रविवार, 13 फ़रवरी 2011

नर्मदा कुम्भ में धर्मांतण पाप से मुक्ति


ईसाइयों की जैसी आशंका या उनका जैसा आरोप था वैसा कुछ भी नहीं हुआ. नर्मदा कुम्भ का भव्य शुभारंभ हो गया. वनवासी हो या मतांतरित ईसाई कोई न तो डरे और न ही रुके. लेकिन कॉंग्रेस और ईसाई मिशनरी जरुर डरे है. ऑल इंडिया कैथोलिक यूनियन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जॉन दयाल की ओर से जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कुंभ के आयोजकों पर आरोप लगाते हुए कहा गया कि ईसाई समाज की प्रार्थना सभाओं में बाधा डालने की कोशिश की जा रही है। ईसाई परिवारों में जाकर उन्हें वापस हिंदू बनने के लिए दबाव डाला जा रहा है।

उधर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष सुरेश पचौरी और कॉंग्रेस के ही महासचिव दिग्विजय सिंह ने बार-बार नर्मदा कुम्भ पर रोक लगाने की मांग की है. ईसाई मिशनरियों के सुर में सुर मिलाते हुए कॉंग्रेस के नेताओं ने नर्मदा सामाजिक कुम्भ को भाजपा का आयोजन बताया. दरअसल कॉंग्रेस के नेताओं में मिशनरियों को पीछे छोड़ देने की होड लगी है. कॉंग्रेस के लिए मध्यप्रदेश में नर्मदा कुम्भ के आयोजन से एक तरफ कुआ तो दूसरी तरफ खाई पैदा हो गयी गई. कॉंग्रेस सांप-छछूंदर की स्थिति में है. कॉंग्रेस के नेता, ईसाईं मिशनरी, सोनिया और वनवासियों को एक साथ खुश करना चाहते है. नेताओं को डर है कि अगर ये खुश नहीं हुए तो नाराज हो जायेंगे. वे ये भी जानते है कि ये तीनो एक साथ खुश भी नहीं हो सकते. असमंजस की स्थिति में कॉंग्रेस के नेताओं ने तय किया कि अभी तो कांग्रेसमाता सोनिया और ईसाई मिशनरी को ही खुश किया जाए. अभी अनुसूचित जनजाति के वोट की दरकार कोंग्रेस को नहीं गई. आने वाला चुनाव उत्तरप्रदेश में है. इसलिए वनवासी समाज के नाराज होने से कॉंग्रेस की राजनीतिक सेहत पर तत्काल कोई असर नहीं पडने वाला. मुसलमानों की ही तरह वनवासी (कॉंग्रेस के आदिवासी) भी कॉंग्रेस के लिए सिर्फ वोटबैंक है. इस कुम्भ से वोट बैंक पर तत्काल कोइ खतरा नहीं.

मध्यप्रदेश के मंडला में आयोजित तीन दिवसीय नर्मदा सामाजिक कुम्भ पर कॉंग्रेस और मिशनरियों का एक ही सुर है. पोप, जॉन दयाल, सोनिया माइनो और सुरेश पचौरी-दिग्विजय एक ही राग अलाप रहे है. कॉंग्रेस के नेताओं ने अपने आम कार्यकर्ताओं के खिलाफ जाकर इस कुम्भ का विरोध किया तो उसका कारण हर हाल में सोनिया और मिशनरियों को प्रसन्न करना है. कॉंग्रेस नेता सुरेश पचौरी ने नर्मदा कुंभ को सनातन धर्म की मान्यताओं के विरूद्व बताते हुये इस पर मध्यप्रदेश धर्म स्वतंत्रता कानून 1968 के अंतर्गत तत्काल रोक लगाने की मांग की है। केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम् एवं प्रदेश के राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर को लिखे पत्र में उक्त आशय का आग्रह करते हुये उन्होंने कहा है कि कथित कुंभ में अल्पसंख्यकों के खिलाफ घृणा फैलाने के लिये आपत्तिजनक पर्चों का वितरण किया जा रहा है जो घोर निंदनीय है। दरअसल काग्रेस के नेताओं ने वास्ताविकता से आँखे भींचने की कोशिश की है. मिशनरियों के इशारे पर संघ, भाजपा और कुम्भ आयोजकों पर आरोप लगा कर वे स्वयं ही अपनी किरकिरी करा रहे है. मंडला की स्थानीय ईसाई संस्थाएँ कुम्भ में आयोजकों का सहयोग कर रही है. उन्होंने यहाँ अपने कैम्प और स्टॉल भी लगा रखे है. जहां तक मतांतरित ईसाइयों के घर वापसी का सवाल है तो जब सामान्य हिन्दू नर्मदा में स्नान करके अपने पापों से मुक्त हों जाते है तो फिर नि:संदेह मतांतरित हिन्दू भी अपने पापों से मुक्त हों सकते है. नर्मदा कुम्भ के आयोजक भले ही प्रत्यक्ष तौर पर "घर वापसी" के किसी कार्यक्रम से इंकार कर रहे है, लेकिन नर्मदा स्नान से कितनी बडी घर वापसी हो रही है इसका अंदाजा न तो सोनिया माइनो को है और न ही जॉन दयाल को. नर्मदा कुम्भ के आयोजकों की कोशिश है कि नर्मदा स्नान को पापमुक्ति, शुद्धिकारण और घर वापसी के तंत्र के रुप में स्थापित कर दिया जाए. घर वापसी के लिए नर्मदा स्नान का मन्त्र देने में आयोजक सफल रहे. इंकार करने से भी यह सच झूठ नहीं हों सकता कि 10 से 12 फरवरी तक होने वाले इस तीन दिवसीय आयोजन में लाखों हिन्दू अपने पापों से मुक्त होंगे, वहीं हजारों मतांतरित हिन्दू अपने मतांतरण-पाप से भी मुक्त होंगे. उल्लेखनीय है कि नर्मदा सामाजिक कुंभ हिन्दू समाज एक अनूठा आयोजन है। तीन दिन तक चलने वाले इस कुंभ में 20 लाख से भी अधिक वनवासियों के जुटने की उम्मीद है।

यह सर्वविदित है कि संघ और अन्य हिन्दूवादी संगठन पोप और उनके मतांतरण तंत्र चर्च और मिशनरी की गतिविधियों से काफी चिंतित है. मध्यप्रदेश में गठित नियोगी और रेगे कमिटी ने भी मतान्तरण के खतरे के प्रति आगाह किया था. राज्य सरकार की लापरवाही के कारण चर्च और मिशनरियों ने स्वच्छंद होकर मतान्तरण किया. गाँव-गाँव तक अपना जाल फैलाया. संघ जब चेता तब तक काफी देर हों चुकी थी. अब मतान्तरण और घर वापसी राजनीतिक मुद्दा बन गया है. संघ ने वर्षों पहले (२००२) झाबुआ में "हिन्दू संगम" का आयोजन किया था. बाद में वर्ष 2006 मे गुजरात में शबरी कुम्भ और अब मंडला में नर्मदा सामाजिक कुम्भ. आयोजक सार्वजनिक तौर पर चाहे कुछ भी कहें उनका एजेंडा स्पष्ट है. संघ वनवासियों में पहचान की अस्मिता जागृत करना ही है. यह आयोजन हिन्दू धर्म के प्रति आस्था रखने, राष्ट्रीय एकता का भाव जगाने तथा सामाजिक समरसता का अलख जगाने हेतु किया जा रहा है। संतों के मुताबिक, माँ नर्मदा सामाजिक कुंभ का उद्देश्य आदिवासियों की संस्कृति, उनकी पहचान और जीवन शैली ही नहीं बल्कि उनके आराध्य देव (बूढ़ादेव)के प्रति उनकी आस्था पर होने वाले आघात से उन्हें सुरक्षित करना भी है। संघ और उनसे जुड़े आयोजक भोले- भाले वनवासियों को धर्मातरण के कुचक्र से बचाने की कवायद में है. नर्मदा तट पर जमा हुए करीब दो लाख से भी अधिक जनसमुदाय से आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और विश्व हिंदू परिषद नेता प्रवीण तोगड़िया और ऐसे ही कई नेताओं ने मंडला में मतान्तण रोकने का आह्वान किया. मोहन भागवत ने कहा कि जब शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं वनवासियों को मिलेंगी तो उन्हें कोई लालच देकर धर्मातरित नहीं कर सकेगा। स्वामी सत्यमित्रानंद सरस्वती ने ईसाई मत ग्रहण करने वाले वनवासियों को उल्लू की संज्ञा देते हुए कहा कि उन्हें दिन के उजाले में भी कुछ नजर नहीं आता है। ओंकारेश्वर से आए स्वामी हरिहरानंद ने कहा कि दो-ढाई हजार साल पहले उत्पन्न हुए धर्म के कीट-पतंगे हमारे भोले-भाले लोगों को बरगला कर उनका धर्म परिवर्तित कर रहे हैं। सभी वक्ताओं ने अपने-अपने तरीके से कहा कि धर्म बदलने के बाद व्यक्ति अपने पूर्वजों को भूल जाता है, फिर उसकी निष्ठाएं बदल जाती हैं। संघ की चिंता है मतान्तण से राष्ट्रान्तरण होता है. एक हिन्दू का मतान्तरण होने से सिर्फ एक ईसाई या एक मुसलमान नहीं बढता बल्कि देश का एक शत्रु बढ़ता है. संघ अब नर्मदा जल से शत्रू प्रक्षालन करेगा. एक-एक मतांतरित ईसाई और मुसलमान को देशभक्त हिन्दू बनायेगा.

ईसाइयों के वरिष्ठ प्रतिनिधि और ऑल इंडिया कैथोलिक यूनियन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जॉन दयाल का नर्मदा कुम्भ पर छाती पीटना स्वाभाविक है. वर्षों की मेहनत और करोड़ों-अरबों खर्च कर जो काम किया वह नर्मदा जल से यूं ही धुल जाए ये चर्च और मिशनरियों को कैसे सुहायेगा. लोभ,लालच और छल से किया गया धर्मं परिवर्तन एक झटके में नर्मदा मैया के प्रवाह में बह जाए इसे जॉन दयाल कैसे पचा पायेंगे. क्या जवाब देंगे अपने आका को. वे किसा मुंह से पोप को बताएँगे कि कितना खोखला है उनके इसाईयत का मुल्लमा. जैसे पचौरी को सोनिया के सवालों का डर है, शायद जॉन दयाल भी पोप के सवालों से डरे है. कुम्भ के आयोजकों ने सवाल किया है नर्मदा कुम्भ से कोइ देशभक्त भयातुर नहीं है, ईसाई मिशनरी क्यों डर रहे है. संघ की कोशिश है एक बार वनवासी समाज जागरूक और सचेत हों जाए तो फिर चर्च भी कुछ नहीं कर सकेगा. राजनीतिक दल भी उसे सिर्फ वोटबैंक नहीं मानेंगे. तब चाहे भाजपा, कांग्रेस हों या गोंडवाना पार्टी, चर्च-मिशनरी हों या इस्लामिक ताकतें कोइ भी वनवासियों को बरगला नहीं सकेगा. संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि समाज के क्रियाशील हुए बिना धर्मातरण नहीं रुक सकता। कुंभ में हम यह संकल्प लें कि हम हिंदू समाज में व्याप्त छुआछूत को समाप्त करने के लिए काम करेंगे। विद्या दान करेंगे, अन्नदान करेंगे। संघ ने हर चार साल में सामाजिक कुंभ का ताना-बाना बुन दिया है. पहले 2006 गुजरात में शबरी कुंभ और 2011 में मध्यप्रदेश के मंडला में नर्मदा कुम्भ. आयोजकों ने हर पांच साल में इस तरह के सामाजिक कुंभ की योजना पहले ही बना रखी है। संघ नेताओं का कहना है कि असली हिंदुत्व तो वनवासियों ने ही बचा रखा है। धार्मिक कुंभ नासिक, उज्जैन, इलाहबाद और वाराणसी में होता आया है. वनवासियों का यहा सामाजिक कुम्भ भी हर चौथे साल में आयोजित होगा. वनवासी क्षेत्र ज्यादातर दुर्गम इलाको में है इसलिए सामाजिक कुम्भ भी सुदूर दुर्गम क्षेत्रों में ही होगा. संभव है अगला कुम्भ झारखंड या पूर्वोत्तर क्षेत्र में कही आयोजित हो. गौर करने लायक बात है कि संघ जहा अपनी पद्धति से काम कर रहा है, वही कॉंग्रेस और मिशनरी भी अपनी स्टाइल में विरोध कर रहे है. अभी तो संघ का पलडा भारी दिखता है. कॉंग्रेस और मिशनरी ने प्रेस और मीडिया के जरिये ज्ञापन देकर अपना विरोध प्रकट किया है. इन्होंने शबरी कुम्भ के समय भी ऐसा ही किया था. संघ ने देशभर से लाखों वनवासियों को इकट्ठा कर विरोधियों कों उनकी औकात बता दी है. संघ ने नर्मदा जयन्ती पर लाखों वनवासियों और नर्मदा भक्तों के बीच वनवासी पहचान को बचाने और मतांतरण को रोकने का आह्वान किया. भाजपा को संघ और सरकार के प्रयासों का लाभ तो मिलना ही है. वही कोंग्रेस अपनी छाती पीटती रही. कॉंग्रेस के नेता चाहते तो इस कुम्भ में भागीदार होकर वनवासियों की इतनी बड़ी उपस्थिति का लाभ ले सकते थे. लेकिन अपने आलाकमान सोनिया की नाराजगी के डर से वे यह भी नहीं कर सके.

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