शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

विधान की मर्यादा पर प्रहार

Aug 23, 11:33 pm

हिंदुओं खासकर कश्मीरी पंडितों के बाद कश्मीर घाटी के अलागाववादियों के
निशाने पर अब सिख समुदाय है। यह बात धीरे-धीरे अब इतिहास का तथ्य बन चुकी
है कि घाटी में कभी बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों के बसेरे थे। उनके घर
थे, खेत-खलिहान थे और तमाम अन्य संपत्तिया थीं। फिर उन्हें धमकिया मिलने
लगीं, उन पर हमले होने लगे। स्थितिया यहा तक पहुंचीं कि उनका धन-मान कुछ
भी सुरक्षित नहीं रह गया। उन्हें अपनी सारी संपदा छोड़ अपने घरों से बेदखल
होना पड़ा और फिर अपने ही देश में इधर-उधर शरणार्थी बनना पड़ा। वे अभी भी
शरणार्थी बन जी रहे हैं और उनके दुखों का कोई अंत नहीं है। यह अलग बात है
राजनेताओं की ओर से उनके पुनर्वास के आश्वासन सैकड़ों बार दिए जा चुके
हैं, लेकिन इस दिशा में ऐसा कुछ वास्तव में हुआ हो, ऐसा कहीं दिखाई नहीं
देता है। वे अब भी दर-बदर हैं और इतने दिनों में

आई-गई हमारी सभी केंद्र और राज्य सरकारें हाथ पर हाथ धरे बैठी हुई हैं।
राजनीतिक आश्वासनों और सरकार पर भरोसे का इससे बुरा हश्र और क्या होगा कि
अब तो कश्मीरी पंडितों ने अपने पुनर्वास की उम्मीद भी छोड़ दी है। उनके
नाम पर राजनीतिक लाभ चाहे कितने भी उठाए जा चुके हों, पर इसका कोई लाभ
उन्हें मिला हो, ऐसा मालूम नहीं हुआ।

क्या यही अब सिखों के साथ होने जा रहा है? सिख समुदाय की देशभक्ति की
इतनी मिसालें हैं कि उनकी गिनती करना मुश्किल है। मामला चाहे मध्यकालीन
बर्बरता के खिलाफ संघर्ष का रहा हो, या अंग्रेजी शासन से देश को आजाद
कराने या फिर बाद में देश पर हुए बाहरी आक्त्रमणों का, हर स्थिति में
सिखों ने कुर्बानिया दी हैं। अब उन्हें धमकिया दी जा रही हैं। कहा जा रहा
है कि या तो वे अपना धर्म छोड़ दें या घाटी। उन्हें जबरन इस्लाम कबूल
करवाने की साजिश रची जा रही है और उनके घरों पर पत्थर तक फेंके जाने की
खबरें भी आ रही हैं। सिख समुदाय ऐसे किसी दबाव में आएगा, यह सोचना बिलकुल
गलत होगा। लेकिन इतना जरूर है कि अपनी आस्था पर दृढ़ रहने के कारण उसे
मुश्किलें उठानी पड़ सकती हैं। मुश्किलें वह उठा भी रहा है। इसे लेकर
हंगामा भी हो चुका। घाटी से लेकर दिल्ली में संसद तक हर तरफ यह सवाल
उठाया जा चुका है। केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से आश्वासनों की झड़ी भी
लग चुकी है। लेकिन ऐसे आश्वासनों का क्या भरोसा? कौन नहीं जानता कि एक
समय में ऐसे ही आश्वासन बहुत बड़ी मात्रा में कश्मीरी पंडितों को भी दिए
गए थे। आखिर उनका क्या हुआ?

हमला चाहे हिंदुओं पर हो या सिखों पर, या फिर किसी और समुदाय पर. वह हर
हाल में समुदाय पर तो बाद में, सबसे पहले राष्ट्र की मर्यादा पर है। सच
तो यह है कि समुदायों के बहाने ये हमले हमारे संविधान की मर्यादा पर किए
जा रहे हैं। भारतीय संविधान के लिए धर्मनिरपेक्षता सर्वोपरि मूल्य है।
यहा ऐसे किसी भी समूह को किसी भी कीमत पर माफ नहीं किया जाना चाहिए जो
धर्मनिरपेक्षता की हमारी मूल भावना पर हमला कर रहा हो। घाटी में यह कोई
पहली बार नहीं हो रहा है।

पहले भी ऐसा कई बार हो चुका है। कुछ चुटकी भर देशद्रोही तत्व हैं, जो
आईएसआई के टुकड़ों पर पल रहे हैं और इसीलिए वे बार-बार भारतीय संविधान की
मर्यादाओं को चुनौती दे रहे हैं। यह चुनौती कभी कश्मीरी पंडितों पर हमले
के रूप में होती है तो कभी यहा पाकिस्तानी मुद्रा को मान्यता देने की माग
के रूप में, कभी भारतविरोधी नारेबाजी के रूप में तो कभी पत्थरबाजी और कभी
सिखों को धमकी के रूप में। बात हर तरह से एक ही की जा रही है, सिर्फ रूप
बदल-बदल कर।

अपने हर रूप में यह चुनौती भारतीय संविधान को दी जा रही है। यह कहने की
जरूरत नहीं है कि हमारी व्यवस्था में संविधान सर्वोपरि है। इन हरकतों के
पीछे जो तत्व हैं, वे भी किसी से छिपे नहीं हैं। सभी जानते हैं वे चुटकी
भर अलगाववादी तत्व हैं, जो आईएसआई के टुकड़ों पर पल रहे हैं। वे ही कभी
आतंकवादियों की घुसपैठ कराते हैं तो कभी कुछ भाड़े के लोगों से पत्थरबाजी
करवाते हैं, कभी हिंसक प्रदर्शन करवाते हैं और कभी बेसिर-पैर की मागें
उठाते हैं। आईएसआई के एजेंटों की भारत में घुसपैठ कराने और यहा की खुफिया
सूचनाएं लीक करवाने के पीछे भी उनके ही हाथ हैं। हैरत की बात यह है कि
उनकी इन बेजा हरकतों पर हमारी सरकारें सब कुछ जानते-समझते हुए भी आम जनता
को कोरे आश्वासन और अराजक तत्वों को घुड़की देने के अलावा कुछ भी नहीं
करती हैं। अभी भी यही हो रहा है। बहरहाल यह संतोषजनक बात है कि पहली बार
पत्थरबाजों पर नकेल कसने की कोशिश भी की गई है। लेकिन सवाल यह है कि यह
नीति कब तक चल सकेगी?

हम यह देख चुके हैं कि शाति के सभी प्रयास विफल रहे हैं। शाति के नाम पर
तो हालत यह है कि मर्ज बढ़ता ही गया ज्यों-ज्यों दवा की। भारत सरकार ने
कश्मीर घाटी में शाति की बहाली के लिए जितने शातिपूर्ण प्रयास किए हैं,
विश्व में कहीं भी ऐसा उदाहरण मिलना मुश्किल है। दुनिया के किसी भी देश
ने इतने धैर्य का परिचय नहीं दिया होगा, जितना भारत सरकार ने दिया। इसके
बावजूद इसका हमें कोई लाभ नहीं मिला। शायद हमारी सदाशयता और उदारता को ही
अराजक तत्वों ने हमारी कमजोरी मान लिया है। यही वजह है जो अब वे इस हद तक
आ गए। इस स्थिति को तुरंत रोका जाना चाहिए। इसके पहले कि सिखों या किसी
भी समुदाय को दुबारा ऐसी धमकिया मिलें या उन पर ऐसी किसी बात के लिए किसी
भी तरह से दबाव बनाया जाए, धमकिया देने वालों की अक्ल ठिकाने लगा दी जानी
चाहिए।

सच तो यह है कि अराजक तत्व कभी भी शातिपूर्ण समाधान का कोई प्रयास सफल
होने ही नहीं देते। क्योंकि उनके लिए शाति का अर्थ भय होता है। वे सिर्फ
तभी शात होते हैं, जब उन्हें भय दिखाया जाता है। जब अराजक तत्वों को सजा
नहीं दी जाती तो इससे उनका और उनके जैसे दूसरे लोगों का मनोबल बढ़ता है।
वे शात होने के बजाय और अधिक उद्दंड होते चले जाते हैं।

संप्रग अध्यक्ष सोनिया गाधी ने भी कश्मीर के हालात पर चिंता जताई है,
लेकिन इससे स्थितिया सुधरने वाली नहीं हैं। स्थितिया सुधरें, इसके लिए
भारत सरकार को कड़े कदम उठाने होंगे। सिर्फ कहने से काम नहीं चलेगा, साफ
तौर पर खुलकर सामने आना होगा। उन सभी तत्वों को बिना किसी संकोच के
नेस्तनाबूद करना होगा जो घाटी में आतंकवाद फैलाने, आतंकवादियों की मदद या
किसी भी तरह से अलगाववाद को हवा देने में लगे हुए हैं। उन सब को चुन-चुन
कर कड़ी सजा देनी होगी, ताकि दूसरे ऐसा कुछ करने की हिम्मत न जुटा सकें।
सिर्फ बातें करने से कुछ होने वाला नहीं है।

[निशिकान्त ठाकुर: लेखक दैनिक जागरण के स्थानीय संपादक हैं]

1 टिप्पणी:

गजेन्द्र सिंह ने कहा…

सरकार समस्या का हल तभी चाह सकती जब शायद
राहुल गाँधी कश्मीर दौरे से आने के बाद प्रधानमंत्री से मिले ....
http://thodamuskurakardekho.blogspot.com