सोमवार, 23 अगस्त 2010

कोटि हिन्दु जन का ज्वार, मंदिर के लिए सब तैयार ......

0 डॉ0 नवीन जोशी
क्या सूरज को सूरज होने का प्रमाण देना पड़ता है या चाँद को अपनी चांदनी साबित करना पड़ती है, मगर ये भारतीय जन के विश्वास पर चोट है कि इस देश में ‘राम जन्मभूमि’ को प्रामाणिकता की जंग लड़ना पड़ रही है । कोटि-कोटि हिन्दु जन के मन में आस्था का प्रतीक बने रामलला के मन्दिर निर्माण में बरसों से दांव पेंच चले जा रहे हैं । राजनीतिज्ञों ने मंदिर को मुद्दे की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है ।
यदि राष्ट्र की धरती छिन जाए तो शौर्य उसे वापस ला सकता है, यदि धन नष्ट हो जाए तो परिश्रम से कमाया जा सकता है, यदि राज्य सत्ता छिन जाए तो पराक्रम उसे वापस ला सकता है परन्तु यदि राष्ट्र की चेतना सो जाए, राष्ट्र अपनी पहचान ही खो दे तो कोई भी शौर्य, श्रम या पराक्रम उसे वापस नहीं जा सकता । इसी कारण भारत के वीर सपूतों ने, भीषण विषम परिस्थितियों में, लाखों अवरोधों के बाद भी राष्ट्र की इस चेतना को जगाए रखा । इसी राष्ट्रीय चेतना और पहचान को बचाए रखने का प्रतीक है श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण का संकल्प ।
अयोध्या की गौरवगाथा अत्यन्त प्राचीन है । अयोध्या का इतिहास भारत की संस्कृति का इतिहास है । अयोध्या सूर्यवंशी प्रतापी राजाओं की राजधानी रही, इसी वंश में महाराजा सगर, भगीरथ तथा सत्यवादी हरिशचन्द्र जैसे महापुरूष उत्पन्न हुए, इसी महान परम्परा में प्रभु श्रीराम का जन्म हुआ । पाँच जैन तीर्थंकरों की जन्मभूमि अयोध्या है । गौतम बुद्ध की तपस्थली दंत धावन कुण्ड भी अयोध्या की ही धरोहर है । गुरूनानक देव जी महाराज ने भी अयोध्या आकर भगवान श्रीराम का पुण्य स्मरण किया था, दर्शन किए थे । श्रीराम जन्मभूमि पर कभी एक भव्य विशाल मन्दिर खड़ा था । मध्ययुग में धार्मिक असहिष्णु, आतताई, इस्लामिक आक्रमणकारी बाबर के क्रूर प्रहार से जन्मभूमि पर खड़े सदियों पुराने मन्दिर को ध्वस्त कर दिया । आक्रमणकारी बाबर के कहने पर उसके सेनापति मीरबाकी ने मन्दिर को तोड़कर ठीक उसी स्थान पर एक मस्जिद जैसा ढांचा खड़ा कराया । 1528 ई. के इस कुकृत्य से सदा-सदा के लिए हिन्दू समाज के मस्तक पर अपमान का कलंक लग गया । श्रीराम जन्मस्थान पर मन्दिर का पुनःनिर्माण इस अपमान के कलंक को धोने के लिए तथा हमारी आस्था की रक्षा के साथ-साथ भावी पीढ़ी को प्रेरणा देने के लिए आवश्यक है ।
हिन्दुओं के आराध्य भगवान श्रीराम की जन्मभूमि पर बने मन्दिर को तोड़कर मस्जिद बनाने का वर्णन अनेक विदेशी लेखकों और भ्रमणकारी यात्रियों ने किया है । फादर टाइफैन्थेलर का यात्रा वृत्तन्त इसका जीता-जागता उदाहरण है । आस्ट्रिया के इस पादरी ने 45 वर्षो तक (1740 से 1785) भारतवर्ष में भ्रमण किया, अपनी डायरी लिखी । लगभग पचास पृष्ठों में उन्होंने अवध का वर्णन किया, उन्होंने लिखा कि रामकोटि में तीन गुम्बदों वाला ढांचा है उसमें 14 काले कसौटी पत्थर के खम्भे लगे हैं, इसी स्थान पर भगवान श्रीराम ने अपने तीन भाइयों के साथ जन्म लिया । भावी मन्दिर का प्रारूप बनाया गया । अहमदाबाद के प्रसिद्ध मन्दिर निर्माण कला विशेषज्ञ श्री सी.बी. सोमपुरा ने प्रारूप बनाया । इन्हीं के दादा ने सोमनाथ मन्दिर का प्रारूप बनाया था । मन्दिर निर्माण के लिए जनवरी, 1989 में प्रयागराज में कुम्भ मेला के अवसर पर पूज्य देवराहा बाबा की उपस्थिति में गांव-गांव में शिलापूजन कराने का निर्णय हुआ । पौने तीन लाख शिलाएं पूजित होकर अयोध्या पहुँची । विदेश में निवास करने वाले हिन्दुओं ने भी मन्दिर निर्माण के लिए शिलाएं पूजित करके भारत भेजीं । पूर्व निर्धारित दिनांक 09 नवम्बर, 1989 को सब अवरोधों को पार करते हुए सबकी सहमति से मन्दिर का शिलान्यास बिहार निवासी श्री कामेश्वर चौपाल के हाथों सम्पन्न हुआ । तब उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री कांग्रेस के श्री नारायण दत्त तिवारी और भारत सरकार के गृहमंत्री श्री बूटा सिंह तथा प्रधानमंत्री स्व0 राजीव गांधी थे ।
24 मई, 1990 को हरिद्वार में विराट हिन्दू सम्मेलन हुआ । सन्तों ने घोषणा की कि देवोत्थान एकादशी (30 अक्टूबर, 1990) को मन्दिर निर्माण के लिए कारसेवा प्रारम्भ करेंगे । यह सन्देश गांव-गांव तक पहुँचाने के लिए 01 सितम्बर, 1990 को अयोध्या में अरणी मंथन के द्वारा अग्नि प्रज्जवलित की गई, इसे ‘रामज्योति’ कहा गया । दीपावली 18 अक्टूबर, 1990 के पूर्व तक देश के लाखों गांवों में यह ज्योति पहुँचा दी गई । उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ने अहंकारपूर्ण घोषणा की कि ‘अयोध्या में परिन्दा भी पर नहीं मार सकता, उन्होंने अयोध्या की ओर जाने वाली सभी सड़कें बन्द कर दीं, अयोध्या को जाने वाली सभी रेलगाड़ियाँ रद्द कर दी गईं, 22 अक्टूबर से अयोध्या छावनी में बदल गई । फैजाबाद जिले की सीमा से श्रीराम जन्मभूमि तक पहुँचने के लिए पुलिस सुरक्षा के सात बैरियर पार करने पड़ते थे । फिर भी रामभक्तों ने 30 अक्टूबर को वानरों की भांति गुम्बदों पर चढ़कर झण्डा गाड़ दिया । सरकार ने 02 नवम्बर, 1990 को भयंकर नरसंहार किया । 3 दिसम्बर, 1992 को जब ढांचा गिर रहा था तब उसकी दीवारों से शिलालेख प्राप्त हुआ । विशेषज्ञों ने पढ़कर बताया कि यह शिलालेख 1154 ई. का संस्कृत में लिखा है, इसमें 20 पंक्तियाँ हैं । ऊँ नमः शिवाय से यह शिलालेख प्रारंभ होता है । विष्णुहरि के स्वर्ण कलशयुक्त मन्दिर का इसमें वर्णन है । अयोध्या के सौन्दर्य का वर्णन है । दशानन के मान-मर्दन करने वाले का वर्णन है । ये समस्त पुरातात्त्विक साक्ष्य उस स्थान पर कभी खड़े रहे भव्य एवं विशाल मन्दिर के अस्तित्व को ही सिद्ध करते हैं । सरकारें और न्यायालय भी इस सच को झुठला नहीं सके ।
6 दिसम्बर, 1992 का ढांचा ढह जाने के बाद तत्काल बीच वाले गुम्बद के स्थान पर ही भगवान का सिंहासन और ढांचे के नीचे परम्परा से रखा चला आ रहा विग्रह सिंहासन पर स्थापित कर पूजा प्रारंभ कर दी । हजारों भक्तों ने रात और दिन लगभग 36 घण्टे मेहनत करके बिना औजारों के केवल हाथों से उस स्थान के चार कोनों पर चार बल्लियाँ खड़ी करके कपड़े लगा दिए 5-5 फीट ऊँची, 25 फीट लम्बर, 25 फीट चौड़ी ईंटों की दीवार खड़ी कर दी और बन गया मन्दिर । आज भी इसी स्थान पर पूजा हो रही है, जिसे अब भव्य रूप देना है, जो विशाल हिन्दू जन किसी भी वक्त कर देगा ।
07 जनवरी 1993 को भारत सरकार ने ढांचे वाले स्थान को चारों ओर से घेरकर लगभग 67 एकड़ भूमि का अधिग्रहण कर लिया । इस भूमि के चारों ओर लोहे के पाईपों की ऊँची-ऊँची दोहरी दीवारें खड़ी कर दी गईं । भगवान तक पहुँचने के लिए बहुत संकरा गलियारा बनाया, दर्शन करने जाने वालों की सघन तलाशी की जाने लगी । जूते पहनकर ही दर्शन करने पड़ते हैं । आधा मिनट भी ठहर नहीं सकते । वर्षा, शीत, धूप से बचाव के लिए कोई व्यवस्था नहीं है । इन कठिनाइयों के कारण अतिवृद्ध भक्त दर्शन करने जा ही नहीं सकते । अपनी इच्छा के अनुसार प्रसाद नहीं ले जा सकते । जो प्रसाद शासन ने स्वीकार किया है वही लेकर अन्दर जाना पड़ता है । दर्शन का समय ऐसा है मानो सरकारी दफ्तर हो । दर्शन की यह अवस्था अत्यन्त पीड़ादायी है । इस अवस्था में परिवर्तन लाना है जो इस वर्ष संभव होता प्रतीत है ।
अब नए स्वरूप में मंदिर बनेगा:- श्रीराम जन्मभूमि पर बनने वाला मन्दिर तो केवल पत्थरों से बनेगा । सीमेन्ट, कांक्रीट से नहीं । मन्दिर में लोहा नहीं लगेगा । नींव में भी नहीं । मन्दिर दो मंजिला होगा । भूतल पर रामलला और प्रथम तल पर राम दरबार होगा । सिंहद्वार, नृत्य मण्डप, रंग मण्डप, गर्भगृह और परिक्रमा मन्दिर के अंग हैं । 270 फीट लम्बा, 135 फीट चौड़ा तथा 125 फीट ऊँचा शिखर है । 10 फीट चौड़ा परिक्रमा मार्ग है । 106 खम्भे हैं । 6 फीट मोटी पत्थरों की दीवारें लगेंगी । दरवाजों की चोखटें सफेद संगमरमर पत्थर की होंगी । 1993 में मन्दिर निर्माण की तैयारी तेज कर दी गई । मन्दिर में लगने वाले पत्थरों की नक्काशी के लिए अयोध्या, राजस्थान के पिण्डवाड़ा व मकराना में कार्यशालाएं प्रारम्भ हुई । अब तक मन्दिर के फर्श पर लगने वाला सम्पूर्ण पत्थर तैयार किया जा चुका है । भूतल पर लगने वाले 16.6 फीट के 108 खम्भे तैयार हो चुके हैं । रंग मण्डप एवं गर्भगृह की दीवारों तथा भूतल पर लगने वाली संगमरमर की चौखटों का निर्माण पूरा किया जा चुका है । खम्भों के ऊपर रखे जाने वाले पत्थर के 185 बीमों में 150 बीम तैयार हैं । मन्दिर में लगने वाले सम्पूर्ण पत्थरों का 60 प्रतिशत से अधिक कार्य पूर्ण हो चुका है । हम समझ लें कि श्रीराम जन्मभूमि सम्पत्ति नहीं है बल्कि हिन्दुओं के लिए श्रीराम जन्मभूमि आस्था है । भगवान की जन्मभूमि स्वयं में देवता है, तीर्थ है व धाम है ।
क्या है कोर्ट के हालात
श्रीराम जन्मभूमि के लिए पहला मुकदमा हिन्दु की ओर से जिला अदालत में जनवरी, 1950 में दायर हुआ । दूसरा मुकदमा रामानन्द सम्प्रदाय के निर्मोही अखाड़ा की ओर से 1959 में दायर हुआ । सुन्नी मुस्लिम वक्फ बोर्ड की ओर से तो दिसम्बर, 1961 में मुकदमा दायर हुआ । 40 साल तक फैजाबाद की जिला अदालत में ये मुकदमे ऐसे ही पड़े रहे । वर्ष 1989 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश देवकीनन्दन अग्रवाल (अब स्वर्गीय) ने स्वयं रामलला और राम जन्मस्थान को वादी बनाते हुए अदालत में वाद दायर कर दिया, मुकदमा स्वीकार हो गया । सभी मुकदमें एक ही स्थान के लिए हैं अतः सबको एक साथ जोड़ने और एक साथ सुनवाई का आदेश भी हो गया । सितम्बर 2010 में फैसला आना है, निर्णय जो भी हो, अब जनमेदिनी की अटूट आस्था पर ‘ मुहर ’ लगना ही है । मंदिर निर्माण को लेकर सभी हिन्दू एक स्वर में उद्घोष कर रहे हैं - ‘‘ कोटि हिन्दु जन का ज्वार बन कर रहेगा मंदिर इस बार ।’’

कोई टिप्पणी नहीं: