गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

संघ की ओर समाज की नज़र

यह पुराना आलेख है। यह आलेख तब लिखा गया था जब श्री मोहनराव भागवत संघ के सरसंघचालक बने थे।
अनिल सौमित्र
नागपुर में संघ की बहुप्रतीक्षित प्रतिनिधि सभा की बैठक चल रही है। औपचारिक तौर पर यह बैठक 21 से 23 तक होगी। संघ की परंपरा और संविधान के मुताबिक प्रतिनिधि सभा की बैठक प्रतिवर्ष होती है। लेकिन इस साल की बैठक का विशेष महत्व इसलिए है कि यह वर्ष संघ का चुनावी वर्ष है। प्रत्येक तीन साल पर संघ में सरकार्यवाह का चुनाव होता है। पहले प्रांत और उसके नीचे की इकाइयों में संघचालक का चुनाव होता है, तत्पश्चात् विभिन्न इकाइयों के प्रतिनिधि अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में सरकार्यवाह का चुनाव करते हैं। इस वर्ष यह बैठक इसलिए भी विशेष चर्चा में है कि काफी समय पहले से ही सरसंघचालक श्री कुप्पहल्ली सीतारमैया सुदर्शन के पदमुक्त होने का अनुमान लगाया जा रहा था।
मीडिया और समाज का अनुमान सच सिद्ध हुआ। प्रतिनिधि सभा बैठक के दूसरे दिन 21 मार्च को श्री सुदर्शन जी ने अपने दायित्व से मुक्त होने का निर्णय करते हुए वर्तमान सरकार्यवाह श्री मोहनराव भागवत को सरसंघचालक नियुक्त करने की घोषणा कर दी। यह घोषणा देश-दुनिया के लिए बड़ा और महत्वपूर्ण निर्णय है। ऐसा होना भी स्वाभाविक है, क्योंकि दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन के प्रमुख का मनोनयन और दूसरे सबसे बड़े पद का निर्वाचन हुआ है। लेकिन यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में ही संभव है कि इतने विशाल संगठन के मुखिया और अन्य पदाधिकारियों का मनोनयन ओर निर्वाचन इतने सरल और सहज तरीके से हो पाता है।
श्री मोहनराव भागवत, संघ के छठे सरसंघचालक होंगे। संघ के पहले सरसंघचालक, संघ के संस्थापक डाॅ. केशव बलिराम हेडगेवार हुए। इसके पश्चात् श्री माधव सदाशिवराव गोलवलकर (श्रीगुरूजी), श्री बालासाहब देवरस, प्रो. श्री राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया) और श्री कृप्पहल्ली सीतारमैया सुदर्शन सरसंघचालक बने। उल्लेखनीय है कि 1939 डाॅ. हेडगेवार के जीवन काल में सिंदी संघ के शिविर में ही कार्यकर्ता जान चुके थे कि श्रीगुरूजी ही सरसंघचालक होंगे। वैसे ही, बल्कि उससे कहीं अधिक कल्पना देश के संघ कार्यकर्ताओं को श्री गुरूजी के बाद बालासाहब देवरस के सरसंघचालक बनने की हो गई थी। श्री गुरू जी 33 वर्षों तक सरसंघचालक रहे जबकि बालासाहब देवरस 21 वर्षों तक। श्री रज्जू भैया वर्ष 1994 से 2000 तक सरसंघचालक रहे। जबकि श्री सुदर्शन जी वर्ष 2000 से 2009 तक।
कार्य की दृष्टि से सरसंघचालकों के कार्यकाल का विश्लेषण काफी कठिन है। संघ का मूल कार्य तो शाखा कार्य विस्तार है। इस दृष्टि से शाखा कार्य का विस्तार तो सतत होता गया है। लेकिन विभिन्न सरसंघचालकों के कार्यकाल को देशकाल-परिस्थिति और तत्कालीन सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक संदर्भों में देखने पर समीचीन विश्लेषण संभव होगा।
संघ के स्वयंसेवक और प्रचारक रहे मोरेश्वर गणेश तपस्वी ने अपनी पुस्तक ‘ राष्ट्राय नमः’ में लिखा है - संघकार्य के वास्तविक शुरूआत के कुछ महीनों बाद एक दिन डाॅ. हेडगेवार जब संघ के शाखा स्थान पर पहंुचे तो स्वयंसेवकों ने उन्हें अकल्पित रूप से ‘सरसंघचालक प्रणाम’ कहा। तभी से डाॅक्टर जी सरसंघचालक बन गए। पन्द्रह वर्षों तक उन्होंने अपना खून-पसीना एक कर संघ का विस्तार किया, उसे देश के सुदूर क्षेत्रों तक विस्तार दिया। एक तरफ साम्राज्यवादी शक्तियों से संघर्ष और दूसरी तरफ समाज को असन्न संकटों से जूझने के लिए समर्थ और सशक्त बनाने का दोहरा दायित्व डाॅ. हेडगेवार के जिम्मे था। श्रीगुरूजी के 33 वर्षों के कार्यकाल में संघ को देश के प्रत्येक जिले में विस्तार मिला, वहीं राजनीति सहित समाज जीवन से जुड़ी लगभग बीस से अधिक संगठनों की शुरूआत भी हुई। आज जिस ‘संघ परिवार’ शब्दावली की चर्चा होती है उसकी शुरूआत इसी समय हुई। श्रीगुरूजी के समय ही संघ को सर्वाधिक विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। गांधी-हत्या का ठीकरा संघ पर फोड़ा गया। तत्कालीन कांग्रेस की सरकार ने कलुषित राजनीति का परिचय देते हुए संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। एक विजयी योद्धा की तरह श्रीगुरूजी ने संघ को सामाजिक-राजनीतिक झंझावातों से बाहर निकाला।
श्री बाला साहब देवरस ने इक्कीस वर्षो। तक संघ को नेतृत्व दिया। इस दौरान संघ, समाजव्यापी बना। संघ परिवार अब समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंचने लगा। देवरस जी के समय ही संघ को आपातकाल के दौरान दूसरे प्रतिबंध का सामना करना पड़ा। निष्ठुर शासक वर्ग के खिलाफ जनांदोलन का शंखनाद संघ के अदृश्य नेतृत्व में ही हुआ। अस्वास्थ्य के कारण उन्होंने संघ प्रवाह का कार्य 1994 में श्री रज्जू भैया को सौंप दिया। श्री रज्जू भैया लगभग छह वर्षों तक सरसंघचालक के रूप में अपनी सेवाएं दे पाए। इस दौरान संघ कार्य का विस्तार दुनिया के अन्य देशों में काफी फैला। संघ के बारे में यह धारणा भी निर्मूल हुई कि संघ मराठी और उसमें भी एक विशेष ब्राह्मण समाज का संगठन है। जाति, भाषा और क्षेत्र आधारित धारणाएं इस दौरान मिथक सिद्ध हुई। संघ के वास्तविक रूप के बारे में समाज के सभी वर्गोंं में सकारात्मक संदेश गया। मीडिया भी संघ के बारे में सकारात्मक हुआ। संघ विचारों से प्रेरित राजनीतिक कार्यकर्ता भी उंचे शिखरों तक पहंचे। निवर्तमान सरसंघचालक श्री सुदर्शन जी ने अपने कार्यकाल में ग्रामीण विकास, सामाजिक समरसता और संस्कृत व हिन्दी के विकास पर विशेष बल दिया। संघ विचारों से प्रेरित भारतीय जनता पार्टी का राजनैतिक उत्कर्ष भी उल्लेखनीय है।
नए सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत के बारे में विभिन्न प्रकार के कयास लगाए जा रहे हैं। संघ और संघ के माध्यम से राष्ट्रीय फलक पर राजनैतिक-सामाजिक स्थितियों में बड़े युगान्तकारी परिवर्तन की अपेक्षा की जा रही है। श्री भागवत, संगठन और जमीनी काम को अन्य सभी कार्यों की शक्ति मानते हैं। इसलिए यह स्वाभावित है कि उनका ध्यान संघ के मूल कार्य, शाखा विस्तार की ओर होगा। संघ में शाखा कार्य और स्वयंसेवकों की गुणवत्ता को लेकर काफी चर्चा होती रही है। स्वयंसेवकों और शाखाकार्य में गुणात्मक विस्तार है देश के समक्ष आसन्न संकटों का समाधान दे सकेगा। श्री भागवत सरल और सहज व्यक्तित्व के धनी हैं। वे मीतभाषी और मृदुभाषी हैं। न दिखना और काम करते जाना उनके स्वाभाव में है। कार्यकर्ताओं के साथ वे छाया की तरह होते हैं, लेकिन मीडिया को ढूंढने पर भी नहीं मिलते। वे जानते हैं कार्य का विस्तार होगा तो उसका प्रचार भी होगा, प्रचार से कार्य का विस्तार नहीं। शायद इसीलिए वे अपने व्यक्तित्व को छुपाकर, गलाकर, मिटाकर संघ का व्यक्तिव गढ़ रहे हैं। वे सरकार्यवाह के रूप में संघ के कार्यकारी प्रमुख थे, अब सरसंघचालक के रूप में संवैधनिक प्रमुख के नाते संघ के दर्शन और नीतियों अभिव्यक्त करेंगे। संघ, संघ परिवार और संघ विचार को वही परंपरागत वैचारिक प्रतिबद्धता, अनुशासन और राष्ट्रधर्म का पुनस्र्मरण होगा। श्री भागवत के नेतृत्व मे संघ को न सिर्फ चतुर्दिक विस्तार मिलेगा, बल्कि देश को सभी क्षेत्रों में नई दिशा भी मिलेगी। देश और समाज को संघ से यही अपेक्षा है। संघ के नूतन सरसंघचालक का हार्दिक अभिनंदन!

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