गुरुवार, 18 मार्च 2010

संघ को जानिये समझिये डराने वाले लोगो से नहीं संघ में आक़र



28 फरवरी को भोपाल में संघ के समागम में बोलते हुए मोहनराव भागवत ने यह बात कही थी. इस कार्यक्रम में समाजवादी पृष्ठभूमि से संबंध रखने वाले न्यायमूर्ति आरडी शुक्ला ने अध्यक्षता की थी। श्री शुक्ला इमानदार हैं इसलिए वे संघ के निकट आकर संघ का जानना-समझना चाहते हैं। संघ प्रमुख ने भी अपने भाषण में कहा कि संघ आज की जरूरत है। इसीलिए संघ प्रमुख ने भोपाल के अपने दौरे में संघ विरोधियों को भी संघ में आकर संघ को जानने का आह्वान किया।

संघ प्रमुख भोपाल में भाषण देकर चले गए। लेकिन अपने पीछे चर्चाओं को छोड़ गए। कुछ चर्चा तो कार्यक्रम स्थल लाल परेड मैदान के कारण हुई, तो कुछ एक राजनैतिक दल भाजपा और उसके जनप्रतिनिधि व सरकार के मंत्रियों की उपस्थिति के कारण। सबसे अधिक चर्चा डॉ. भागवत के उस वक्तव्य की हुई जिसमें उन्होंने कहा कि सभी भारतीय हिन्दू हैं और सभी हिन्दू भारतीय हैं। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि जो हिन्दू नहीं वह भारतीय नहीं हो सकता। संघ प्रमुख के इस वक्तव्य की चर्चा और आलोचना करने वालों ने अपने-अपने संदर्भों को आधार बनायां। कार्यक्रम के दूसरे ही दिन इसाई समुदाय के नेता का आलोचनात्मक बयान छपा। बाद में इक्के-दुक्के सेक्यूलरिस्ट लोगों ने अपने-अपने हिसाब संघ प्रमुख के वक्तव्य की आलोचना की।

जैसा कि कई बार और कई स्थानों पर होता है, इस बार भी और भोपाल में भी हुआ। संघ प्रमुख की बातों की आलोचना के लिए तरह-तरह के आधार और तर्क ढूंढे गए। भारत के संविधान से लेकर सरस्वती शिशु मंदिर विद्यालय के साहित्य तक का उल्लेख किया गया। कुछ संघ साहित्य के उद्धरणों का जिक्र करते हुए हिन्दुत्व, नागरिकता और राष्ट्रीयता के बारे में संघ को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की गई। संघ आलोचकों, विरोधियों और विचारकों की अपनी स्वतंत्रता है, जैसे संघ के सर्मथकों, शुभचिंतकों और सद्भावियों की है। विरोधियों का मुह बंद किया नहीं जा सकता, करना भी नहीं चाहिए। संघ ने तो अपने विरोधियों तक को अपने घर बुलाया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को यह लगता होगा कि उसका विरोध अनजाने में और अज्ञानतावश हो रहा होगा। इसलिए संघ स्वयं अपने बारे में अज्ञान और निरक्षरता दूर करने की भरसक कोशिश कर रहा है। डॉ. मोहनराव भागवत का भोपाल प्रवास इस निमित्त भी था। संघ के बारे में अनेक लोगों की अज्ञानता और निरक्षरता 28 फरवरी के दिन दूर हुई होगी। कार्यक्रम की व्यापकता और उसके प्रभाव को देखकर ऐसा कहा ही जा सकता है। लेकिन कुछ लोग न सिर्फ अज्ञानी और निरक्षर ही बने रहना चाहते हैं बल्कि अपनी इस अज्ञानता और निरक्षता को और अधिक पुख्ता करते हुए संघ के बारे में और अधिक गलतफहमी पैदा करना चाहते हैं।

संघ के बारे में वहीं रटी-रटाई बातें। संघ को महिला विरोध, दलित विरोध, मुस्लिम और इसाई विरोधी बताने की कवायद। भारतीय संविधान का हवाला देकर कहा गया कि संघ प्रमुख हिन्दू और भारतीय की परिभाषा करते हुए संविधान की व्याख्याओं को नजरंदाज कर गए। अन्य देशों के हिन्दुओं का हवाला देकर कहा गया कि तब तो हिन्दू होने के कारण वे भी भारतीय हो जायेंगे। संघ प्रमुख ने अपने भाषण में कहा था कि चर्च हिन्दू समाज को बांट रहा है, तो संघ से सवाल पूछा गया कि क्या चर्च के अनुयायी जो कि इसाई हैं उन्हें संघ हिन्दू अथवा भारतीय नहीं मानता? एक सवाल यह भी पूछा गया कि अगर संघ हर भारतीय को हिन्दू मानता है तो फिर अपने संकल्प में मंदिर के साथ मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारे आदि की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध क्यों नहीं होता? इस तरह के अनेक सवाल और इन सवालों के बहाने कई तरह की शंकाएं-दु:शंकाएं प्रकट की गई। इन सवालों को बेतूका कह कर टाला नहीं जा सकता। लेकिन सभी सवालों का एक साथ जवाब देना भी मुश्किल है।

सबसे पहली बात तो यह कि डॉ. मोहनराव भागवत अपना भाषण किसी संवैधानिक दायित्व या संविधान के परिपेक्ष्य में नहीं दिया था। इसलिए संविधान को कसौटी बनाकर उनकी बातों की व्याख्या बेइमानी होगी। डॉ. भगवत संघ के संवैधानिक प्रमुख हैं। निश्चित ही उन्होंने अपना भाषण एक भारतीय नागरिक, एक हिन्दू और एक संगठन के प्रमुख के नाते दिया। उसे उसी परिपेक्ष्य और संदर्भ में देखा, सुना और व्याख्ययित किया जाना उचित होगा।

एक सुनियोजित पद्धति और दीर्घ योजना के तहत संघ की शाखाओं को स्त्री-पुरूष के लिए अलग-अलग रखा गया है। संघ के बारे में जो अज्ञान से ग्रस्त हैं उन्हे मालूम हो कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तरह राष्ट्र सेविका समिति महिलाओं के बीच कार्यरत है। संघ की शाखाओं महिलाओं की अनुपस्थिति वर्जना नहीं पद्धति के कारण है। अगर स्त्री-वर्जना ही होती तो हिन्दू समागम में हजारों की संख्या में महिलाओं की उपस्थिति न होती। संघ के बारे में अज्ञानता का एक कारण यह भी है कि संघ नाम नहीं लेता, काम करता है। इसीलिए संघ ने दलितों, जनजातियों और पिछड़े वर्गों के लिए बिना नाम लिए अनेक प्रभावी काम किए। गांधी, आंबेडकर से लेकर अनेक आधुनिक नेता इसके साक्षी रहे हैं।

संघ सिर्फ मंदिरों की रक्षा का संकल्प लेता है। क्योंकि गुरुद्वारों को संघ मंदिरों से अलग नहीं मानता। लेकिन चर्च, मदरसे और मस्जिदों की रक्षा का संकल्प संघ नहीं लेता। इसके अनेक कारण हो सकते हैं। संघ के बारे में कम ज्ञान रखने वाले भी यह बता सकते हैं कि संघ वैसे किसी व्यक्ति, स्थल या संगठन की रक्षा के लिए संकल्पित नहीं होता जहां भारतीयता, हिन्दू और राष्ट्र के विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाता है। इसाई सिर्फ वही नहीं हैं जो चर्च के अनुयायी हैं। ईसा मसीह की शिक्षाओं और उपदेशों को मानने और उसमें अपनी आस्था रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति इसाई हो सकता है। लेकिन कौन नहीं जानता कि भारत में चर्च हिन्दुओं में विभेद और वैमनस्य पैदा कर एक राष्ट्रीय समाज को अ-राष्ट्रीय बना रहा है। चर्च-मिशनरी, और मस्जिद-मदरसे सिर्फ अपने मत का प्रचार नहीं कर रहे बल्कि विदेशी धन-बल से भारतीय और राष्ट्रीय हितों के विरूद्ध कार्य कर रहे हैं। क्या किसी मंदिर में चर्च और मस्जिद की तरह मतान्तरण होता, वहां अ-राष्ट्रीयता की शिक्षा और प्रशिक्षण दिया जाता है। संघ ही क्यों कोई भी राष्ट्रवादी, हिन्दू या भारतीय अपने पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं मारेगा। हां जिस दिन यह भरोसा हो जाये कि भारत के मस्जिद-मदरसे, चर्च-मिशनरी सब भारतीयता, हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद के पोषक बनेंगे तब निश्चित ही प्रत्येक हिन्दू और संघ का स्वयंसेवक मंदिरों की तरह इनके संरक्षण के लिए भी आगे आयेगा। हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति है। हिन्दुत्व एक धर्म है जो विभिन्न मंत-पंथों को अपने में समेटे विविधता में एकता का सूत्र है। यही सूत्र भारतीय राष्ट्रीयता है। इसे संघ मानता है। संघ विरोधी भी दबी जुबान ओर अ-स्पष्टता के साथ यही बात कहते हैं। आज नहीं तो कल वे स्पष्ट और खुलेआम यह स्वीकारेंगे। आज नहीं तो कल उनकी अज्ञानता और निरक्षरता दूर होगी, संघ को पूरा भरोसा है।

3 टिप्‍पणियां:

Tapashwani Anand ने कहा…

koi bhi kisiko bhi bhartiya hone ka praman patra nahi de sakta..
ham sab ki bhalai isi me hai ki wad viwad me pade bina apna kam kiye jaye naki nayi paribhasha gadhate rahen jisase samaz me tanav badhe..
baki public sab janti hai

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

संघ के सत्कार्यों का प्रचार बहुत आवश्यक है.. जिसके अभाव में दुष्प्रचार अपना रंग जमा लेता है.

ममता त्रिपाठी ने कहा…

बन्धुवर!
आज संघ के विषय में ये ब्लॉग देखकर अपार हर्ष हुआ। सूचना-तकनीकि के इस युग में किसी भी बात को लेकर भ्रम फैलना और फैलाया जाना आम है। अब वह युग नहीं रहा जब लोग आत्मश्लाघा, आत्मप्रसंशा से बचते थे................अब यदि हम अपने विषय में, अपनी उपलब्धियों, कार्यों, लक्ष्य एवं उद्देश्य को बतायेंगे नहीं.बार-बार उनका पुनरावर्त्तन नहीं करेंगे तो अफवाहों का बाज़ार गर्म ही रहेगा। अतः ऐसे में संघ की वास्तविक छवि जनता के सामने लाने के लिये हमें, मैदान में उतरना ही होगा।
बहुत अच्छा लगा आपका आलेख पढ़कर। एतदर्थ साधुवाद।