शनिवार, 20 नवंबर 2010

सुदर्शन के आरोप और सोनिया की चुप्पी !

अनिल सौमित्र
10 नवम्बर को राष्ट्रव्यापी धरने के दौरान भोपाल में संघ के पूर्व प्रमुख सुदर्शन ने जो कुछ कहा उसके बाद बहुत कुछ बदल गया। संघ जो चाहता था नहीं हुआ। जो नहीं चाहता था, वही हो गया। सोनिया संबंधी अपने वक्तव्य के बाद सुदर्शन चुप हो गए। मीडिया के लाख प्रयासों के बावजूद वे उपलब्ध नहीं हुए। सुदर्शन जिसके कभी प्रमुख हुआ करते थे, उसने भी उनके बयान को निजी करार दिया। बाद में संघ के सरकार्यवाह का खेद प्रकट करने वाला आधिकारिक बयान जारी हुआ। लेकिन मामला शांत नहीं हुआ। कांग्रेस के महासचिव और कांग्रेसी सेक्यूलरिज्म के नए ठेकेदार दिग्विजय सिंह ने कहा - संघ प्रमुख मोहन भागवत और भाजपा को देश की जनता को यह बताना चाहिए कि वे श्री सुदर्शन के बयान से सहमत हैं या असहमत हैं। कांग्रेस पार्टी के मीडिया प्रकोष्ठ प्रमुख और प्रवक्ता जनार्दन द्विवेदी ने आग में बारूद डालने का काम किया। उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को उकसाते हुए कहा - ऐसे लोगों के खिलाफ समाज की प्रतिक्रया ऐसी होनी चाहिए कि भविष्य में कोई भी इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करने की हिम्मत न कर पाए। द्विवेदी ने कहा कि इस तरह की बातों से अगर देशभर में कांग्रेसजन उत्तेजित होते हैं तो इसकी जिम्मेदारी किस पर होगी? कांग्रेस के नेताओं पवन कुमार बंसल से लेकर रीता बहुगुणा, अशोक गहलोत, सुरेश पचैरी और कल्पना परुलेकर तक सभी में बयान देने और कांग्रेस कार्यकर्ताओं को उकसाने की होड़ लग गई। जनार्दन द्विवेदी के बयान के तत्काल बाद कांग्रेसियों ने संघ के दिल्ली स्थित कार्यालय केशवकुंज पर हमला कर दिया। कांग्रेस ये भूल गए कि जहां जूते-चप्पल और पत्थर फेंक रहे हैं वहां भारतमाता का चित्र भी है। लेकिन उन्हें कांग्रेस-माता के समक्ष भारतमाता की केाई कद्र नहीं। मध्यप्रदेश समेत कई प्रदेशों में कांग्रेस के नेता बड़बोले हो गए। वे अपना विरोध सोनिया-माता तक पहुचाने के लिए इतने उतावले हो गए कि एक ही स्थान पर कई-कई दफे पुतले जलाए जाने लगे। कांग्रेस के जहां जितने गुट वहां उतने ही पुतले जलाए गए। केन्द्र सरकार में राज्यमंत्री अरुण यादव ने कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को सलाह दी कि वे पार्टी के झंडे के साथ डंडा लेकर सडकों उतरें।
इधर संघ और भाजपा के नेता कांग्रेसी योजना की सफलता पर सिर पीटते रहे। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर संसद में और संसद के बाहर हिन्दू विरोधी दुष्प्रचार की राजनीति को लेकर कांग्रेस की घेरेबंदी हवा हो गई। कांग्रेसियों को पता था कि सुदर्शन के बयान पर जितना हल्ला मचेगा विपक्षी घेरेबंदी उतनी ही कमजोर होगी। भाजपा के मध्यप्रदेश अध्यक्ष से लेकर राष्ट्रीय प्रवक्ता तक सुदर्शन के बयान को तूल न देने की सलाह कांग्रेस को देते रहे। कांग्रेसियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
संघ और भाजपा के नेता यह भूल गए कि जिसे फांसने चले थे, उसी ने अपनी चाल में फंसा लिया। कांग्रेस के नेताओं के बयान पहले से ही भड़काउ थे। चाहे वह गृहमंत्री चिदंबरम का हिन्दू-भगवा आतंकवाद संबंधी बयान हो या दिग्विजय सिंह का संघ पर आईएसआई से पैसा लेने का आरोप। बाद में राहुल गांधी ने संघ को सिमी जैसा कह दिया। यह सब कुछ हिन्दू संगठनों को उत्तेजित करने के लिए ही था। कांग्रेस चाहती थी कि संघ या अन्य हिन्दू संगठन उत्तेजित हो जाएं और कुछ ऐसा कर बैठें कि उन्हें अपने आरोपों को जायज ठहराने का बहाना मिल जाये। एक टीवी चैनल पर चर्चा करते हुए मध्यप्रदेश सरकार के मंत्री और भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय बार-बार कह रहे थे कि संघ का हिंसा में विश्वास नहीं है। संघ कांग्रेस के लाख भड़काने के बावजूद शांति से अपना कार्य कर रहा है। संघ रचनात्मक कार्यों और लोकतांत्रिक पक्रिया में भरोसा रखता है। लेकिन दूारी तरफ कांग्रेस के नता सज्जन वर्मा लगातार चुनौती दे रहे थे। वे बार-बार ललकार रहे थे - भाजपा-संघ में दम हो तो राजस्थान, महाराष्ट्र या फिर आंध्रप्रदेश में हमले करके देखें। वे चाहते हैं कि कांग्रेस के लोगों ने जैसे देशभर में संघ कार्यालयों पर हमले, प्रदर्शन और पथराव किए वैसा ही कुछ संघ के कार्यकर्ता भी करें। फिर उनके दिग्विजय सिंह जैसे नेता यह कहते फिरें कि देखो ये संघी आतंकी कैसा आतंक फैला रहे हैं। बहरहाल कांग्रेस के इतना सब प्रयास करने के बावजूद भी देश में कोई बड़ा तूफान खड़ा नहीं हुआ। संघ के वरिष्ठ लोगों ने कांग्रेसी आग में पानी डाल दिया। कांग्रेस के नेता ऐसा कुछ चाहते थे जिसे देख कर मुस्लिम समुदाय भड़क जाये। वे समर्थक मुसलमानों का धु्रवीकरण चाहते हैं। शायद यह अभी तक हो नहीं सका।
एक समाचार पत्र ने लिखा कि कांग्रेसियों को तो सोनिया गांधी और राहुल गांधी के प्रति निष्ठा दिखाने का बहाना चाहिए। आरएसएस नेता सुदर्शन ने सोनिया के खिलाफ टिप्पणी क्या कि, पार्टी के नेता सोनिया और राहुल के दफ्तर में फैक्स भेजकर बताने लगे कि उन्होंने आरएसएस के दफ्तर और उनके नेता सुदर्शन के खिलाफ किस-किस तरह से विरोध प्रदर्शित करने की योजना बनाई है। समाचार पत्र के मुताबिक कांग्रेसियों ने अपने नेता को इतने सारे फैक्स भेजे कि कई बार फैक्स रोल बदलने पड़े। सोनिया के दफ्तर में तो फैक्स मशीन को सामान्य फैक्स नम्बर से हटाकर दूसरे नम्बर में लगाना पड़ा। जब नेताओं ने सोनिया-राहुल को फोन करके अपने विरोध कार्यक्रमों के बारे में बताया तो सोनिया-राहुल ने इसमें कोई रूचि नहीं दिखाई। पार्टी से जुड़े वकीलों ने भी हमदर्दी दिखाते हुए आरएसएस और उनके नेता सुदर्शन के खिलाफ मुकदमा दायर करने की अनुमति चाही तो उस पर भी सोनिया खामोश बनी रही।
खबर यह भी है कि सोनिया गांधी को अगले कुछ दिनों में अपनी नई टीम का ऐलान करना है। इसी महीने पार्टी की बैठक में सोनिया ने कई नेताओं को टीम से बाहर रखने का संकेत दे दिया था। इन नेताओं के लिए सुदर्शन का बयान संजीवनी की तरह है। आरएसएस नेता सुदर्शन के बयान के बहाने दिल्ली में जगदीश टाइटलर, भोपाल में सुरेश पचैरी और जयसवाल जैसे नेताओं ने संघ विरोध की कमान संभाल ली। अखबारों की कटिंग ‘कांग्रेस-माता सोनिया निवास तक पहुचायी गई। लेकिन सोनिया ने न तो कांग्रेस नेताओं के इस दिखावटी विरोध को तवज्जो दी और ना ही आगे बढ़कर मानहानि की शिकायत ही की। बयान के बाद जैसे सुदर्शन ने चुप्पी साध ली वैसे ही सोनिया ने भी।
यह सच है कि कांग्रेस-माता सोनिया के बारे में कांग्रेसियों को पता हो या न हो स्वयं सोनिया अपने बोर में तो जानती हैं। वे जानती हैं कि सुदर्शन के वक्तव्य की भाषा, शैली और उनके वक्तव्य की परिस्थितियों पर ही हंगामा मचाया जा सकता है, उनकी कही बातों पर नहीं। सोनिया के बारे में दुनियाभर के लोग, खुफिया एजेंसियां बहुत कुछ जानती हैं। आखिर कांग्रेसी सोनिया के बारे में सच का सामना क्यों नहीं करते! कांग्रेस के नेता-कार्यकर्ताओं ने सुदर्शन-संघ को जितना भला-बुरा कहना था कह दिया। किसी ने उन्हें पागल कहा तो किसी ने मानसिक दिवालिया। लेकिन कांग्रेस के नेता तो मानसिक श्रेष्ठता का परिचय दें। एक बार तो बतायें कि जिसे वे पूजते हैं, जिनके लिए एक बार नहीं बार-बार मरने की कसमें खाते हैं उस कांग्रेस-माता का चलताउ नहीं, असली और पूरा नाम क्या है? कांग्रेसी क्या उन सोनिया माता जिनके लिए वे पलक-पांवडे बिछाए रहते हैं उनके मां-बाप के बारे में भी उतने गर्व और स्वाभिमान से दूसरों को बता सकते हैं? संघ के स्वयंसेवक भारतमाता के आराधक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार, श्री माधव सदाशिवराव गोलवरकर, श्री कुप्पहल्ली सीतारमैया सुदर्शन या फिर डॉ. मोहनराव मधुकर भागवत को अपना नेता मानते हैं। वे गर्व और स्वाभिमान से इसे सार्वजनिक रूप से बताते भी हैं। क्या इतने ही गर्व और स्वाभिमान से कांग्रेसी भी यह स्वीकार करते हैं कि उनकी नेता स्टीफेनो माइनो की पुत्री एंटोनिया सोनिया माइनो हैं। सोनिया शायद इसलिए चुप हैं कि उन्हें अपना सच मालूम है। वे भले ही अपने भक्तों से ये सच छुपा लें। लेकिन इस लोकतांत्रिक देश में जहां सूचना का अधिकार हरेक नागरिक को प्राप्त है कोई भी सच ज्यादा दिन छुपाया नहीं जा सकता। कांग्रेसी भले ही सच का सामना करते हुए अपनी आंखें भींच लें, हरेक भारतीय सोनिया के सच को जानने के लिए उतावला है। कांग्रेस के विरोधी भी तो जानें कि एक सोनिया भक्त कांग्रेसी अपने नेता की जीवनी कैसे लिखता, पढ़ता और सुनता है। कांग्रेस के नेता संघ-सुदर्शन को कोसने, उन्हें भला-बुरा कहने और उनका पुतला-अर्थी जलाने से उबर गए होंगे। चाहें तो भले ही कुछ पुतले और जला लें, एकाध मुकदमे और कर दें, लेकिन एक बार हिम्मत करके सोनिया के सच का सामना जरूर करें। भले ही सुदर्शन चुप रहें, सोनिया तो अपनी रहस्यमयी चुप्पी तोडें!
(लेखक पत्रकार और मीडिया एक्टिीविस्ट हैं। )

1 टिप्पणी:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

सोनिया जी को अपनी स्थिति साफ करना चाहिये..