मंगलवार, 27 जुलाई 2010

हिन्दू आतंकवादी प्रमाणित करने का षड़यंत्र

-रमेश पतंगे
‘आज तक’ समाचार चैनल का आक्रोश अधिकांश दर्शकों ने देखा ही है। लोकतंत्र में प्रचार माध्यम यह एक चैथा स्तंभ होता है। यह स्तंभ सत्य का अन्वेषण करने वाला, किसी भी कीमत पर न बिकने वाला, निस्पृह एवं निरपेक्ष होना चाहिए। हमारे देश में लोकतंत्र के सभी स्तंभों की दशा दयनीय ही है। चैथा स्तंभ भी उसका अपवाद नहीं है। पैसा लेकर समाचार देना यह एक सामान्य सी बात हो गई है। मुंबई में एकाध नेता को अपना आलेख छपवाना हो तो प्रमुख समाचार पत्र दस लाख से शुरू होते हैं। किस खबर को देना और किसे नहीं इसके लिए भी सौदेबाजी चलती है। किसको सिर पर बिठाना और किसका मान मर्दन करना इसके लिए भी सौदेबाजी चलती है। इसलिए चैथे स्तंभ पर हमला याने लोकतंत्र पर हमला यह भाषा का प्रयोग ठीक नहीं, ‘आज तक’ के लिए तो बिल्कुल भी नहीं। हिंसक घटना अनुचित है, उसका समर्थन किया ही नहीं जा सकता, कारण हिंसा, हिंसा को ही जन्म देती है यह एक शाश्वत सत्य है। इसलिए इस संदर्भ में यह घटना खराब है। परंतु ‘आज तक’ उसी लायक है और सत्य के नाम पर जो झूठ उसने दिखाया है उसने चैथे स्तंभ की प्रामाणिकता को रसातल पर पहुंचा दिया है।
टीवी टुडे के एंकर ‘सेफरन टेररिजम’ पर एक स्टोरी दे रहे थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक मा. श्री इन्द्रेश जी को दिखाते हुए बार-बार यह बताया जा रहा था कि वे अजमेर एवं मक्का मस्जिद के बम विस्फोट में प्रमुख आरोपी हैं। यह सुनकर वाकई सुनने वालों के खून में उबाल आ रहा था। एंकर यानी तोता। वह वही बोलता या दिखाता है जो उसका मालिक उसे कहता है। कारण वह सिर्फ नौकरी कर रहा होता है अपने पेट के लिए। इसलिए एक क्षण उस पर दया भी आती है। पेट के लिए मनुष्य का कितना अधः पतन हो सकता है यह हम टीवी पर देख सकते हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दहशतगर्दी जारी है, यह टीवी टुडे चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा था। और इसके लिए जो प्रमाण दिए वह स्तरहीन हास्यास्पद थे। पत्रकारिता के सामान्य मूल्यों के खिलाफ थे। कल श्रीमती सोनिया गांधी पर एक फिल्म तैयार की जा सकती है। इटली से भारत पर कब्जे के लिए वे क्या-क्या षड़यंत्र कर रही हैं। क्वात्रोची ने कितना पैसा दिया, कब दिया? कांग्रेेस के खास लोगों को कैसे खरीदा गया? दलितों का कैसे ईसाईकरण किया गया। पैसा लेकर एक एंकर यह फिल्म दिखाए तो उसकी क्या विश्वसनीयता रहेगी? समझदार आदमी कहेगा कि ऐसी फिल्म बनाने वाले को हंटर से पीटना चाहिए। टीवी टुडे इसी लायक है।
टीवी टुडे स्वयं होकर यह साहस नहीं कर सकता। उसे बुलवाने वाला कोई और हैै। हिन्दू आतंकवाद शब्द का पहला प्रयोग श्री शरद पवार ने 2009 के आम चुनाव में पहली बार किया था। मालेगांव बम विस्फोट में साध्वी प्रज्ञा का नाम घसीटा गया। प्रकरण न्यायालय में विचाराधीन है पर इससे पहले ही उन्हें हिन्दू आतंकवादी प्रमाणित करने का षड़यंत्र जारी है। पवार का दल भले ही राष्ट्रवादी कांग्रेस के नाम से हो पर मूल रूप से वे कांग्रेसी ही है। कांग्रेसवाद क्या है यह हमें समझना चाहिए।
कांग्रेस ने देश विभाजन का जघन्य अपराध किया। देश के साथ विश्वासघात किया। कांग्रेस तो एक दो आम चुनाव के बाद स्वतः ही साफ हो जाती। पर इससे पहले ही नाथूराम गोडसे ने कांग्रेस को एक महाअस्त्र दे दिया। महात्मा गांधी की प्रतिमा मुस्लिमों के हितचिंतक के रूप में थी। गोडसे ने विभाजन के लिए प्रमुख दोषी जिéा के स्थल पर महात्मा गांधी की हत्या की। कांग्रेस ने इस दुर्भाग्यपूर्ण हत्या का राजनीतिक लाभ लेते हुए गांधी हत्या का आरोप संघ के ऊपर मढ़ दिया। साथ ही मुस्लिमों के मन में संघ के प्रति विद्वेष एवं कांग्रेस के प्रति सहानुभूति के बीज बो दिए। मुस्लिमों का रक्षण कांग्रेस ही कर सकती है ऐसा प्रचार किया। मुस्लिमों का वोट बैंक तैयार कर राज करने की नीति ही कांग्रेसवाद कहलाता है।
पं. नेहरू ने इसी नीति के तहत धारा 370 का प्रयोग शुरू किया। कश्मीर को स्वतंत्र दर्जा दिया गया। कश्मीर के लिए अलग ध्वज, अलग कानून एवं कश्मीर घाटी में हिन्दुओं की हत्या पर मौन, मुस्लिमों के लिए उदार आर्थिक पैकेज शुरू किए गए। इंदिरा गांधी ने इससे अलग कुछ नहीं किया। राजीव गांधी ने शाहबानों प्रकरण के लिए संविधान में ही संशोधन कर दिया। इसके बाद मुस्लिमों के तुष्टिकरण के और प्रयास शुरू किए। बात यहीं तक नहीं रूकी है। अब एक और चिंताजनक तथ्य यह है कि अब मुस्लिम आतंकियों का तुष्टिकरण प्रारंभ हो गया है। आतंकवाद पर पाकिस्तान से बातचीत जारी है। इसी तरह गौ हत्या बंद होनी चाहिए इस मांग को कांग्रेस महत्व नहीं देती है यही कांग्रेसवाद है।
सत्ता अगर चाहिए तो मुस्लिम वोट मिलने ही चाहिए। और मुस्लिम वोट पाने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कठघरे मे खड़ा करना ही होगा। गांधी हत्या का विषय कई चुनावों तक चला। अब वो पीढ़ी गई। गांधीवाद भी आज अप्रासंगिक है। गांधीजी का उपयोग अब सिर्फ कर्मकांड के लिए है। कांग्रेस के नेता यह कर्मकांड पूर्ण करके स्वयं को गांधीवादी कहते हैं। गांधी जी का एक उपयोग और है वह है राष्ट्रवादियों के खिलाफ उनका प्रयोग करना।
इसके लिए हिन्दुओं को गाली देना आवश्यक है। उन्हें हिंसक बताना पड़ता है, मुस्लिम विरोधी बताना पड़ता है। शरद पवार ने इसीलिए वर्ष 2009 में मुस्लिम वोटों के लिए हिन्दू आतंकवाद शब्द का प्रयोग किया और मुस्लिम वोट प्राप्त कर चुनावों में सफलता प्राप्त की।
टीवी टुडे ने 16 जुलाई को जो बचकानापन किया, वह दिखने में जितना बचकाना है उतना है नहीं। कांग्रेस की व्यूह रचना का एक भाग है। इसके लिए लोकतंत्र के चैथे खम्बे के साथ करोड़ों का सौदा भी हुआ होगा इसकी पूरी-पूरी संभावना है। अभी बिहार में चुनाव है। फिर उत्तर प्रदेश में बंगाल में और फिर पूरे देश में है। एक बात पर कोई विषय परिणाम नहीं देता है। चावल धीरे-धीरे पकते हैं। वोटों का चावल भी धीरे-धीरे ही पकेगा। हिन्दू वोटों की कांग्रेस को चिन्ता नहीं है। कांग्रेस को जातिगत वोटों की चिंता है। शरद पवार मराठा हिन्दू हैं पर हिन्दुओं के नेता नहीं हैं। वे भी ऐसा ही मानते हैं। इसलिए वे मराठा समाज और मुस्लिम वोट की चिंता करते हैं और सत्ता प्राप्त करते हैं। सत्ता का यह सरल सूत्र है।
इस सूत्र को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी आज समग्र दृष्टिकोण के साथ सम्पूर्ण देश में लागू करने का आव्हान कर रहा है। संघ सत्ता की राजनीति नहीं करता। परंतु संघ के विचार से मत प्रभावित होते हैं। संघ जातिगत राजनीति को मान्यता नहीं देता। संघ पंथ भेद भी नहीं मानता। कारण धर्म एक ही है वह है सनातन धर्म। शेष सभी उपासना मार्ग हैं। प्रत्येक अपनी इच्छा के अनुरूप उपासना पद्धति का पालन करें।
यह संघ की मान्यता है। यह मान्यता जातिगत एवं पंथ आधारित वोटों की राजनीति के विरुद्ध आव्हान खड़ी करती है। संघ की आलोचना कौन करता है? संघ की आलोचना सर्वश्री दिग्विजय सिंह, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह, रामविलास पासवान, आदि नेता करते हैं जो स्वयं जातिगत या पंथ आधारित राजनीति करते हैं। धर्म पंथ आधारित राजनीति के स्थान पर हम इसे मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति भी कह सकते हैं। देशभर में ऐसे सत्ता केन्द्र संघ के विरुद्ध स्थान-स्थान पर खड़े हैं। सत्ता की सहायता से वे सीबीआई, एटीएस का दुरुपयोग कर संघ को बदनाम भी करते हैं।
संघ के सामने आव्हान की यह परिस्थिति इन दुष्ट प्रवृत्तियों ने निर्मित की है। थोड़ा विचार करें तो यह परिस्थिति आज ही निर्मित हुई है ऐसा नहीं है। संघ के खिलाफ संघर्ष उसकी स्थापना काल से ही है। संघ का स्वयंसेवक संघर्ष से घबराता भी नहीं है। कारण उसे मालूम है कि यह संघर्ष अधर्म के विरुद्ध धर्म का है। रावण प्रवृत्ति साधन संपन्न हैं। रावण रथी है तो राम विरथी है। पर राम तो धर्म के लिए संघर्ष कर रहे थे इसलिए उनकी विजय हुई।
गहराई में इस संघर्ष का विचार करें तो यह संघर्ष संघ विरुद्ध दुष्ट प्रवृत्ति का न होकर हिन्दू समाज में एवं हिन्दू समाज की दुष्ट प्रवृत्ति के बीच है। संघ के खिलाफ हमला मुल्ला मौलवी या फादर नहीं करते यह हमला अपने समाज के लोग ही करते हैं। आने वाले समय में सज्जन शक्ति को खड़ा होना ही पड़ेगा। इसे संगठित करना ही पड़ेगा। यह संघर्ष सभी मोर्चों पर है। प्रचार माध्यम भी एक ऐसा ही मोर्चा है तो दूसरा मोर्चा राजकीय है। एक मोर्चा सड़क पर है तो दूसरा न्यायालय है। एक मोर्चा बौद्धिक क्षेत्र का है तो दूसरा मोर्चा बाहुबल के स्तर पर भी है। सभी मोर्चों पर संघर्ष अटल है। ऐसे समय में संघ का एक गीत याद आता है। संकट की बेला है शत्रुओं ने घेरा है। हम अजेय राष्ट्र शक्ति संगठित करें। नगर, ग्राम डगर, डगर संघमंत्र दें।
अनुवाद अतुल तारे

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