सोमवार, 7 सितंबर 2009

विष्व सभ्यताओं के अंतस्संबंध, आतंकवाद, मीडिया और भारत के बौद्धिकों पर दो दिवसीय संगोष्ठी


बहुकला केन्द्र भारत भवन में राष्ट्रवादी बद्धिजीवियों का दो दिवसीय समागम
अरसे बाद मध्यप्रदेश की राजधानी भेापाल में बुद्धिजीवियों का जमावड़ा हुआ। इस बौद्धिक जमघट में अधिकांश राष्ट्रवादी बुद्धिजीवी शामिल हुए। संगोष्ठी में देशभर के पत्रकारों, लेखकों और साहित्यकारों ने भी भागीदारी की। स्व. माणिकचन्द्र वाजपेयी राष्ट्रीय पत्रकारिता सम्मान समारोह के मौके पर मध्यप्रदेश शासन के जनसंपर्क विभाग ने दो दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया। इस दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में कुल चार चर्चा सत्रों का आयोजन किया गया। प्रथम सत्र में विश्व सभ्यताओं के अंतस्संबंध, दूसरे सत्र में वैश्विक आतंकवाद की चुनौतियां और भारत की भूमिका, तीसरे सत्र में स्वाधीन भारत राष्ट्र के बौद्धिक - अतीत और भविष्य तथा चैथे सत्र में भविष्य का भारत और मीडिया की भूमिका जैसे विषयों पर गंभीर बौद्धिक विमर्श हुआ।
‘‘विश्व सभ्यताओं के अंतस्संबंध’’
विश्व सभ्यताओं में संघर्ष नहीं, सतत संवाद की जरूरत
संगोष्ठी की शुरूआत ‘‘विश्व सभ्यताओं के अंतस्संबंध’’ पर विमश्आ। प्रो. कुसुमलता केडिया ने इस विषय पर अपना बीज वक्तव्य दिया और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता श्री राममाधव ने इस विषय पर विचार रखते हुए विषय को और अधिक विस्तार दिया। अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के सह संगठन मंत्री श्री श्रीधर पराड़कर कार्यक्रम में मुख्य अतिथि थे। मध्यप्रदेश के शासन के जनसंपर्क और संस्कृति मंत्री श्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की।
संगोष्ठी में वक्ताओं ने विश्व सभ्यताओं के ऐतिहासिक परिपेक्ष्य और आपसी संबंधों पर गहन विमर्श किया। विद्वान वक्ताओं ने असभ्यताओं के संघर्ष का उल्लेख करते हुए श्रेष्ठ दुनिया के लिए संभ्यताओं के बीच अंतस्संबंध की हिमायत की। सभ्यताओं के बीच संघर्ष की बजाए संवाद पर जोर देते हुए अपनी-अपनी सभ्यतामूलक श्रेष्ठताओं के आदान-प्रदान की जरूरत बताई गई। सुपर सिविलाइजेशन के आदर्श के नाम पर हमारे उपर विचार और आदर्श लादने की कोशिश की जा रही है, यह जायज नहीं है। इससे संवाद का मार्ग नहीं निकलेगा, बल्कि विरोध के स्वर ही मुखरित होंगे। पूर्वाग्रह रहित होकर दूसरों की पहचान और उनके विचारों को जानने-समझने और स्वीकार करने से ही बेहतर विश्व की कल्पना की जा सकी है।
गांधी विद्या संस्थान, वाराणसी की प्रो. कुसुमलता केडिया ने अपने बीज वक्तव्य में कहा कि धरती पर प्राचीन समय से ही उन्नत सभ्यताओं को अस्तित्व रहा है। इन सभ्यताओं का अपना-अपना वैशिष्ठ भी रहा है। सभ्यताओं के बारे में हमारा ज्ञान बहुत ही अल्प है। यह ज्ञान न तो सभ्यताओं की व्यापकता को और न ही उसकी प्राचीनता को समेट पाता है। आज विश्व सभ्यताओं के बारे में लाखों-करोड़ों वर्षों के तथ्य सामने आ रहे हैं। प्रो. केडिया ने युवा पीढ़ी को नइ तथ्यों और विश्व सभ्यता के इतिहास का अध्ययन करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि अध्ययन से ही भविष्य में ज्ञान के इस आलोक से परिचित भारत विश्व का नेतृत्व करने में समर्थ होगा।
इस विमर्श में मुख्य वक्ता के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता श्री राममाधव ने बोलते हुए कहा कि सिर्फ अपनी ही सभ्यता को श्रेष्ठ मानने के सोच से उपर उठना होगा। कोई धर्म या संस्कृति संस्कृति युद्ध नहीं करती, बल्कि व्यक्ति युद्ध करता है, यह बात कहने में आदर्श में लग सकती है। लेकिन यह सच नही हो सकता है। धर्म और संस्कृति इतिहास में अनेक युद्धों के कारक रहे हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी सभ्यता और संस्कृति को पूरी तरह नष्ट नहीं किया जा सकता। इसलिए किसी को भी अपनी सभ्यता और संस्कृति को आक्रामक तरीके से स्थापित करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। आज आपसी संवाद की बजाए ग्लोबलाइजेशन, साइंस एन्ड टेक्नाॅलोजी, ह्यूमन राइट्स और हथियारों के बल पर सुपर सिविलाइजेशन को स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। उदारता के साथ सभ्यताओं का परस्पर संवाद ही एकमात्र रास्ता है।
उद्घाटन सत्र में बतौर मुख्य अतिथि श्री श्रीधर पराड़कर ने कहा कि हमारे उपर विचार और परिभाषाएं लाद दी गई हैं। इससे संवाद और संबंध का मार्ग प्रशस्त नहीं, अवरूद्ध होता है। लेकिन संवाद के लिए हमें अपनी पहचान न तो भूलना चाहिए और न ही उसे नकारना चाहिए। अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए दुनियाभर में चल रहे प्रयासों का उल्लेख करते हुए श्री पराड़कर ने कहा कि लाशों पर सभ्यताएं नहीं बनती हैं। उन्होंने कहा कि निहित स्वार्थ नहीं बल्कि मनुष्यत्व के भाव से ही सभ्यताएं बनती और पनपती हैं। दूसरों के अस्तित्व और विचारों को जानना, समझना, मानना और उसे सम्मान देना होगा, इसी से विश्व संभ्यताओं के बीच अंतस्संबंध विकसित होंगे।
मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति और जनसंपर्क मंत्री श्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने उद्घाटन के अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि प्रदेश सरकार ने युवा पीढ़ी को अध्ययन की ओर प्रवृत करने के लिए प्रत्येक जिले में अध्ययन केन्द्र स्थापित करने का प्रयास करेगी। जनसंपर्क और संस्कृति सचिव श्री मनोज श्रीवास्तव ने स्वागत वक्तव्य प्रस्तुत किया। चर्चा की प्रस्तावना रखते हुए श्री श्रीवास्तव ने वैश्विक धरातल पर उपस्थित सांस्कृकि संकट को रेखांकित किया। सभ्यतागत संघर्षों का उल्लेख करते हुए उन्होंने भारतीय संस्कृति में संवाद और समन्वय की लंबी परंपरा को भी उद्धृत किया।
‘‘वैश्विक आतंकवाद की चुनौतियां और भारत की भूमिका’’
आतंकवाद से निपटने में सरकार से अधिक समाज की भूमिका
संगोष्ठी के दूसरे सत्र में वक्ताओं ने ‘‘वैश्विक आतंकवाद की चुनौतियां और भारत की भूमिका’’ पर अपने विचार प्रस्तुत किए। पांचजन्य के पूर्व संपादक और विचारक श्री देवेन्द्र स्वरूप ने इस चर्चा सत्र की अध्यक्षता की। भारतीय पुलिस सेवा की वरिष्ठ अधिकारी श्रीमती अनुराधा शंकर ने बीज वक्तव्य प्रस्तुत किया। लेखक और चिंतक प्रो. शंकर शरण तथा डाॅ. पवन सिन्हा ने आतंकवाद की चुनौतियों पर अपना उद्बोधन प्रस्तुत किया।
विश्व आतंकवाद से निजात पाने के लिए समाज को आगे आकर रणनीति तैयार कर अपनी लड़ाई स्वयं लड़नी होगी। वैश्विक आतंकवाद रूपी ताकत से निपटने के लिए वैचारिक स्पष्टता, द्ढ़ता एवं शक्ति का होना अत्यन्त आवश्यक है। सिर्फ राजनैतिक इच्छा शक्ति के आधार पर आतंकवाद पर विजय प्राप्त नहीं की जा सकती। आतंकवाद की विचारधारा से अनभिज्ञ रहकर हम आतंकवाद से लड़ाई नहीं लड़ सकते।
उपरोक्त चर्चा सत्र की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ पत्रकार और विचारक श्री देवेन्द्र स्वरूप ने कहा कि आतंकवाद के विरूद्ध युद्ध में भारत आध्यात्म के बल पर ही अपनी लड़ाई लड़ सकता है। लेकिन राजनैतिक नेतृत्व को भी आगे आकर अपना आत्मबल प्रकट करना होगा। उन्होंने इस अवसर पर महात्मा गांधी का उल्लेख करते हुए कहा कि गांधीजी का स्वाधीनता आंदोलन आध्यात्मिक शक्ति पर ही आधारित था। उन्होंने कहा कि आतंकवाद से निपटने में सरकार से अधिक समाज की भूमिका होती है। श्री स्वरूप ने कहा कि आतंकवाद के विरूद्ध संघर्ष एक कठिन चुनौती है। आतंकवाद का संचालन करने वाला अदृश्य होता है, उसका स्थान और तरीका पूर्व नियोजित होता है। आतंकवाद के शिकार हमेशा दृश्य होते हैं। उन्होंने कहा कि आतंकियों का उद्देश्य केवल मीडिया के जरिए पूरी दुनिया को भयभीत करना, शत्रु के मनोबल और आत्मविश्वास को खंडित करना और शत्रु के शिविर में अविश्वास पैदा करना होता है।
श्री स्वरूप ने कहा कि आतंकियों की लड़ाई सरकार से न होकर समाज से होती है। हमें युवाओं को में आतंकवाद से संघर्ष के लिए आत्मबल विकसित करना होगा। हमें आतंकियों की उस विधा को भी समझने की कोशिश करनी हं स्पोगी जिसके द्वारा वे नवयुवकों को जिहाद और आत्म बलिदान के लिए प्रेरित करते हैं। पुलिस और सैन्यबल के लिए आतंकवाद से संघर्ष करना कठिन है। इसके लिए हमें समाज और खासकर युवाओं को तैयार और तैनात करना होगा। आतंकवाद के विरूद्ध संषर्घ और सोच को हमें स्पष्ट करना होगा। आतंकवाद की चुनौती से निपटने के लिए एक तरफ तो हमें अपनी बौद्धिक तैयारी करनी पडे़गी वहीं राजनैतिक इच्छा शक्ति भी उत्पन्न करनी होगी।
वैश्विक आतंकवाद की चुनौतियों पर अपना उद्बोधन देते हुए राजनीतिशास्त्र के प्राध्यापक और स्तंभकार प्रो. शंकर शरण ने कहा कि आतंकवाद या नक्सलवाद के प्रति मीडिया को अपना दोहरापन खत्म करना होगा। उन्होंने कहा कि आतंकवादियों और नक्सलियों से बरामद दस्तावेजों की जांच-पड़ताल कर उनके मूल विचारों एवं कारणों तक पहुचना होगा। दुनिया में जितने भी कुख्यात आतंकवादी संगठन हैं उनमें मज़हबी शब्दावली का इस्तेमाल हो रहा है, इस पर विचार और इसका विरोध होना चाहिए। आतंकवादी संगठनों द्वारा भेजे जाने वाले ई-मेल की चर्चा बाहर भी होनी चाहिए, ताकि समाज भी उसकी विचारधारा से अवगत हो सके। उन्होंने कहा कि झूठ और हिंसा का आपसी संबंध होता है। यह आतंकवाद और नक्सलवाद के संदर्भ में भी लागू होता है। प्रो. शंकर शरण ने कहा कि आतंकवाद के परिपेक्ष्य में अब तक सिर्फ भौतिक लड़ाई पर ध्यान दियश गया है, वैचारिक लड़ाई पर ध्यान न देना अब तक की सबसे बड़ी भूल रही है। आतंकवाद से निपटने के लिए वैचारिक लड़ाई भी आवश्यक है। उन्होंने बौद्धिक वर्ग का आह्वान किया िकवे अपनी तर्क शक्ति से आतंकवाद जैसे खतरनाक और ज्वलंत विषय पर समाज को प्रेरित करें।
अपने बीज वक्तव्य में भारतीय पुलिस सेवा की वरिष्ठ अधिकारी श्रीमती अनुराधा शंकर ने कहा कि हमारे देश में 1980 तक पारंपरिक आतंकवाद 1990 के दशक में विभीषिकाजनक आतंकवाद में परिवर्तित हो गया। इसके लिए सोवियत संघ का पतन एक प्रमुख कारक रहा है। आधुनिक आतंकवादी संगठनों के पास आधुनिक ज्ञान और हथियार आ गए। आतंकवादी संगठनों ने ज्यादा से ज्यादा जनहानि पहुंचाने की रणनीति पर काम करना शुरू किया। श्रीमती शंकर ने कहा कि आतंकवाद के मूल स्वरूप को आज भी बहुत कम करके आंका जा रहा है। भारत में हुई मुम्बई की घटना के बाद वैश्विक आतंकवाद के पीड़ितों में भारत की प्रविष्टि हो सकी। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस वैश्विक आतंकवाद में नक्सलवाद भी शामिल है। भोपाल में पकड़ी गई नक्सलियों के हथियारों की फैक्ट्री का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि इसमें यूरोपीय देशों के हथियार भी मिले। भारत को वैश्विक आतंकवाद के संदर्भ में गंभीरतापूर्वक विचार और चिंतन करना होगा।
दिल्ली विश्वविद्याल में राजनीतिशास्त्र के प्राध्यापक डाॅ. पवन सिन्हा ने कहा कि वैश्विक आतंकवाद में अर्थव्यवस्था और विचारधारा महत्वपूर्ण कारक सिद्ध हुए हैं। वैश्विक आतंकवाद का ध्येय आर्थिक आधार अथवा अर्थव्यवस्था को तहस-नहस करना रहा है। डाॅ. सिन्हा ने आथर््िक मंदी और आतंकवाद के अंतस्संबंध का भी उल्लेख किया। चर्चा के प्रारंभ में मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति और जनसंपर्क सचिव श्री मनोज श्रीवास्तव ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि आतंकवाद को हमें मनोवैज्ञानिक धरातल पर समझना होगा।
‘‘स्वाधीन भारत राष्ट्र के बौद्धिक - अतीत और भविष्य’’
भारत में विचारों, विद्वानों और बौद्धिकों के स्वागत और समन्वय की परंपरा
संगोष्ठी के दूसरे दिन वक्ताओं ने ‘स्वाधीन भारत राष्ट्र के बौद्धिक - अतीत और भविष्य’’ विषय पर अपने विचार रखे। प्रख्यात चिंतक और राज्यसभा के पूर्व सदस्य डाॅ. महेश्शचन्द्र शर्मा ने इस चर्चा की अध्यक्षता की। डाॅ. मधुकरश्याम चतुर्वेदी ने बीज वक्तव्य दिया। प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज ने इस विषय पर शोधपरक उद्बोधन प्रस्तुत किया।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में दीनदयाल शोध संस्थान के पूर्व सचिव और सांसद डाॅ. महेशचन्द्र शर्मा ने कहा कि प्रत्येक भारतीय को अपने राष्ट्र को सही समझने और जानने की आवश्यकता है। कुछ वर्षों की अंग्रेजों की गुलामी ने भारतीय परंपरा और ज्ञान को बदलकर रख दिया है। भारत के हजारों वर्षों के इतिहास को सीमित कर दिया गया है। भारत जैसे महान देश को बनाने में वाणिज्य, कला, विज्ञान एवं दर्शन क्षेत्र की महान हस्तियों ने योगदान दिया है। उनकी पहचान दुनियाभर में है। डाॅ. शर्मा ने कहा कि युवा पीढ़ी को भारतीय संस्कृति व परंपरा के बारे में गहन शोध करने की आवश्यकता है। इन शोधों के जरिये सही भारत की पहचान दुनियाभर में हो सकेगी। उन्होंने भारतीय परंपराओं और हिन्दू दर्शन को वर्तमान पाठ्यक्रमों में शामिल किए जाने की वकालत की। भारत में स्वागत और समन्वय की परंपरा का उल्लेख करते हुए डाॅ. शर्मा ने कहा कि किसी भी विषय पर खुले मंच पर पक्ष एवं विपक्ष पर चर्चा होना चाहिए। इन खुली चर्चाओं के बाद ही सार्थक तत्व का बोध हो सकेगा।
संगोष्ठी में अपना वक्तव्य देते हुए निराला सृजनपीठ के निदेशक और भारत भवन के पूर्व सचिव प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज ने कहा कि अंग्रेजों के समय से शिक्षा व्यवस्था एवं विश्वविद्यालयों में वायसराय का दखल रहता था। इसका प्रभाव अब तक देखने का मिल रहा है। उन्होंने कहा कि महामना मदनमोहन मालवीय ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की थी, लेकिन आजादी के बाद यह विश्वविद्यालय भी पश्चिमी प्रभाव से अछूता नहीं रहा। प्रो. ंपकज ने देश के अनेक प्राचीन विश्वविद्यालयों के अस्तित्व समाप्ति की ओर ध्यान आकृष्ट किया। हिन्दुओं के संरक्षण के लिए राष्ट्रपति से विशेष प्रावधान करने का आग्रह भी किया।
चर्चा सत्र की शुरूआत राजस्थान विश्वविद्यालय के प्रो. मधुकर श्याम चतुर्वेदी के बीज वक्तव्य से हुई। प्रो. चतुर्वेदी ने कहा कि स्वतंत्र भारत में जब शिक्षा व्यवस्था की नींव डाली जा रही थी, तब हमारे राजनेताओं ने भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था की अनदेखी की थी। इसके दुष्परिणाम अब तक देखने को मिल रहे हैं। लंबे समय तक भारत के संविधान में राष्ट्र की गौरवशाली परंपरा और संस्कृति का उल्लेख तक नहीं था। ‘‘सेक्यूलर’’ शब्द की आड़ में बहुसंख्यक भारतीयों की भावनाओं की अनदेखी की गई। देश की स्वाधीनता आंदोलन का इतिहास कांग्रेस का पर्याय बनकर रह गया। अरविन्द एवं तिलक जैसे जननायकों के विचारों को पूरी तरह से मान्यता नहीं मिल सकी। इनज न नायकों का चिन्तन पश्चिमी चिन्तन से मेल नहीं खाता था। आज भारत में आत्म हनन को भारतीय संस्कृति की पहचान दी जा रही है। धर्म पर चर्चा निषेध हो गया है। इन सबके बावजूद भारतीय चिन्तन और परंपरा ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकारता है।
चर्चा के प्रारंभ में संस्कृति सचिव श्री मनोज श्रीवास्तव ने भारत में हजारों वर्ष पुरानी समृद्ध बौद्धिक परंपरा का हवाला देते हुए स्वाधीन भारत के बौद्धिकों का उल्लेख भी किया। उन्होंने कहा कि इतिहास और वर्तमान की बौद्धिक बुनियाद पर भारत का स्वर्णिम बौद्धिक भविष्य गढ़ा जायेगा।
‘‘भविष्य का भारत और मीडिया की भूमिका’’
वर्तमान समय में सिद्धांतों की पत्रकारिता आसान नहीं
संगोष्ठी का अंतिम चर्चा सत्र मीडिया पर आधारित था। ‘‘भविष्य का भारत और मीडिया की भूमिका’’ विषय केन्द्रित इस चर्चा सत्र में वरिष्ठ पत्रकार श्री महेश श्रीवास्तव ने अध्यक्षीय उद्बोधन दिया। टीवी कलाकार श्रीमती स्मृति ईरानी ने इस विषय पर अपना बीज वक्तव्य प्रस्तुत किया। राज्यसभा सांसद श्री प्रभात झा, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति श्री अच्युतानंद मिश्र, भाषाविद् श्री प्रभु जोशी और वरिष्ठ पत्रकार श्री श्रवण गर्ग ने इस विषय पर अपना उद्बोधन प्रस्तुत किया।
भविष्य का भारत और मीडिया की भूमिका को लेकर आयोजित चर्चा में पत्रकारिता, साहित्य और अभिनय क्षेत्रों की ख्यातिनाम हस्तियों ने अपने-अपने तर्कों और विचारों के माध्यम से मीडिया की भूमिका को अधिक सकारात्मक और विश्वसनीय बनाए जाने पर जोर दिया। विद्वान वक्ताओं के मुताबिक मीडिया के सामाजिक सरोकारों में पूंजी के रोडे को दूर करने की जरूरत है। विज्ञापनों का लगातार बढ़ता दायरा और हस्तक्ष्ेाप चिन्ता बढ़ाने वाला है। स्व. माणिकचन्द्र वाजपेयी और रामशंकर अग्निहोत्री की पत्रकारिता का उल्लेख करते हुए विद्वान वक्ताओं ने भविष्य के भारत निर्माण में मीडिया की भूमिका का खुलासा किया। पत्रकारिता विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में मौजूदा वक्त की जरूरतों के मुताबिक विषयों का समावेश करने पर भी जोर दिया गया।
मुख्यअतिथि के रूप में प्रख्यात टीवी कलाकार श्रीमती स्मृति ईरानी ने कहा कि भारत के भविष्य में मीडिया की भूमिका को लेकर आज तेजी से विज्ञापनदाताओं का दखल ज्यादा चिंता की बात है। ऐसी स्थिति में सिद्धांतों की पत्रकारिता अब आसान नहीं रही। श्रीमती ईरानी ने कहा कि मौजूदा पत्रकारिता की शक्ल पर सवाल खड़े करने के पहले हमें यह देखना होगा कि पत्रकार नौकरी किसकी कर रहे हैं। ऐसे में उनके फर्ज मालिक के आदेश और इसके मुताबिक काम करते हुए स्वयं के लाभ एवं हितों में फर्ज सिमट गए हैं। मीडिया में अपने अनुभवों और वर्तमान स्थितियों के मद्देनजर श्रीमती ईरानी ने नई पीढ़ी का आह्वान किया कि अब उसे देश के हित में फर्ज निभाने के लिए अपने विवके पर अच्छे और बुरे का निर्णय कर आगे का रास्ता तैयार करना होगा। अगर वे खुद से पहले राष्ट्र के बारे में सोचेंगे तो यह राह आसान हो जायेगी।
इस अवसर पर सांसद और वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रभात झा ने कहा कि मीडिया का अतीत गौरवशाली रहा है और इसका भविष्य भी गौरवशाली है। उन्होंने कहा कि भारत पूरे विश्व की समस्याओं का उत्तर है। श्री झा ने कहा कि आज देश में लोगों के भीतर नागरिक बोध से अधिक मतदाता बोध जागृत हो गया है। मीडिया को इसे समझना और दूर करना होगा। बदलते समय और भविष्य के भारत के संदर्भ में मीडिया की भूमिका अपेक्षाकृत अधिक बढ़ गई है। मीडिया को रोटी से अधिक राष्ट को महत्व देने की जरूर है।
वरिष्ठ पत्रकार श्री महेश श्रीवास्तव ने इस चर्चा सत्र में अध्यक्षीय उद्बोधन दिया। माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्याल के कुलपति श्री अच्युतानंद मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार श्री श्रवण गर्ग और श्री प्रभु जोशी ने अपने विचार रखे। जनसंपर्क और संस्कृति सचिव श्री मनोज श्रीवास्तव ने अतिथियों का स्वागत किया और प्रस्ताविक भाषण प्रस्तुत किया।
अनिल सौमित्र

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