी आतंक की आग शायद ऐसी नहीं है। उसकी लपटों से प्रदेश पहले से ही झुलसता रहा है। अब तो वक्त है माओवादी विस्तार को रोकने और खत्म करने की पुख्ता रणनीति और कार्ययोजना तैयार करने की। दशकों पुरानी माओवादी समस्या से निपटने के लिए केन्द्र सरकार ने एक समेकित कार्य-योजना तैयार की है जो - सुरक्षा, विकास, प्रशासन और जन धारणा पर आधारित है। क्या ऐसी कोई सोच, कार्य-योजना या समझ राज्य सरकार की है! आखिरकार केन्द्र की तैयारी भी तो राज्य सरकार के भरोसे ही है। केन्द्र सरकार की तैयारियों का परिणाम राज्य सरकार की क्रियान्वयन दक्षता व क्षमता पर ही निर्भर करती है। यह काम राज्य सरकार की सतत निगरानी, सतर्कता और सावधानी से ही संभव है।

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