बुधवार, 7 अप्रैल 2010

कौन बतायेगा गोविन्दाचार्य को भाजपा का रोडमैप!


कोडिपाक्कम् नीलमेघाचार्य गोविन्दाचार्य आजकल फिर से चर्चा में हैं। इस बार चर्चा जोर-शोर से है। यह चर्चा अनायास नहीं है और ना ही संकुचित अथवा नकारात्मक। इस बार की चर्चा सधी हुई और सच्चाई के इर्द-गिर्द है। गोविन्दाचार्य दिल्ली से भोपाल आते हैं तो लोग आपस में बाते करते हैं-आजकल गोविन्दजी भोपाल में अधिक समय दे रहे हैं, क्या बात है! लेकिन गोविन्दाचार्य 3 अप्रैल की सुबह दिल्ली क्या गए एक चर्चा तेजी से भोपाल से लेकर दिल्ली तक चली - गोविंदजी भाजपा में जाने वाले हैं! यह चर्चा जिन लोगों के बीच थी उनमें भाजपा-संघ से जुड़े लोग तो थे ही मीडिया और समाज के विभिन्न वर्गो के लोग भी थे। बहरहाल अपने दिल्ली प्रवास और इन चर्चाओं के बीच ही गाविन्दाचार्य ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सफाई दी। उन्होंने कहा - उनका भाजपा में दोबारा जाने का कोई इरादा नहीं है। उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि उनकी गतिविधियों को किसी खास राजनीतिक दल से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। गोविन्दाचार्य ने पत्रकारों से बातचीत में यह दलील भी दी कि वर्तमान में अपने कार्य से संतुष्ट हैं। जब पत्रकारों ने उन्हें पलायनवादी कहा तो उन्होंने कहा - भाजपा में वापसी चाहने वाले लोग सामने आएं और रोडमैप बताएं।
गोविनदाचार्य भाजपा में जाएं या ना जाएं लेकिन देश में एक बड़ा वर्ग है जो चाहता है कि वे और उनके जैसे नेता भाजपा में रहें। हालांकि ऐसा चाहने वालों का भाजपा पर कोई वश नहीं है। लेकिन वे बेबस भी नहीं है। भाजपा, संघ और हिन्दुत्व से जुड़े नेताओं को लेकर घर वापसी के कयास और चर्चाएं अनायास नहीं हैं। इस बात को कौन झुठला सकता है कि भाजपा के विस्तार में गोविन्दाचार्य, कल्याण सिंह, उमा भारती, बाबूलाल मरांडी, मदनलाल खुराना जैसे नेताओं का अमूल्य योगदान है। भाजपा ने अपने इतिहास का सर्वोत्तम प्रदर्शन इन्हीं नेताओं के साथ किया था। इन नेताओं के बिना भाजपा कमजोर हो गई। आज हालत यह है कि नेता बढ़ रहे हैं, पार्टियां बढ़ रही हैं और इनके अनुपात में देश की समस्याएं और चुनौतियां भी। सच तो यह है कि चाहे नेता और संगठन कितने ही बढ़ जाएं, लेकिन कमजोर नेता संगठन देश की किसी भी समस्या या चुनौती का सामना नहीं कर सकते।
भारत को सुरक्षित और वैभवसम्पन्न बनाने के लिए संघ चाहे जितना प्रयास करे, लेकिन देश के समक्ष आसन्न समस्याएं भी सुरसा की तरह मुंह बाए जा रही हैं। हिन्दुत्व का संरक्षण, हिन्दुत्व का बंटाधार करके नहीं किया जा सकता। यह विडंबना ही है या और कुछ कि एक तरफ माओवादी भारतीय नेशन-स्टेट को चुनौती देते हुए युद्ध के लिए ललकार रहे हैं, केन्द्र की यूपीए सरकार इटली की राजकुमारी सोनिया के नेतृत्व में अल्पसंख्यक एजेडा बहुसंख्यकों पर थोप रही हैं, बरेली, हैदराबाद से लेकर बंगाल के 24 परगना में हिन्दुओं का कत्लेआम हो रहा है, विकासपुरुष नरेन्द्र मोदी सेक्यूलरों के निशाने पर हैं और चीन-पाकिस्तान मोके की ताक में है वहींं दूसरी ओर राष्ट्रवादीं शक्तियां अपने तुच्छ स्वार्थ और अहंकार का खेल खेलने में व्यस्त हैं। विहिप के वरिष्ठ नेता अशोक सिंहल भाजपा के वरिष्ठ नेता आडवानी पर अयोध्या आंदोलन को नुकसान पहुचाने का आरोप लगा रहे हैं। भाजपा के नेता अपनी औकात भूलकर अपने ही घर के लोगों को घर आने का न्यौता देने, उनका मान-मनुहार कर घर वापस लाने की बजाए ओछी बयानबाजी कर रहे हैं। गोविन्दाचार्य भाजपा का रोडमैप मांग रहे हैं और भाजपा के बयानवीर उमाभारती से वापसी का प्रस्ताव। क्या इन बयानवीरों को देश और हिन्दुत्व के समक्ष खड़ी चुनौतियां का अंदाज है? अगर होता तो वे बजाए इधर-उधर की बात करने के, गलत और ओछी बयानबाजी करने के अपना घर मजबूत करते और चुनौती देने वालों पर टूट पड़ते। संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्रीगुरुजी ने देश के संतों को एक मंच पद लाने के लिए किसी संत से प्रस्ताव की मांग नहीं की थी, अपना अहंकार तिरोहित कर पहली बार चारों शंकराचार्यों को एक मंच पर बैठाया था। वे हिन्दुत्व और देश में एका चाहते थे।
स्वामी रामदेव अपनी अलग पार्टी बनायेंगे, कल्याण सिंह अपना अलग दल चलायेंगे, उमा भारती अपनी पार्टी बनायेंगी, बाबूलाल मरांडी अलग चुनाव लड़ेंगे तो हिन्दुत्व का बंटाधार होगा या हिन्दू राष्ट्र का सपना साकार होगा! जब देश की व्यवस्था राजनीति केन्द्रित है तो उसे उतना महत्व तो देना ही होगा। अगर देश की राजनीति को हिन्दुत्व केन्द्रित करना है तो हिन्दुत्व की राजनीति करने वाले न सिर्फ पैदा करना होंगे, बल्कि उन्हें विकसित और अलग-थलग हुए नेताओं को एक साथ लाना भी होगा।
देश की राजनीति का चाल, चरित्र और चेहरा भाजपा से अलग करके नहीं देखा जा सकता। भाजपा को हिन्दुत्व और संघ से अलग करके नहीं देखा जा सकता। उमा भारती हों या कल्याण सिंह वे भाजपा को कमजोर करके और कांग्रेस या अन्य दल को मजबूत करके चैन से नहीं रह सकते। उन्हें चैन, सुकून और आनंद तभी मिलेगा जब वे भाजपा का विस्तार, हिन्दुत्व को प्रभावशाली और देश को वैभवसम्पन्न होता हुआ देखेंगे।
भाजपा को मजबूत होने के लिए किसी से प्रस्ताव मांगने की जरुरत नहीं है। उसे अपना प्रस्ताव जारी करना चाहिए। अगर अटल-आडवानी न कर सकें तो पार्टी अध्यक्ष के नाते नितिन गडकरी को बडपप्पन दिखाना चाहिए, पूरे साहस के साथ हिन्दुत्व की राजनीति के पैरोकारों को भाजपा के मंच पर लाने की पहल करनी चाहिए। आवश्यक हो तो नेताओं के पैर पकड़कर उन्हें साथ लाने की कोशिश हो। कमजोर भाजपा और कमजोर नेता आज देश के समक्ष खडी विराल चुनौतियों का सामना नहीं कर सकते। इसके लिए भाजपा को मजबूत होना पड़ेगा।
भाजपा के नेताओं और गांविन्दाचार्य को अपनी सीमाओं का पता होगा। देश की जागरुक जनता को भी है। गोविन्दाचार्य की उर्जा, क्षमता और अनुभव किसी सक्षम संगठन के माध्यम से ही परिणामकारी हो सकते है। देश ने ये अनुभव किया है कि उनका सर्वोत्तम प्रदर्शन एक राजनीतिक कार्यकर्ता व विचारक के रूप में ही हुआ है। आपातकाल में जयप्रकाश आंदोलन में उनकी भूमिका और भाजपा को संगठनात्मक और वैचारिक विस्तार देने में उनके योगदान को नकारना कृतघ्नता होगी। देश आज जिस दोराहे पर है भाजपा भी उसी पर है। राष्ट्रीय राजनीति का तकाजा है कि वो दो ध्रवीय हो। इसके लिए भाजपा को अपना काफी विस्तार करना है। उसे देश की जनता के साथ-साथ अन्य दलों के साथ भी ताले-मेल करना है। यह सब करते हुए भाजपा को वैचारिक प्रतिबद्धता और नीति-सिद्धांत का पालन भी करना है। गोविन्दाचार्य यह सब कर सकते हैं, उन्होंने यह सब किया है।
गोविन्दाचार्य चाहें, न चाहें, भाजपा नेता चाहें न चाहें, लेकिन देश की राष्ट्रवादी शक्तियां और लोग चाहते हैं कि भाजपा मजबूत हो। भाजपा ही हिन्दुत्व की राजनीतिक पताका फहराये। गाहे-बगाहे यह चर्चा भी है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हर कीमत पर हिन्दुत्व का एकीकरण-सुदृढीकरण चाहता है। इसमें हिन्दुत्वादी राजनीति का एकीकरण भी है। संघ यह भी कोशिश करेगा कि स्वामी रामदेव जी जैसे लोग राजनीति को हिन्दुत्वनिष्ठ बनाने के लिए राजनीति न करें, बल्कि राजनीति का मार्गदर्शन करें। साध्वी उमा भारती, कल्याण सिंह, बाबूलाल मरांडी और गोविन्दाचार्य जैसे लोग भाजपा में रहें यह भाजपा और राजनीति दोनों की जरूरत है। हिन्दुत्व समर्थक, भाजपा और संघ के कार्यकर्ता यह जानते हैं। ये यह भी जानते हैं कि इन नेताओं का अलग-अलग रहना देश के लिए शुभ नहीं है। भाजपा, संघ, हिन्दुत्व और राष्ट्र का भला चाहने वाले इन लोगों के कारण ही समय-बेसमय, गाहे-बगाहे ऐसी चर्चाएं चलती है। गोविन्दाचार्य राजनीति भी जानते हैं और रणनीति भी। भाजपा और राजनीति को कितना, कब और कैसे ठीक किया जाना है उन्हें यह पता होगा। वे साहस, पहल और प्रयोग की दुहाई देते हैं। देश और राजनीति के शुभाकांक्षी इसी साहस, पहल और प्रयोग के लिए बेचैन हैं। देश की राजनीति हिन्दुत्व केन्द्रित होने की बाट जोह रही है। भाजपा के नेता अपना रोडमैप बताएं, न बताएं यह देश के शुभचिंन्तकों का रोडमैप है - सुन रहे हैं गोविन्द जी!

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