गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

खजुराहो में अन्तरराष्ट्रीय विज्ञान संचार सम्मेलन की शुरुआत


भारत में 4 से 11 दिसंबर तक दुनिया के पचास से अधिक देशों विज्ञान संचार विशेषज्ञ इकट्ठा हुए। दुनिया भर के संचार विशेषज्ञों का जुटान विज्ञान एवं प्रौद्योगकिी विभाग की ईकाई राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद् ने किया है। आधुनिक समाज में विज्ञान की भूमिका पर आयोजित इस 11 वें ‘‘पब्लिक कम्युनिकेशन आॅफ साईंस एंड टेक्नोलॉजी’ के आयोजन में मध्यप्रदेश विज्ञान एंव प्रौद्योगिकी परिषद् ने भी काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। गौरतलब है कि खजुराहो में 4 और 5 दिसंबर को आयोजित ‘‘प्री कांफ्रेरेंस’’ की मेजबानी मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् ने की। 6 से 10 दिसंबर तक मुख्य सम्मेलन दिल्ली में और समापन 11 दिसंबर को जयपुर में होगा। मध्यप्रदेश की ऐतिहासिक नगरी खजुराहो न सिर्फ मंदियों और मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इतिहास, धर्म और कला-संस्कृति के संचार के लिए भी जाना जाता है। संचार नगरी खजुराहो विज्ञान संचार के प्रति नई सोच और दृष्टि उत्पन्न करने के लिए आयोजित अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन का साक्षी बना। यहां आयोजित प्री-कांफ्रेंस में विज्ञान भारती के संगठन सचिव जयकुमार, मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् के महानिदेशक प्रो. प्रमोद कुमार वर्मा, योजना आयोज के सलाहकार ए.के. वर्मा, एनसीएसटीसी के निदेशक डॉ. मनोज पटैरिया, समाज विज्ञानी डॉ. जितेन्द्र बजाज, संचार विशेषज्ञ शशिधर कपूर, संदीप भट्ट और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के डॉ. पी. के. मिश्रा मुख्यरूप से उपस्थित थे। इस सम्मेलन में विदेशी संचार विशेषज्ञ भी बड़ी संख्या में उपस्थित थे। इन सम्मेलन में आस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, फिलीपींस सहित कई देशों के अंतरराष्ट्रीय प्रतिभागियों हिस्सा लिया।

उद्घाटन सत्र में बोलते हुए विज्ञान भारती के संगठन सचिव जयकुमार ने कहा कि विज्ञान संचार पर बात करते हुए हमें यह भी विचार करना चाहिए कि वैदिक साहित्य कैसे आया यह कैसे विकसित हुआ। वर्षों तक लिखने-पढ़ने की पद्धति विकसित न होने के बावजूद हमारे देश में ज्ञान-विज्ञान का संचार होता आया है। भारतीय समाज साहित्य, विज्ञान और ज्ञान का संचार श्रुति संचार के द्वारा वर्षों तक करता रहा है। पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान का हस्तांतरण भी एक विशिष्ट भारतीय पद्धति से होता रहा। जब दुनिया अज्ञान के अंधेरे में थी तब भी भारत ने सभी क्षेत्रों में ज्ञान-विज्ञान का संचार किया।
जयकुमार ने कहा कि वैज्ञानिक का मतलब सिर्फ टाई-कार्ट नहीं है। यहां के किसान और वनवासी वास्तविक वैज्ञानिक हैं। भारत का वनवासी कैंसर का उपचार कर रहा है। अशिक्षित और निरक्षर लोगों ने भी अनेक क्षेत्रों में उत्तम संचार किया है और आज भी कर रहे हैं। भारतीय समाज ने टीवी, विडियो और एलसीडी जैसे उपकरण और तकनीक न होने के बाद भी यह सब किया। यहां अनेक गांवों में आज भी बिजली नहीं है, अंधेरे में आधुनिक संचार कैसे काम करेगा। हम सिर्फ सूचना संचार तकनीक से ही समस्याओं का निदान नहीं कर सकते। मीडिया क्षेत्र में कार्यरत लोगों को भी विज्ञान संचार के बारे में नए सिरे से सोचने की जरूरत है। आज भी अपने देश में एक भी विज्ञान केन्द्रित समाचार पत्र नहीं है।
उन्होंने कहा कि भारतीय समाज की समस्याओं और आवश्यकताओं को जानने-समझने की कोशिश होनी चाहिए, फिर इसी के अनुकूल विज्ञान संचार को विकसित किया जाना चाहिए। भारत में भारतीय द्ष्टि से विज्ञान संचार की रूपरेखा बनानी होगी। भारतीय ऋषियों ने ध्वनि विज्ञान, भाषा विज्ञान पर काफी काम किया है।
योजना आयोग के सलाहकार ए.के. वर्मा ने कहा कि सभी सफल प्रधानमंत्रियों ने विज्ञान के महत्व की बात स्वीकर करते हुए इसे बढावा दिया है। आज मोबाइल, कम्प्युटर और टीवी जैसे आधुनिक संचार साधन गरीब और पिछड़े लोगों को भी मदद दे रहे हैं। आज इस बात पर विचार करने की जरूरत है कि विकास और संचार को कैसे जोड़ा जाए। वैज्ञानिकों और संचारकों को मिल कर काम करने की जरूरत है। विज्ञान को लोकप्रिय बनाना भी एक चुनौती है, खासकर भारत जैसे देश में जहां अनेक भाषा, समुदाय और भिन्न-भिन्न संस्कृतियों का समाज है। श्री वर्मा ने कहा कि भारत सरकार का योजना आयोग 12 वीं योजना की तैयारी कर रहा है। इसमें भी विज्ञान और विज्ञान संचार को देश की जरूरतों के मुताकिब शामिल किया जा सकता है। विज्ञान के क्षेत्र में लोक जागरण और लोक जिम्मेदारी को बढ़ावा देने में मीडिया की बड़ी भूमिका हो सकती है।
मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद्के महानिदेशक प्रो. प्रमोद कुमार वर्मा ने कहा कि हमें लोगों में वैज्ञानिक मनोवृत्ति का विकास करना है। हमारी संचार की विशिष्ट परंपरा रही है। इस परंपरा को संरक्षित और विकसित करने की जरूरत है। हमारी दादी ने ‘काजल’ बनाना और आंखों में लगाना हमारी मां को सिखाया। झारखंड राज्य में बनने वाले हंडिया और मध्यप्रदेश के मंडला जिले के वैद्यों द्वारा किए जाने वाले उपचार विधियों का उल्लेख करते हुए डॉ. वर्मा ने भारतीय परंपराओं में विज्ञान और विज्ञान संचार से प्रतिभातियों को रूबरू कराया। उन्होंने कहा कि भारत ने वैज्ञानिक दृष्टि अपनाते हुए समय, सामग्री, प्रक्रिया और उत्पाद को हमेशा महत्व दिया। भारत में ओझा-वैद्य शायद पढ़ना-लिखना नहीं जानते लेकिन उपचार की श्रेष्ठ विधियों से वे भलि-भांति परिचित थे। हमारे पास आज संचार के अनेक आधुनिक साधन उपलब्ध हो गए हैं लेकिन अभी भी संचार की कमी है। बच्चों के लिए विज्ञान शिक्षा के लिए काुी समय से प्रयास चल रहा है। अभी इस दिशा में वांछित सफलता के लिए और भी बहुत कुछ करने की जरूरत है। विज्ञान की जटिलताओं को सहज और सर्वसुलभ बनाने की काफी आवश्यकता है। मध्यप्रदेश सरकार इस दिशा में काफी प्रयास कर रही है। सरकार के प्रयासों से विज्ञान को एक वर्ग विशेष से आम लोगों का विषय बनाने में काफी सफलता मिली है। मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौैद्योगिकी परिषद् की कोशिश है कि विज्ञान सबके लिए हो, विकास के प्रत्येक पहलू में विज्ञान को शामिल किया जाये। देश के विभिन्न हिस्सों से आए विशेषज्ञों ने विज्ञान संचार से संबंधित अनेक प्रस्तुतियां भी दी। कार्यक्रम का संचालन परिषद् के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. संदीप गोयल ने किया।
खजुराहो से अनिल सौमित्र

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