मंगलवार, 19 मई 2009

देवर्षि नारद: मीडिया के पथप्रदर्शक
अनिल सौमित्र

आज नारद जयंती है। ईस्वी सन् के अनुसार वर्ष 2009 और 11 मई है। किन्तु यह संयोग है। सामान्यतः नारद को भारतीय संदर्भों में जानना समझना ही उपयुक्त और समीचीन होगा। इसलिए नारद की जयन्ती भारतीय कालगणना के अनुसार ज्येष्ठ मास की कृष्णपक्ष द्वितीया को है। आंग्ल कालगणना के अनुसार तारीख और मास भले ही बदल जाये लेकिन भारतीय अथवा हिन्दू गणना के अनुसार प्रत्येक वर्ष की ज्येष्ठ मास की कृष्णपक्ष द्वितीया को ही उनकी जयंती होती है।
आज यह सवाल सर्वथा समीचीन है कि नारद को हम क्यों स्मरण कर रहे हैं। क्या इस लिए लिए वे भारत की ऋषि, महर्षि और देवर्षि की परंपरा के वाहक थे। या इसलिए कि उन्होंने अपने कर्तृत्व के द्वारा लोक कल्याण को धारण किया। महर्षि नारद के बारे में आम धारणा यह है कि वे देवलोक और भू-लोक के बीच संवादवाहक के रूप में काम करते थे। देवलोक में भी वे देवताओं के बीच संदेशों का प्रसारण करते रहे। लेकिन नारद मुनि के बारे में भू-लोक वासियों के मन में अच्छी छवि नहीं दिखती है। यही कारण है कि जो लोग अपनी संतान को एक अच्छा पत्रकार बनाना चाहते हैं भी उसका नाम नारद रखने से बचते हैं। कई लोग नारद मुनि के व्यक्तित्व की व्याख्या समाज में आज के चुगली करने वाले की तरह करते हैं। जिस पत्रकार के बारे में नकारात्मक टिप्पणी करनी होती है तो उसे आमतौर पर ‘नारद’ के नाम से ही संबोधित कर देते हैं।
लेकिन अब धीरे-धीरे नारद मुनि के बारे में सकारात्मक दृष्टि से चर्चा शुरू हो गई है। नारद के बहाने भारत में ऋषि-मुनि, महर्षि और देवर्षि जैसे विशेषणों के बारे में खोज-खबर शुरु हो गई है। नारद मुनि के बारे जितनी जानकारी उपलब्ध है उसके मुताबिक उनके व्यक्तित्व का सबसे महत्वपूर्ण पहलू एक कुशल संचारक, संप्रेषक और संवादवाहक का है। आज के मीडिया प्रतीकों के संदर्भ में विचार करें तो स्पष्टतः नारद और महाभारत काल के संजय की भूमिका मीडिया मैन की दिखती है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक प्रातःस्मरण में जिन महापुरूषों को बार-बार स्मरण करते हैं उनमें देवर्षि नारद का नाम प्रमुख है। संघ, नारद को भारतीय ज्ञान और संचार परंपरा का वाहक मानता है। उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को सही अर्थों में समझने और समझाने का गुरुतर दायित्व भी संघ ने अपने उपर लिया है। संघ अपने स्थापना काल से ही प्रचार से दूर रहा। लेकिन समय की आवश्यकताओं के मदद्ेनज़र संघ ने भी प्रचार को अंगीकार किया और इस दिशा में पहल की। प्रचार विभाग, संघ के संरचनागत ढांचे में शामिल है। प्रचार विभाग की ईकाइयां जिला स्तर पर कार्यरत हैं। संघ ने प्रचार को स्वीकार तो किया है, लेकिन इस क्षेत्र में कार्य करते हुए वह पूरी तरह सतर्क और सावधान है। जाहिर है, संघ के लिए प्रचार का एक सीमित उद्देश्य है। संघ को पता है कि अनियंत्रित और असंयमित प्रचार से संघ कार्य पर प्रतिकूल प्रभाव हो सकता है। शायद इसी सावधानी और सतर्कता के कारण संघ सीधे तौर पर मीडिया की दैनंदिनी गतिविधि में शामिल नहीं है। आवश्यकतानुसार निर्धारित व्यक्तियों के द्वारा मीडिया से चर्चा की जाती है। मीडिया क्षेत्र में दीर्घकालिक और योजनाबद्ध कार्य करने के लिए संघ की प्रेरणा से सभी प्रांतों में विश्व संवाद केन्द्र कार्यरत है। संवाद केन्द्रों की कार्य योजना में शोध, सूचना-प्रसार और प्रकाशन महत्वपूर्ण अंग है।
नारद मुनि की चर्चा जितना संघ के लिए प्रसंागिक है उतना ही मीडिया क्षेत्र और समाज के लिए भी। प्रचार या मीडिया का महत्व संघ के लिए आंशिक है। क्योंकि संघ समाज तक सीधे और प्रत्यक्ष पहंुचना चाहता है। लेकिन मीडिया का तो कार्य ही सूचना, शिक्षा और मनोरंजन का है। इसलिए नारद मीडिया के प्रतिमान भी हैं और पथप्रदर्शक भी। दिन-ब-दिन मीडिया का महत्व समाज जीवन में बढ़ता ही जा रहा है। व्यक्ति के निजी और सार्वजनिक जीवन में मीडिया का दखल और प्रभाव दोनों बढ़ता जा रहा है। मीडिया का हस्तक्षेप भौतिक और आध्यात्मिक दोनों स्तरों पर बढ़ रहा है। लोकतंत्र में मीडिया विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिक के साथ चैथे स्तंभ के रूप में कार्यरत है। मीडिया के अलावा अन्य तीनों स्तंभों पर किसी न किसी का नियंत्रण और नियमन है, लेकिन मीडिया रूपी यह चैथा स्तंभ किसी तंत्र के नियंत्रण या नियमन से परे है। अपेक्षा यह की जाती है कि मीडिया स्वयं ही अपना नियमन और नियंत्रण करे। यहीं पर देवषि नारद का व्यक्तित्व और कर्तृत्व मीडिया के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है। नारद का संपूर्ण जीवन और व्यक्तित्व एक व्यापक अध्ययन की मांग करता है। उनके कर्तृत्व का अनेक पहलू ऐसा है जो अनछुआ और अनसुलझा है। भारतीय ग्रंथों और साहित्यों में उन्हें तलाशने की आवश्यकता है।
आज जिन बातों की अपेक्षा सभ्य समाज मीडिया से करता है नारद का चरित्र और कर्तृत्व पूर्णतः उसके माकूल है। देवर्षि नारद ने सूचनाओं का आदान-प्रदान लोकहित का ध्यान में रखकर किया। कई बार उनकी सूचनाओं या संप्रेषण शैली से देवताओं को तनाव या व्यवधान उत्पन्न होता प्रतीत होता था, लेकिन लोक या जन की दृष्टि से विचार करने पर उनके अन्तर्निहित भाव का बोध सहज ही हो जाता है। आज मीडिया जब पूंजी, राज्य और बाजार के नियंत्रण में दिखता है, मीडिया का लोकोन्मुखी चरित्र विलुप्त-सा है। पाठक, श्रोता और दर्शक मीडिया अधिष्ठान के द्वारा ग्राहक बनाए जा रहे हैं। मीडिया अब उत्पाद बन गया है। सूचना, शिक्षा और मनोरंजन का घाल-मेल हो गया है। वर्तमान मीडिया, पश्चिमी और यूरोपीय प्रभाव से वशीभूत है। भारतीय मीडिया के प्राचीन नायक नारद को खलनायक की तरह देखने-समझने की बजाए सही अर्थों में जानने-समझने की चेष्टा होनी चाहिए। इसके पहले कि मीडिया से लोक का भरोसा उठ जाए, मीडिया के भारतीय प्रतिमानों, प्रतिरूपों और नायकों को ढूंढने की कोशिश होनी चाहिए। सही मायने में नारद, मीडिया के लिए पथप्रदर्शक हो सकते हैं।
हर वर्ष नारत की जयंती आती और चलर जाती है। भारत में महापुरूषों से सीखने, उनका अनुगमन करने और मार्गदर्शन प्राप्त करने की विधायक परंपरा पही है। ग्राम विकास और अन्त्योदय की बात हो तो गांधी, सर्वोदय की बात हो तो विनोबा, एकात्ममानववाद की बात हो दीनदयाल उपाध्याय हमें सहज ही याद आते हैं, ऐसे ही मीडिया की चर्चा हो तो नारद स्मरण स्वाभाविक ही है। नारद को अब प्रथम पत्रकार या संवाददाता के रूप में याद किया जाने लगा है। अगर चालू भाषा में कहें तो नारद फस्ट मीडिया मैन थे। लेकिन वे तत्व ज्ञान के जानकार, अध्येता और ऋषि परंपरा के वाहक भी थे। उनके व्यक्तित्व के अनेक पहलु अनजाने हैं, लेकिन एक संचारक, संवादवाहक और संप्रेरक के रूप में आमजन उन्हें जानता है, उनके इस रूप को और अधिक जानने की आवश्यकता है। भारतीय मीडिया जगत के लोग भी उन्हें इन्हीं अर्थों में जाने-समझे और स्वीकारे यह समय की मांग है।
(लेखक संघ के मीडिया केन्द्र से संबद्ध हैं।)

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