बुधवार, 13 अक्तूबर 2010

अयोध्या में रामजन्म भूमि का मामला

हिंदू लॉ पर हाथ नहीं डालना चाहता मुस्लिम पक्ष
सुहेल वहीद
लखनउ। अयोध्या विवाद पर हाईकोर्ट के फैसले पर आस्था के हावी होने का हल्ला मचाने वालों को शायद पता ही नहीं है कि धार्मिक आस्था भारतीय कानून में एक तथ्य है। आस्था को कानूनी जामा पचास के दशक में पहनाया जा चुका है, तो फैसला आस्था की बुनियाद पर ही होना था और मुद्दा भी आस्था ही थी। सुन्नी वक्फ बोर्ड ने जान बूझकर अदालत में रामलला को पार्टी नहीं बनाया। बोर्ड वकील जफरयाब जीलानी का तर्क है कि हम विवादित स्थल पर रामलला के वजूद को ही नहीं मानते। समाचार पत्र नवदुनिया से चर्चा में वह कहते हैं कि जिस दिन हम वहां रामलला को स्वीकार कर लेंगे मुकदमा हार जाएंगे। उधर हिंदू पक्ष के एक पक्षकार श्रीराम जन्मभूमि पुनरूद्धार समिति की वकील रंजना अग्निहोत्री ने अदालत में तर्क दिया था कि जब सुन्नी वक्फ बोर्ड ने रामलला को पार्टी ही नहीं बनाया तो वह एडवर्स पजेशन का दावा किससे कर रहे हैं। विवादित जगह वह मांग किससे रहे हैं। मुस्लिम पक्ष ने जान-बूझ कर रामलला को पार्टी नहीं बनाया, क्योंकि रामलला को पार्टी बनाने का मतलब हिंदू लॉ को छेड़ना था और मुस्लिम पक्ष इसे छेड़ना नहीं चाहता, क्योंकि इस पर हाथ डालने का मतलब है कि बात मुस्लिम पर्सनल लॉ तक पहुंच जाएगी।

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