सोमवार, 25 मई 2009

श्री विष्णु कुमार जी के बारे
बहुत दुःख हुआ . वे एक live-wire थे . उनसे मिलकर आपको लगता था की बस उठें और लग जाएँ वंचितों के कल्याण में . यद्यपि उनकी ऊर्जा का परिमाण इतना विशाल था कि उनके साथ चलना दुष्कर. उनका पदार्पण जब भी मेरे घर में हुआ, आशीर्वाद के साथ उनकी जिज्ञासा और हिदायतों ने हमेशा प्रेरित किया. बच्चों जैसा कौतुक और बुजुर्गों जैसी समझ.
उन जैसे साधू को क्या श्रद्धांजलि दी जाये? उन्मुक्त, अपने दरिद्र-नारायण की अनन्य भक्ति में लीन, उन्हें किसी प्रशंसा से जब जीवन में मतलब न रहा तो ऐसे निरहंकार प्राणी को देहांत के बाद क्या व्यापेगा?
एक रिक्तता हो गयी। अपूरणीय.
अनुराधा शंकर्

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