मंगलवार, 21 सितंबर 2010

इस्लाम और जापान के बारे मे क्या यह सच है ?

क्या आपने कभी यह समाचार पढ़ा कि किसी मुस्लिम राष्ट्र का कोई प्रधानमंत्री या बड़ा नेता तोकियो की यात्रा पर गया हो?
क्या आपने कभी किसी अखबार में यह भी पढ़ा कि ईरान अथवा सऊदी अरब के राजा ने जापान की यात्रा की हो?
कारण·
जापान में अब किसी भी मुसलमान को स्थायी रूप से रहने की इजाजत नहीं दी जाती है।·
जापान में इस्लाम के प्रचार-प्रसार पर कड़ा प्रतिबंध है।·
जापान के विश्वविद्यालयों में अरबी या अन्य इस्लामी राष्ट्रों की भाषाएं नहीं पढ़ायी जातीं।·
जापान में अरबी भाषा में प्रकाशित कुरान आयात नहीं की जा सकती है।
इस्लाम से दूरी·
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जापान में केवल दो लाख मुसलमान हैं। और ये भी वही हैं जिन्हें जापान सरकार ने नागरिकता प्रदान की है।·
सभी मुस्लिम नागरिक जापानी बोलते हैं और जापानी भाषा में ही अपने सभी मजहबी व्यवहार करते हैं।·
जापान विश्व का ऐसा देश है जहां मुस्लिम देशों के दूतावास न के बराबर हैं।·
जापानी इस्लाम के प्रति कोई रुचि नहीं रखते हैं।·
आज वहां जितने भी मुसलमान हैं वे ज्यादातर विदेशी कम्पनियों के कर्मचारी ही हैं।·
परन्तु आज कोई बाहरी कम्पनी अपने यहां से मुसलमान डाक्टर, इंजीनियर या प्रबंधक आदि को वहां भेजती है तो जापान सरकार उन्हें जापान में प्रवेश की अनुमति नहीं देती है।
अधिकतर जापानी कम्पनियों ने अपने नियमों में यह स्पष्ट लिख दिया है कि कोई भी मुसलमान उनके यहां नौकरी के लिए आवेदन न करे।·
जापान सरकार यह मानती है कि मुसलमान कट्टरवाद के पर्याय हैं इसलिए आज के इस वैश्विक दौर में भी वे अपने पुराने नियम नहीं बदलना चाहते हैं।·
जापान में किराए पर किसी मुस्लिम को घर मिलेगा, इसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती है।
यदि किसी जापानी को उसके पड़ोस के मकान में अमुक मुस्लिम के किराये पर रहने की खबर मिले तो सारा मोहल्ला सतर्क हो जाता है।·
जापान में कोई इस्लामी या अरबी मदरसा नहीं खोल सकता है।
मतांतरण पर रोक·
जापान में मतान्तरण पर सख्त पाबंदी है।·
किसी जापानी ने अपना पंथ किसी कारणवश बदल लिया है तो उसे और साथ ही मतान्तरण कराने वाले को सख्त सजा दी जाती है।·
यदि किसी विदेशी ने यह हरकत की होती है उसे सरकार कुछ ही घंटों में जापान छोड़कर चले जाने का सख्त आदेश देती है।·
यहां तक कि जिन ईसाई मिशनरियों का हर जगह असर है, वे जापान में दिखाई नहीं देतीं।
वेटिकन के पोप को दो बातों का बड़ा अफसोस होता है। एक तो यह कि वे 20वीं शताब्दी समाप्त होने के बावजूद भारत को यूनान की तरह ईसाई देश नहीं बना सके। दूसरा यह कि जापान में ईसाइयों की संख्या में वृध्दि नहीं हो सकी।
·जापानी चंद सिक्कों के लालच में अपने पंथ का सौदा नहीं करते। बड़ी से बड़ी सुविधा का लालच दिया जाए तब भी वे अपने पंथ के साथ धोखा नहीं करते हैं।·
जापान में 'पर्सनल ला' जैसा कोई शगूफा नहीं है। यदि कोई जापानी महिला किसी मुस्लिम से विवाह कर लेती है तो उसका सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता है। जापानियों को इसकी तनिक भी चिंता नहीं है कि कोई उनके बारे में क्या सोचता है। तोकियो विश्वविद्यालय के विदेशी अध्ययन विभाग के अध्यक्ष कोमिको यागी के अनुसार, इस्लाम के प्रति जापान में हमेशा यही मान्यता रही है कि वह एक संकीर्ण सोच का मजहब है। उसमें समन्वय की गुंजाइश नहीं है।
स्वतंत्र पत्रकार मोहम्मद जुबेर ने 9/11 की घटना के पश्चात अनेक देशों की यात्रा की थी। वह जापान भी गए, लेकिन वहां जाकर उन्होंने देखा कि जापानियों को इस बात पर पूरा भरोसा है कि कोई आतंकवादी उनके यहां पर भी नहीं मार सकता।

सन्दर्भ·
जापान सम्बंधी इस चौंका देने वाली जानकारी के स्रोत हैं शरणार्थी मामले देखने वाली संस्था 'सॉलीडेरिटी नेटवर्क' के महासचिव जनरल मनामी यातु।
मुजफ्फर हुसैन द्वारा लिखित लेख के कुछ मुख्य बिन्दु जो कि पांचजन्य, के 30 मई, 2010 के अंक से लिए गए हैं।

12 टिप्‍पणियां:

Poorvi Khare ने कहा…

कभी चर्चा में नहीं आयी यह बात,, बिलकुल जानकारी नहीं थी...
जानकारी साझा करनें के लिये हार्दिक धन्यवाद..
नमस्कार,
वन्दे मातरम..

दर्शन लाल बवेजा ने कहा…

नई जानकारी आभार ...
http://sciencemodelsinhindi.blogspot.com/

vedvyathit ने कहा…

aap ko sadhuvad jo yh bahumooly jankai sanjhi ki ise aahvan ki bhanti logo ko email se bhi bhjen is ke liye viplv ji ,jeet bharv v nirj ji ko aap ka sahyog krna chahiye unhe aap jroor khe

aarya ने कहा…

इस जानकारी के लिए हम आपके शुक्रगुजार हैं |

बेनामी ने कहा…

जापान हमेशा से अपनी संस्कृति का संरक्षक रहा है | तभी तो इतने छोटे से देश ने मलय में बर्तानिया सर्कार की नाक में दम कर डाला था | होन्ग कोंग और सिंगापोरे को विजय कर के फिरंगियों की श्रेष्ठता के मिथक को नष्ट करने का कार्य भी इन्हों ने ही किया एशिया में | जब फिरंगी इनकी धरती पर पों रखते थे तो उनको अपना सामान कैसे बेचना है ये जापानी खूब जानते हैं | पर यदि वोह वहां से दफा न हों तो उनको गोली कैसे मारनी है ये भी खूब जानते थे | छोटा सा देश होने के बावजूद अपनी संस्कृति को कैसे कस के पकड़ के रक्खा जाता है ये कोई जापानियों से सीखे |

Poorviya ने कहा…

jankari ke liya sadhanyad.

बेनामी ने कहा…

ऐसी दुर्लभ जानकारी किसी भी देश के अपनी संस्‍क़ति, संप्रभुता, को वचाने के लिए पर्याप्‍त है किन्‍तु जवाहरलाल नेहरू का बाबा घियासुददीन गाजी जोकि एक कटटर सुन्‍नी मुसलमान था उसके खानदान से देश की रक्षा की अपेक्षा कैसे की जा सकती हैायह तो जापान सरीखा कोई देशभक्‍त नागरिक ही कर सकता हैा

राम प्रसाद सिंह

जीत भार्गव ने कहा…

India, Jaapaan Se Kab Sabakk Legaa?

जीत भार्गव ने कहा…

India Ko Japan Se Sabakk Lene Ki Zaroorat Hai.

ajeet ने कहा…

लेखक को यह जानकारी देने के लिए धन्यवाद, हालांकि यह जानकारी मुझे थी पर विश्वास नहीं होता था, काश इस बात पर जापान हमेशा कायम रहे, हालांकि यह निश्चित है की यदी वहां दो लाख मुसलमान रह रहे है तो वहां भी कोई ना कोई खुराफात करने की योजनायें अवश्य बनाते होंगे, और यह भी निश्चित है की दो लाख से बीस लाख होते उन्हें देर नहीं लगेगी यदी वे वहां के नागरिक हैं और निरंतर बच्चे पैदा कर रहे हैं तो, कुछ दिन पहले एक सलीम नाम के ब्लोगर ने लेख लिख दिया था की जापान में जल-जला इसलिए आया की उसने इस्लाम को प्रतिबंधित कर रखा है, अब उस मूढ़ बुद्धी को कौन समझाए की अनेको मुस्लिम देशों में उससे भी ज्यादा त्रासदियाँ आ चुकी है और दुनिया में जितने परेशान मुस्लिम देश हैं उतना और कोई नहीं, इनके धर्मग्रन्थ में लिखा है की यहूदियों को कभी शान्ति नसीब नहीं होगी उसी इसराइल की सीमा पर सेकड़ों मुसलमान रोजी रोटी के लिए सुबह साड़े तीन बजे से खड़े हो जाते हैं और यहूदी उनके पोंदों पर बैत फटकारते हैं अब समझने की बात यह है की शांती यहूदियों की भंग है या पोंदों पर बैत खाने वालों की.

naveen tyagi ने कहा…

yah bilkul saty hai.

Kismat Kumar Himachal ने कहा…

Japan se hamara desh kab seekh lega? yeh bahut jaroori hai. aise vishyon ki jankari banti rahe.