शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

विश्व मंगल गौ ग्राम यात्रा अपने अंतिम चरण में गोविन्दाचार्य ने हरदा, खंडवा और बुरहानपुर में यात्रा को संबोधित किया


यात्रा से अनिल सौमित्र
भोपाल। विश्व मंगल गौ-ग्राम यात्रा अब अब अंतिक चरण में है। पिछले साल विजयादशमी के दिन कुरूक्षेत्र से शुरू हुई यह यात्रा 17 जनवरी, 2010 को नागपुर में पूरी होगी। इस दौरान यह यात्रा 20 हजार किमी की देरी तय करेगी। 108 दिनों की इस यात्रा में 400 से अधिक धर्मसभाएं आयोजित होंगी। गौ को राष्ट्रीय प्राणी घोषित कराने के लिए करोड़ों हस्ताक्षर कराए जायेंगे। पूरे देशभर में जिला, तहसील और विकास खंडों में 15000 उप-यात्राएं के माध्यम से 10 लाख किमी की दूरी तय की जायेगी। इस बीच करोड़ों लोगों से संपर्क किया जायेगा।
उल्लेखनीय है कि यात्रा अपने प्रथम चरण में 14 अक्टूबर को मध्यप्रदेश के ग्वालियर से होकर निकली। इसी दिन मध्यभारत प्रांत में यात्रा का शुभारंभ भी हुआ। अब जबकि यात्रा अपने अंतिम दौर में है पुनः 02 जनवरी, 2010 को रतलाम में आई। 09 जनवरी को यह यात्रा जबलपुर से होकर छत्तीसगढ़ की सीमा में पहुचेगी। 10 जनवरी को कवर्धा में यात्रा का स्वागत होगा।
भोपाल में यह यात्रा 6 जनवरी को आई। इसके पूर्व 5 जनवरी को मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के उप-नगर बैरसिया और बैरागढ़ में भी यात्रा का भव्य स्वागत हुआ। भोपाल की सभा को गोकर्णपीठ श्रीरामचन्द्रपुर मठ के शंकराचार्य पूज्य श्री राघवेश्वर भारती महास्वामी जी और प्रख्यात चिन्तक श्री गोविन्दाचार्य, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सेवा प्रमुख सीताराम जी के अलावा अनेक संतों और बुद्धिजीवियों ने संबोधित किया।
भोपाल की सभा को संबोधित करते हुए पूज्य शंकराचार्य जी ने कहा कि गो-माता विश्व पावनी, जननी और पोषिणी हैं। लेकिन यह दुःख का विषय है कि गो-माता की रक्षा के लिए यात्रा निकालने की नौबत आ गई है। आज का समय ऐसा आ गया है कि हम गोपाल बनने में सम्मान नहीं बल्कि अपमान महसूस करते हैं। उन्होंने इस बात पर खुशी जाहिर की कि इस यात्रा के कारण लोगों में जागरुका आ रही है। गो रक्षा और इसके संवर्द्धन के लिए संगठन भी खड़ा हो रहा है। शंकराचार्य जी विश्व मंगल गौ-ग्राम यात्रा के उद्देश्यों पद प्रकाश डालते हुए कहा कि यह यात्रा व्यक्ति और समाज में परिवर्तन के लिए है। इसके माध्यम से कुछ ऐसा करना है ताकि देश की आने वाली पीढ़ियां खुशहाल रह सकें। हम इसके माध्यम से सरकार और समाज का ध्यान आकृष्ट कराना चाहते हैं। आज गौ माता की ऐसी दुर्दशा है इसीलिए यह यात्रा निकाली जा रही है। उन्होंने बताया कि गाय की उपेक्षा का एक बढ़ा कारण यह है कि हमें गाय का महत्व और उसका उपयोग ठीक से मालूम नहीं है। हमें गाय के बारे में आर्थिक और भावनात्मक दोनों पक्षों का उजागर करना है। गौ पालन के लिए भाव और इच्छा जागरण के साथ ही वातावरण निर्माण का कार्य भी करना आवश्यक है। इसके लिए हम सभी की सेवा चाहिए। श्री शंकराचार्य जी ने बताया कि यात्रा के बाद गौ-संरक्षण व संवर्द्धन के लिए विस्तृ त कार्य-योजना तैयार की जायेगी। स्थान-स्थान पद प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित करने की भी आवश्यकता है।
प्रख्यात चिंतक गोविन्दाचार्य ने स्वदेशी अर्थचिंतक श्री गोविंदाचार्य ने भी सभा को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि गौ माता जगत जननी है, प्रत्येक भारतीय को इसकी रक्षा का संकल्प करना चाहिए। गाय की सेवा अर्थात 35 करोड़ देवी-देवताओं की पूजा करना। अपनी पूरी जिंदगी और मरने के बाद भी गो-माता मनुष्य और प्रकृति के लिए उपयोगी है। भारत की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए श्री गोविंदाचार्य ने कहा कि भारत दुनिया का अनमोल देश है। अपने वैशिष्ट के कारण ही इसे देवभूमि और पुण्यभूमि का विशेषण मिला। चीन में एक कहावत सर्वत्र प्रचलित है कि इस जन्म में अच्छा काम करोगे तो अगला जन्म भारत में मिलेगा। भारत में 29 हजार किस्म की वनस्पति और 85 हजार से अधिक पशु-पक्षियों की नस्लें हैं। भारत में सूर्य देवता का प्रताप भी अद्वितीय है। दुनिया के अन्य देशों में भारत की तरह सूर्य का प्रकाश नहीं मिलता है। इसका हमारे जीवन पद काफी प्रभाव है। सूर्य के इसी प्रभाव के कारण यहां की गायों को भी विशेष गुण प्राप्त हुआ है। भारतीय गायों के दुध और घी में जो पीलापन है वह सूर्यतत्व है। यह सूर्य तत्व अन्य किसी प्रणी के दूध या किसी अन्य देश की गाय को प्राप्त नहीं है। क्योंकि भारतीय नस्ल की गायों में ही सूर्य तत्व को ग्रहण करने की क्षमता है।
श्री गोविंदाचार्य ने अंगेजी हुकूमत और स्वतंत्रता के बाद काले अंग्रेजों की हुकूमत पर गोवंश की कमी का ठीकरा फोड़ा। उन्होंने कहा कि सन 1800 में एक भारतीय पद 6 मवेशी होते थे, जबकि आजादी के वक्त दो भारतीय पर एक मवेशी ही बच पाया। आज हालात यह है कि 100 करोड़ की जनसंख्या पद मात्र 25 करोड़ गौवंश ही बचा है। यह इसलिए हुआ कि अंग्रेजों के जाने के बाद भी उन्हीं की नीतियों को जारी रखा गया। चूंकि अंग्रेजों का मुख्य भोजन गो-मांस था इसलिए उन्होंने ऐसी नीतियां बनाई कि अधिकाधिक गो-वंश का उनके भोजन के लिए मारा जा सके। जबकि भारत में गा-वंश का उपयोग हमेशा से गो-दुग्ध, अन्य गो-उत्पाद और खेती तथा परिवहन आदि कार्यों के लिए होता था। उल्लेखनीय है कि 1857 से 1947 के बीच लगभग 40 करोड़ गो-वंश का वध किया गया। यह आज भी जारी है। देश के लाखों बूचड़खाने इसकी मिसाल हैं। भारत से गो-मांस का निर्यात आज भी निर्बाध गति से जारी है।
श्री गोविंदाचार्य ने कहा कि गाय का गोबर, मूत्र, और दुग्ध गुणकारी है। हम इसके बारे में जानते हुए भी लाभ नहीं ले पा रहे हैं। कृषि में मशीनीकरण के कारण गो-वंश का उपयोग निरंतर कम होता जा रहा है। उन्होंने आह्वान किया कि हमें गो विरोधी स्थितियां, भावना और नीतियों को दूर करना है। भारतीय नौकरशाही और काले अंग्रेजों ने पिछले 50 वर्षों में गाय के लिए घातक नीतियां बनाई। उन्होंने कहा कि गोशाला और वृद्धाश्रम स्वस्थ्य समाज की निशानी नहीं है। वृद्धों का स्थान घरों में और गो-माता का स्थान किसान के खूंटे पर ही होना चाहिए। उन्होंने इस बात पद जोर दिया कि प्रत्येक विकासखंड पर नंदीशाला और पशु चिकित्सालय होना चाहिए। बेहतर चारे के लिए प्रत्येक जिले में गो-अनुसंधान केन्द्र विकसित होना चाहिए। सरकार को कृषि, सिंचाई, परिवहन और उर्जा नीति गाय के अनुकूल बनाना चाहिए। परिवहन के लिए भी मानव श्रम, पशु परिवहन और बस और रेल का अनुपात तय किया जाना चाहिए।
श्री गोविंदाचार्य ने जोर देकर कहा कि जैसी दृष्टि होगी वैसी ही सृष्टि होगी। हमारा नजरिया बदलेगा तभी नजारा बदलेगा। गौ और गंगा माता की रक्षा करने से ही राष्ट्रीय पुनर्निर्माण होगा। गौ माता का मुद्दा सांप्रदायिक नहीं राष्ट्रीय है। उन्होंने दावा किया कि जिस दिन गौ-वंश की संख्या इंसान से अधिक हो जायेगी उस दिन भारत पुनः विश्वगुरु बन जायेगा। इसके पूर्व श्री गोविन्दाचार्य ने हरदा, खंडवा और बुरहानपुर में भी यात्रा-सभा को संबोधित किया।
मध्यभात में आयोजित अनेक उप-यात्राओं का इसी सप्ताह समापन हुआ। 22 से 29 नवम्बर, 09 तक लाखों हस्ताक्षर कराए गए। ग्राम स्तर पद 5 से 15 दिसंबर तक और 15 से 25 दिसंबर तक उप यात्राओं का आयोजन हुआ था। उप यात्राओं के समापन पर गौ-भक्तों और विद्वानों ने सभा को संबोधित किया। भोपाल सहित सभी सभाओं में हजारों की संख्या में उपस्थित ग्रामीणों और नागरिकों को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने गाय की महिमा, गोवंश को खत्म करने के देशी-विदेशी षड्यंत्रों, सरकारी उपेक्षा, नागरिक लापरवाही और सज्जन शक्ति की उदासीनता पर प्रकाश डाला।

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