बुधवार, 13 अक्तूबर 2010

अयोध्या पर सेक्युलर समूह का छल

अयोध्या पर हाई कोर्ट के निर्णय के बाद विभिन्न कोनों से आई
प्रतिक्रियाएं विचारणीय हैं। जहां मुकदमे के पक्षकारों ने संयम और सद्भाव
दिखाया वहीं कुछ जाने-माने वामपंथी बुद्धिजीवियों ने निर्णय का विरोध
किया है। रोमिला थापर, डीएन झा, केएन पणिक्कर जैसे कई लोगों ने संयुक्त
हस्ताक्षर करके कहा है कि यह निर्णय देश के सेक्युलर चरित्र पर आघात है
और इससे न्यायपालिका की प्रतिष्ठा गिरी है। उन्होंने यह भी कहा है कि
विवादित स्थल पर पहले राममंदिर होने की बात एक धोखाधड़ी है। एक बार फिर यह
एक उचित अवसर है कि देश में साप्रदायिक विभेद और तनाव बढ़ाने वालों को
ठीक से पहचाना जाए। सच तो यह है कि मुसलमानों की तरफ से तरह-तरह की
शिकायत, मांग और विरोध आदि को मुस्लिम नेताओं ने उतना नहीं उठाया जितना
ऐसे लिबरल-सेक्युलर कहलाने वाले हिंदू बुद्धिजीवियों ने। ऐसा करते इनमें
न कोई न्याय-बोध रहता है, न साविधानिक या निष्पक्ष आधार। ऐसे लोगों ने
मुस्लिमों के स्वयंभू हितचिंतक बनकर देश के साप्रदायिक वातावरण को जितना
बिगाड़ा है उतना किसी अन्य चीज ने नहीं। इन सेक्युलर बौद्धिकों का
वास्तविक चरित्र घोर पक्षपाती रहा। उनकी हर सक्रियता ने दोनों समुदायों
की मानसिकता पर हानिकारक प्रभाव डाला है। अयोध्या प्रसंग में भी यह बात
बार-बार दिखाई पड़ी। थापर, झा, पणिक्कर आदि ये वही लोग हैं जिन्होंने 1989
में 'पॉलिटिकल एब्यूज ऑफ हिस्ट्री' नामक एक उग्र पुस्तिका लिखकर अयोध्या
विवाद को एक नया आयाम दिया था। उसमें श्रीराम के अस्तित्व को ही नकारा
गया था और हिंदू पक्ष को सीधे-सीधे राजनीति-प्रेरित कहकर हटाने, हराने की
मांग रखी गई थी। इसने विवाद को बुरी तरह बदल दिया। इसके पहले तक विवादित
स्थल पर मात्र कानूनी लड़ाई चल रही थी।

कभी भी मुस्लम पक्ष ने श्रीराम के अस्तित्व आदि पर प्रश्न नहीं उठाया था।
वे तो मात्र वर्तमान नागरिक कानून आदि के आधार पर विवादित ढांचे को अपने
हाथ में रखने की जिद कर रहे थे। इतिहास पर उन्होंने प्रश्न नहीं उठाया
था। यह तो ऐसे सेक्युलर ठग थे, जिन्होंने राम के जन्म का 'ऐतिहासिक
प्रमाण' मांगकर मामला बिगाड़ा। ऐसे बौद्धिकों के हस्तक्षेप में किसी
समाधान की चाह नहीं थी। वे तो बस अपनी हिंदू-विरोधी विचारधारा सब पर
थोपना चाहते थे। बाद में, प्रधानमंत्री नरसिंह राव द्वारा बनाई गई सरकारी
समिति ने भी इनके बारे में यही पाया। पहले तो उन्हीं इतिहासकारों ने
बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के आधिकारिक पैरोकार बनकर मुस्लिम पक्ष को आपसी
समाधान करने से रोका। उन्हें भरोसा दिलाया कि राम या रामजन्मभूमि का कोई
प्रमाण नहीं है और इसी से विवादित स्थल पर उनका एकमात्र हक है, लेकिन जब
प्रधानमंत्री चंद्रशेखर द्वारा दोनों पक्षों को बिठाकर प्रमाणों की
जांच-पड़ताल होने लगी तो मुस्लिम पक्ष के यही पैरोकार बहाना बनाकर बीच
रास्ते भाग खड़े हुए। इन सेक्युलर-वामपंथी बौद्धिकों की नीयत कितनी खराब
थी, यह तब पुन: प्रमाणित हुआ जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मार्च 2003 में
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को अयोध्या में विवादित स्थल की खुदाई का आदेश
दिया ताकि वहां पहले से राममंदिर होने या न होने का प्रमाण पाया जा सके।
इस पर सबसे आक्रामक प्रतिक्रिया इन्हीं इतिहासकारों की आई जो अब तक
रामजन्मभूमि या मंदिर का प्रमाण मांगते रहे थे! खुदाई का आदेश देने के
लिए इन्होंने न्यायाधीशों पर पक्षपात का आरोप लगाने में भी देर नहीं
लगाई। पुरातत्व सर्वेक्षण पर भी लाछन जड़ा कि वे बेईमानी करेंगे।

अयोध्या मसले के समाधान में इन कथित सेक्युलर लोगों ने हमेशा अड़ंगा लगाया
है। ऐसे लोगों ने 1989-90 में यही किया, फिर वही बाद में और आज भी वे यही
कर रहे हैं। अत: आवश्यक है कि ऐसे कथित सेक्युलर लिबरल बुद्धिजीवियों की
घातक राजनीतिक भूमिका ठीक से परखी जाए। अभी जिस तरह हिंदू-मुस्लिम
समुदायों तथा उनके नेताओं ने न्यायालय के निर्णय पर संयम दिखाया, वह
प्रसन्नता और संतोष की बात होनी चाहिए थी। उनके लिए तो विशेषकर जो स्वयं
को धर्म-मजहब से ऊपर रहकर उन्नति, विकास आदि के लिए फिक्रमंद बताते हैं,
किंतु ठीक इन्हीं लोगों ने एक समुदाय विशेष को भड़काने के लिए फिर
अनावश्यक बयानबाजी आरंभ कर दी है। इस लिबरल-सेक्युलर बौद्धिक गिरोह की
कुटिलता तब और स्पष्ट दिखती है जब याद करें कि यही लोग निर्णय आने से
पहले न्यायालय का 'जो भी निर्णय हो' वह मानने की भरपूर वकालत कर रहे थे।
संविधान की सर्वोच्चता और सामुदायिक सद्भाव को सर्वोपरि रखने की सीख दे
रहे थे। ये सब तर्क उन्होंने निर्णय आते ही तिरोहित कर दिया। क्यों?
कयोंकि उनके सभी तकरें के पीछे सदैव एक घातक राजनीति छिपी होती है।

30 सितंबर से पहले के उनके सभी तर्क एक अनुमान पर आधारित थे कि निर्णय
कुछ और आएगा। अर्थात एक विशेष प्रकार का निर्णय करना, करवाना और मनवाना
ही उनका लक्ष्य था और है। इसीलिए यह निर्णय आने के बाद सामुदायिक शाति
बने रहने पर ठीक यही लोग बुरी तरह असंतुष्ट हैं। वे तरह-तरह से अपनी
अप्रसन्नता प्रकट कर रहे हैं। एक वामपंथी इतिहासकार कह रहे हैं कि
न्यायालय ने कानून का ध्यान छोड़कर मानो पंचायत का फैसला सुना दिया है।
दूसरी प्रखर सेक्युलरवादी बौद्धिका कह रही हैं कि अब मुसलमानों का भारतीय
राजसत्ता से विश्वास उठ गया है। तीसरा इसे न्यायिक नहीं, राजनीतिक निर्णय
बता रहा है।

[एस. शंकर: लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं]

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