शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

प्रसिद्ध समाजसेवी नानाजी देशमुख नहीं रहे

नयी दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ नेता नानाजी देश मुख का शनिवार को निधन हो गया।
1975 में गठित गैरकांग्रेसी सरकार में मंत्री रहने के बाद नानाजी ने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया था। उसके बाद उन्होंने समाज सेवा शुरू कर दिया था। पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे नानाजी आजकल चित्रकूट में रह रहे थे।

मूलगामी दृष्टि - नानाजी देशमुख

नानाजी देशमुख
(ग्राम विकास के पुरोधा)

विभिन्न विवादा- स्पद विषयों पर भी गुरुजी सहज भाव से समाधान बता दिया करते थे। जब कभी कोई मार्ग नहीं सूझता था, गुरुजी का मार्गदर्शन काम आता था।

बात उस समय की है, जब पंजाब में भाषा विवाद खड़ा हुआ था। संयोग से दीनदयाल जी की और मेरी नागपुर में गुरुजी से भेंट हुई। कई स्थानीय कार्यकर्ता भी थे। गुरुजी बोले - 'अरे भाई क्या चल रहा है पंजाब में? तुम्हारे नेता लोग क्या कह रहे हैं पंजाबी भाषा के बारे में?'
स्पष्ट विचार

हममे से काई कुछ नहीं बोला। कुछ देर बाद गुरुजी स्वयं बोले - 'क्या राजनीति में काम करने वालों का दृष्टिकोण सीमित (दलगत) हो जाता है? वह (दृष्टिकोण) व्यापक नहीं रह पाता? हिन्दी राष्ट्रभाषा है, स्वाभाविक रूप से उसके प्रति मोह, उसके विकास के लिए प्रयत्न होना चाहिए। लेकिन पंजाबी भाषा क्या विदेशी भाषा है? क्या वह सांप्रदायिक भाषा है? पंजाबी भाषा एक क्षेत्रीय भाषा है और हमारी अपनी भाषा है। उसका अभिमान होना चाहिए न कि उसका उपहास। यह सिर्फ केशधारियों की भाषा नहीं है। यह कहना भी गलत है कि यह सिर्फ नानकपंथियों की भाषा है। 'गुरुग्रंथ साहब' आदि धार्मिक ग्रंथों में क्या केवल पंजाबी भाषा है? अनेक भाषाएँ मिलती हैं। उन्हें किसी भाषा से नफरत नहीं थी। किसी और को भी उनकी भाषा से नफरत नहीं होनी चाहिए।' कितना स्पष्ट विचार था!'

श्रीगुरुजी द्वारा किया जाने वाला समस्या का विश्लेषण और निदान सत्य की कसौटी पर भी खरा उतरता था। आंध्र विवाद जब शुरू हुआ तो हमारे लोगों ने वहाँ एक अध्ययन दल भेजा। गुरुजी उन दिनों इंदौर में विश्राम कर रहे थे। मैं भी संयोग से इंदौर में था। उनसे भेंट हुई तब वे बोले - 'तुम्हारा अध्ययन दल वहाँ क्या कर रह है? आंध्र और तेलंगाना के अलग होने से कोई कठिनाई नहीं आयेगी? इससे राष्ट्रीय एकता खंडित नहीं होगी? लोगों को सुविधा हो, आर्थिक विकास में पोषण हो और प्रशासनिक दृष्टि से सुविधाजनक हो तो आवश्यकतानुसार प्रान्तों की पुनर्रचना राष्ट्रीय एकात्मता के लिए भी आवश्यक रहती है। इसमें अध्ययन करने का क्या प्रश्न है? यह तो स्वयं स्पष्ट हैं। आंध्र-तेलंगाना के प्रश्न को विवादास्पद बनाकर लोगों में असंतोष व हिंसक वृत्ति को बल मिले, ऐसी हठवादिता का क्या अर्थ है?

गुरुजी के सान्निध्य में जो भी आता था, गुरुजी के व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था।
डा. सम्पूर्णानन्द का आकलन

बात शायद सन् 1946 या 1947 की है। काशी के डी.ए.वी. कालेज में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शिक्षण शिविर लगा था। स्व. डा. सम्पूर्णानंद जी से मेरे बहुत पहले से संबंध थे। वे इस शिविर के समापन समारोह में पधारे थे। गुरुजी भी थे। उस समय उनसे (डा. संपूर्णानंद से) बातचीत नहीं हो सकी, पर बाद में उनसे मिलने का संयोग हुआ तो वे बोले - 'हम तुम्हारे संघ को देख आए हैं।'

मैंने कहा - 'मैं भी वहाँ था।'

वे बोले - 'हाँ, तुम उस दिन मिलिट्री कमाण्डर जैसे लग रहे थे।'

मैंने पूछा - 'क्या आपको हमारे कमांडर बनने में कुछ एतराज है?'

उन्होंने जवाब दिया - 'नहीं भाई, ऐसी कोई बात नहीं है। मैं तो कह रहा था कि तुम्हारे यहाँ बड़ा गजब का अनुशासन है। इस संगठन के पीछे जो तुम्हारे गुरुजी हैं, उनका बड़ा विशिष्ट व्यक्तित्व है, बहुत ही गतिशील और प्रभावोत्पादक व्यक्तित्व है। मतभेद की बात दिखने के बाद भी उनसे विवाद करने की इच्छा नहीं होती। उनसे मिलकर एक आश्चर्य की बात अनुभव हुई कि विवादास्पद विषय का पूर्ण अनुमान कर गुरुजी ऐसा मत प्रकट करते थे कि सामने बैठे व्यक्तियों को एक नये ढंग से सोचने के लिए प्रेरणा मिल जाती है।'

मैंने पूछा - 'बाबूजी, आपने यह सब कहा तो सही, पर बात क्या हुई?'

वे बोले - 'खैर छोड़ो, तुम्हारे गुरुजी के बारे में मेरी ऐसी धारणा बन गई है। सही या गलत मैं नहीं जानता, यह तुम जानो।'
श्री श्रीप्रकाश के विचार

गुरुजी के सान्निध्य में ही नहीं उनके विचारों और भाषणों से भी अनेक विद्वान और नेता अभिभूत हुए हैं। श्री श्रीप्रकाश जी का संस्मरण समीचीन रहेगा।

महाराष्ट्र के राज्यपाल पद से निवृत्त होकर श्रीप्रकाश जी देहरादून में एक कुटिया बनाकर रह रहे थे। उन्होंने मुझे मिलने के लिए बुलाया। बाद में पता चला कि डा. सम्पूर्णानंद ने उन्हें लिखा था कि तुम नाना जी को मिलो। गुरुजी की 'बंच ऑफ थॉट्स' पुस्तक को अवश्य पढ़ो। डा. सम्पूर्णानंद जी ने ही मेरा परिचय श्रीप्रकाश जी से कराया था। उनकी इच्छा देख मैंने 'बंच ऑफ थॉट्स' उन्हें भी भेज दी।

जब मेरा श्री श्रीप्रकाश से साक्षात्कार हुआ तो वे बोले: 'मैं गुरुजी के व्यक्तित्व से प्रभावित अवश्य था, किन्तु उनका व्यक्तित्व इतना सर्वव्यापी है, इसकी मुझे कल्पना नहीं थी। हो सकता है, कुछ मामलों में मतभेद हो, पर उनका चिंतन बड़ा मौलिक और जड़ को छूने वाला है। इसका आप लोग व्यापक प्रचार क्यों नहीं करते? कई चीजें तो ऐसी हैं, जिनको व्यवहार में लाया जाये तो हिन्दुस्थान की सब समस्याएँ हल हो जाएँगी। मैं नहीं समझता था कि तुम्हारे गुरुजी धर्म परिवर्तन किए बिना मुसलमान और ईसाइयों को राष्ट्रजीवन का अंग मानने के लिए तैयार हो सकते हैं। गुरुजी के सारे विचार देखकर लगता है कि यदि मुसलमानों ने थोड़ा-सा भी दृष्टिकोण में परिवर्तन किया और हिन्दुस्थान की गौरवमयी राष्ट्रीय परम्परा का अभिमान रखा, तो तुम्हारे गुरुजी को उन्हें राष्ट्रीय एकात्मता के अंग मानने में कोई एतराज नहीं होगा। यह एक बहुत बड़ी बात मैं गुरुजी की समझ पाया हूँ। गुरुजी के उस विचार से मतभेद नहीं रखा जा सकता। मेरे मन में उनके प्रति आदर बढ़ गया है।'
दीनदयाल जी के प्रति स्नेह-विश्वास

दीनदयाल जी के प्रति गुरुजी के मन में बड़ा स्थान था, बड़ा स्नेह और अटूट विश्वास।

बात उस समय की है जब कालीकट के अधिवेशन के पूर्व दीनदयाल जी जनसंघ के अधयक्ष निर्वाचित हुए। कालीकट के अधिवेशन के बाद हम लोग कार से बंगलौर होते हुए डोंडबल्लापुर पहुँचे। वहाँ संघ कार्यकर्ताओं का एक वर्ग लग रहा था। गुरुजी संघ कार्यकर्ताओं को मार्गदर्शन दे रहे थे।

नानाजी का जन्म महाराष्ट्र के परभानी जिले के कदोली नामक छोटे से कस्बे में सन् १९११ में हुआ था। नानाजी का बचपन अभावों में बीता। उनके पास शुल्क देने और पुस्तकें खरीदने के लिये पैसे नहीं थे किन्तु उनके अन्दर शिक्षा और ज्ञानप्राप्ति की उत्कट अभिलाषा थी। अत: इस कार्य के लिये उन्होने शब्जी बेचकर पैसे की व्यवस्था की। उनका निधन चित्रकूट में २७ फरवरी २०१० को हो गया।

कार में दीनदयाल जी, सुन्दरसिंह जी भण्डारी, जगन्नाथराव जी जोशी भी थे। हम लोगों को देखते ही गुरुजी बोले - 'तुम सब नेता लोग यहाँ कहाँ आ गए?'

भोजन, विश्राम के बाद गुरुजी के साथ चाय के लिए बैठे। गुरुजी का बौध्दिक होने वाला था। चाय के समय गुरुजी बोले - 'आज दीनदयाल बोलेगा।' हम सब आश्चर्यचकित रह गए। किसी ने कहा कि वर्ग में सभी लोग आपसे मार्गदर्शन पाने के लिए एकत्रित हुए हैं। सभी कार्यक्रम आप ही को लेने हैं।

गुरुजी बोले - 'नहीं भाई, दीनदयाल ही बोलेगा।' फिर किसी ने कहा, 'गुरुजी वे तो जनसंघ के अध्यक्ष हैं।' गुरुजी ने तत्काल उत्तर दिया - 'नहीं, दीनदयाल स्वयंसेवक है। स्वयंसेवक के नाते बोलेगा, जनसंघ अध्यक्ष के रूप में नहीं।' और वस्तुत: दीनदयाल जी का जब बौध्दिक हुआ, तो गुरुजी ने भी बहुत सराहा।


प्रसिद्ध समाजसेवी नानाजी देशमुख नहीं रहे

नई दिल्ली। प्रसिद्ध समाजसेवी और भारतीय जन संघ के पूर्व नेता नानाजी देशमुख का आज दिल का दौरा पड़ने के कारण निधन हो गया। नानाजी 94 वर्ष के थे। वे दो बार राज्यसभा के सदस्य रहे तथा समाजसेवा, विशेषकर चित्रकूट क्षेत्र में रेन वाटर हार्वेस्टिंग के लिए काम करने के लिए उन्हें पद्म विभूषण से नवाजा गया

नानाजी देशमुख का जन्म 11 अक्टूबर 1916 को महाराष्ट्र के परभनी जिले में हुआ था। नानाजी देशमुख एक समाजसेवक होने के साथ-साथ भारतीय राजनीति में भी रहे तथा राज्यसभा सांसद के रूप में काम किया। जनसंघ की स्थापना और इसके बाद गठबंधन की राजनीति के सूत्रपात में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

मूलत: राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के प्रचारक रहे देशमुख ने चित्रकूट में खासा काम किया। पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी उनसे खासे प्रभावित रहे हैं। जब वाजपेयी ने पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा था तो देशमुख ही उनके मार्गदर्शक की भूमिका में रहे। चित्रकूट में समाजसेवा के रूप में उनके किए कार्यों की पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने भी तारीफ की थी।
प्रख्यात समाजसेवी नानाजी देशमुख का यहाँ लम्बी बीमारी के बाद निधन हो गया। वह 97 वर्ष के थे। उनके परिवार के सदस्यों के अनुसार उनका निधन शाम यहाँ एक अस्पताल में हुआ।

नानाजी देशमुख दो बार राज्यसभा के सदस्य रहे तथा समाजसेवा विशेषकर चित्रकूट क्षेत्र में रेन वॉटर हार्वेस्टिंग के लिए काम करने के लिए उन्हें पद्म विभूषण से नवाजा गया था। वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक सदस्यों में से एक थे।

नानाजी अटल बिहारी वाजपेयी समेत सभी भाजपा के बड़े नेताओं के पथप्रदर्शक रहे। उन्होंने चित्रकूट में जो कार्य किया, उसकी प्रशंसा पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम आजाद ने भी की थी। कलाम ने कहा था कि नानाजी ने कभी सत्ता की राजनीति नहीं की।

महाराष्ट्र में जन्में नानाजी देशमुख ने सादगी और ईमानदारी की मिसाल पेश की। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सबसे वृद्ध प्रचारक नानाजी की दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में कितनी आस्था दृढ़ थी, इसकी मिसाल 2000 में उस वक्त देखने को मिली जब वे व्हीलचेयर पर बैठकर मतदान करने पहुँचे।

नानाजी की भारतीय लोकतंत्र में गहरी आस्था थी और वे कहते थे कि देश के हर नागरिक को मतदान का उपयोग करके अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। यही कारण था कि चलने-फिरने में लाचार होने के बावजूद उन्होंने मतदान में हिस्सा लिया था। (वेबदुनिया/वार्ता)

2 टिप्‍पणियां:

Suresh Chiplunkar ने कहा…

इस धरतीपुत्र, अथक योद्धा को कोटि-कोटि नमन…

Udan Tashtari ने कहा…

दुखद!!


श्रृद्धांजलि!