रविवार, 14 मार्च 2010

जब अखबार मुकाबिल हो तो बन्दूक निकालो

अनिल सौमित्र
राष्ट्रीय और प्रादेशिक स्तर पर पत्रकारों के अनेक संगठन हैं। एनयूजे यानी नेशनल यूनियन आॅफ जर्नलिस्ट इसे नेशनलिस्ट यूनियन आॅफ जर्नलिस्ट भी कहा जा सकता है। यह संगठन पत्रकार संगठनों को फेडेरेशन है। अर्थात् पत्रकारों के अनेक संगठन इस यूनियन से संबंद्ध हैं। अनेक संगठनों में से एक - जर्नलिस्ट यूनियन आॅफ मध्यप्रदेश यानी जम्प भी इस फेडेरेशन का सदस्य है। वैसे तो मध्यप्रदेश और देश में दोनों संगठन पिता-पुत्र या बड़े-छोटे भाई की तरह अनेक वर्षों से कार्यरत हैं। कार्य करते हुए कभी आपसी मनमुटाव नहीं हुआ। होता भी कैसे अगर समविचारी लोग भले ही वे पत्रकार क्यों न हों अगर एक भले काम में लगे हैं, लोगों का संगठन कर रहे हैं। इसमें मनमुटाव की कोई गुंजाइश होना भी नहीं चाहिए। लेकिन काम करते हुए व्यक्ति ही नहीं संगठन का भी विस्तार और दबदबा बढ़ता है। संगठन अगर पत्रकारों का हो तो रूतबा और ज्यादा भी हो सकता है। यही सब कुछ हुआ पिछले वर्षों में एनयूजे और जम्प में।
रूतबा, दबदबा और ताकत के विस्तार का ही परिणाम था कि जम्प में विभिन्न पदों को लेकर चुनाव की नौबत आ गई। लोकतांत्रिक देश में किसी संगठन संस्था के लिए यह शुभ और अच्छा संकेत है कि वहां पदो ंके लिए चुनाव हो और चुने हुए लोग विभिन्न दायित्वों का निर्वहन करें। वैसे तो यह अच्छा होता कि अध्यक्ष, महामंत्री या सचिव सहित विभिन्न पदों और कार्यकारिणी के साथ राष्ट्रीय परिषद् के लिए भी सर्व-सम्मति से मनोनयन हो जाता। लेकिन चुनाव होना और भी अच्छी बात है, बशर्ते कि चुनाव के बाद कोई राग-द्वेष उत्पन्न न हो। चुनाव के पूर्व असहमति और विवाद के कारण कुछ मतभेद और मन-भेद पैदा हुए जिसके कारण चुनाव की नौबत आई। अब चुनाव हो चुके। चुनाव के बाद दमदार प्रत्याशी जीते यह तो मानना ही पड़ेगा। इसलिए अब जम्प भी दमदार हो गया है। पहले से अधिक रूतबे और दबदबे वाला। महिला दिवस की पूर्व संध्या पर जम्प और एनयूजे के लिए महिला पदाधिकारियों और सदस्यों का भी चुनाव हुआ। तो स्त्री शक्ति ने भी अपने रूतबे और दबदबे का इजहार कर दिया है। महिला पत्रकारों ने पुरूष वर्चस्व और एकाधिकार को तोड़ कर अपनी उपस्थिति दजे करायी है। वाकई यह मुस्लिम नेताओं के मुंह पर भी तमाचा है जो महिलाओं को सिर्फ नेता या पत्रकार पैदा करने की नसीहत दे रहे हैं। अब चुप हो जाओ मुल्ला-मौलवियों महिलाएं अब पत्रकार और नेता भी बनेंगी और पत्रकार और नेता पैदा भी करेंगी। आखिर देश को सबल, शक्तिशाली और तेजस्वी बनाने की जिम्मेदारी उनकी भी है।
लेकिन सब कुछ शुभ और नेक होने के वावजूद जम्प के चुनाव में कुछ बातें ऐसी हुई जो लोकतंत्र को धक्का और चोट पहुंचाने वाली थी। चुनाव के दिन सुबह से ही प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से पत्रकार आने लगे थे। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के प्रतिष्ठित होटल पलाश रेसिडेंसी में 7 मार्च को पत्रकारों का जमावड़ा था। चूंकि महौल चुनाव का था इसलिए सभी दावेदार प्रत्याशी अपना-अपना परिचय ले-दे रहे थे। पत्रकारों का आना-जाना भी जारी था। इतने में एक इंडिका गाड़ी आई। सबने अनुमान तो यही लगाया कि इस गाड़ी में भी कुछ पत्रकार ही होंगे। अनुमान के मुताबिक उस गाड़ी से पत्रकार ही उतरे, लेकिन वे बन्दूकधारी पत्रकार थे। इन बन्दूकधारी पत्रकारों को देखकर अकबर इलाहाबादी का वो शेर याद आया - ‘‘खींचों ना कमानो को, ना तलवार निकालो, जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो।’’ मुझे लगा इलाहाबादी तो तोप ओर तलवारों के सामने अखबार निकालने की बात करते थे। ये कैसे पत्रकार हैं, बन्दूक से अखबार कैसे निकालेंगे! लेकिन फिर ध्यान आया इलाहाबादी ने जब अखबार निकालने की वकालत की थी तब जमाना अंग्रेजों का था। तब देश गुलाम था। गुलामी से लड़ने के लिए तोप और तलवार से अधिक ताकतवर हथियार उन्होंने अखबार को माना था। लेकिन आज तो आजाद मुल्क में हैं। कोई अंग्रेज वगैरह हमारी छाती पर बैठे नही, ंतो फिर अखबार की क्या जरूरत है। एक सवाल भी दिमाग में उठा - लोकतंत्र में अखबार बंदूक से भी ंिनकल सकते हैं। संभव है कुछ पत्रकार यह कहें कि हमारी मर्जी हम कलम की बजाए बंदूक से ही पत्रकारिता करेंगे, कोई अंग्रेजों का राज है क्या? फिर मुझे आज के अकबर इलाहाबादी याद आये - ‘‘खीचों ना कलम को, ना पैड निकालो, जब अखबार मुकाबिल हो तो बंदूक निकालो।’’
अब जबकि मध्यप्रदेश में जम्प और एनयूजे के लिए चुनाव हो चुके हैं। प्रदेश कार्यकारिणी का गठन भी हो चुका है। पत्रकार और पत्रकार संगठनों के प्रतिनिधि लोकतंत्र और प्रेस की स्वतंत्रता और उसके भविष्य के बारे में अनवरत विचार करते रहेंगे ताकि लोकतंत्र और लोकतंत्र का चैथा पाया मीडिया भी मजबूत हो सके।

2 टिप्‍पणियां:

आलोक मोहन ने कहा…

अखबार,कोर्ट से कुछ नही होता ...बस बन्दूक उठाओ और अपना बद्ला चुका लो बस्...

truefeelings ने कहा…

Good piece. Thanks