शुक्रवार, 22 मई 2009

मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद्
विकास में जनभागीदारी का ताना-बाना
अनिल सौमित्र

सभी के विकास के लिए यह आवश्यक है कि हम सभी साथ चलें, साथ बोलें और साथ-साथ सोचें। विकास के हितग्राही बनने से पहले हमें विकास में सहभागी बनना होगा। अर्थात् - संगच्छध्वम् संवद्ध्वम्। मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद् का यही सूत्र वाक्य है। विकास को सर्वस्पर्शी और सर्वग्राही बनाना समाज और सरकारों की कल्पना रही है। खासकर भारत में ‘‘राज्य को, संवैधानिक बाध्यताओं के द्वारा लोक कल्याणकारी बनाया गया है। अन्त्योदय और सर्वोदय से लेकर एकात्ममानववाद तक की परिकल्पना इन्ही आग्रहों के इर्द-गिर्द की गई है।
लंबे अरसे से भारत में विकास, एक सामाजिक पहलु रहा है। यह बहुत कुछ आध्यात्म केन्द्रित था। किन्तु जैसे-जैसे दुनिया की अन्य संस्कृतियों का भारत पर प्रभाव बढ़ा, विकास अर्थ केन्द्रित होता चला गया। समाज पर राजनीति और सरकार का प्रभाव उत्तरोत्तर बढ़ता गया। जाहिर है विकास की अवधारणा में अध्यात्म का लोप और सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक का दखल बढ़ गया। तब भारत में विकास को चार पुरूषार्थों के अंतर्गत देखा गया - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। ये चारों पुरूषार्थ विकास के माध्यम भी हैं और परिणति भी। किन्तु वर्तमान संदर्भों में विकास में अर्थ और काम हावी है, धर्म और मोक्ष का लोप हो रहा है।
मध्यप्रदेश में विकास की चर्चा चहुंओर है। यहां तक कि वर्ष 2003 और गत विधानसभा का चुनाव भी विकास के मुद्दे पर लड़ा गया। विकास चुनाव का मुद्दा बने और जनता इसे स्वीकार करे यह शुभ संकेत है। प्रदेश में यह शुभ संकेत घटित हुआ है। भाजपा ने विकास के नारे के साथ जनता का समर्थन प्राप्त किया और लगातार दूसरी सरकार बनाई। मध्य्रपेदश में विकास की चुनौती है। भाजपा सरकार ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान के नेतृत्व में इस चुनौती को स्वीकार किया है। अब सरकार विकास की भाषा बोलेगी, लेकिन समाज के साथ बोलेगी, समाज को साथ लेकर चलेगी। फिर वही सूत्र वाक्य - संगच्छध्वम् संवद्ध्वम्। लेकिन यह सूत्र अधूरा है। ऋग्वेद के दसवें मंडल, 191 वें सूत्र के दूसरे मंत्र में इसके आगे कहा गया है - संवोमनांसि जानताम्। देवाभागम् यथापूर्वें सं जानाना उपासते। आशय स्पष्ट है - जिस प्रकार पहले के देवता एकमत होकर अर्थात् मिल-जुलकर अपने-अपने यज्ञभाग (दायित्व) को स्वीकार करते आए हैं, उसी प्रकार उसी प्रकार तुम सब लोग साथ-साथ चलो, साथ-साथ बोलो और तुम सबके मन एकमत (ज्ञान प्राप्त करते हुए) हो जाएं। सीखने में साहचर्य के बिना साथ चलने और साथ बोलने की सार्थकता नहीं है। कठोपनिषद् में भी इस प्रकार का संदेश है। इसमें कहा गया - हम साथ-साथ भोजन करें, हम साथ-साथ पराक्रम करें, एक-दूसरे की रक्षा करें, किसी से द्वेष न करें। जनभागीदारी का अद्भुद संदेश।
मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद् की स्थापना के पीछे सोच यही थी कि विकास को सिर्फ सरकार का विकास न बनाया जाए, बल्कि इसे जन विकास में तब्दील किया जाए। विकास में जनभागीदारी, जनसहयोग, सामुदायिक सहभागिता और साझेदारी सुनिश्चित हो। जन अभियान परिषद् का गठन कांग्रेस शासन में हुआ। तब प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री दिग्विजय सिंह थे। तब भी जनभागीदारी की चर्चा खूब हुई। जिला सरकार और ग्राम स्वराज जैसी अवधारणाओं को भी काफी जगह मिला। लेकिन साफ नीयत और ईमानदार प्रयास के अभाव में सरकारी प्रयासों को अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाया।
चूंकि विधायिका और न्यायपालिका दोनों की मंशा यही है कि विकास में आम लोगों को भागीदार बनाया जाए, उन्हें योजना, रणनीति और क्रियान्वयन का हिस्सा माना जाए। इसलिए कार्यपालिका के स्तर पर भी इस प्रकार का प्रयास हुआ। लेकिन राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण कार्यपालिका ने भी इसे आधे-अधूरे मन से इसका क्रियान्वयन किया। वर्ष 2003 के चुनावी दृष्टि-पत्र और घोषणा-पत्र में स्वैच्छिक संगठनों के लिए ढांचागत और संरचनागत प्रयास के वायदे के साथ भाजपा ने इस दिशा में स्पष्ट संकेत दिया। गत वर्षों में मध्यप्रदेश की कार्यपालिका भी इस दिशा में सजग और सक्रिय हुई है।
अन्य प्रदेशों की भांति मध्य्रपेदश में भी हजारों स्वैच्छिक संस्थाएं कार्यरत हैं। सभी के अपने-अपने गुण-दोष होंगे। लेकिन एक नीति और स्पष्ट पद्धति और ढांचागत व्यवस्था न होने से जन, स्वैच्छिक संस्थाएं और सरकार के बीच सुनियोजित समन्वय नहीं हो पा रहा था। किन्तु भाजपा सरकार के प्रयासों से मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद् का पुनर्गठन हुआ है। ग्रामीण विकास विभाग की बजाय वित्त एवं योजना विभाग के साथ इसे संबद्ध किया गया है। अब स्वैच्छिक संस्थाओं और सरकार के बीच के संबंधों को जानने-समझने, उसकी व्याख्या करने, आवश्यकतानुसार संशोधित करने और एक-दूसरे के लिए उपयोग करने की व्यूहरचना विकसित करने की कवायद की जा रही है। कोशिश की जा रही है कि इस क्षेत्र में विश्वास को बढ़ावा दिया जाए और विवाद को कम किया जाए। स्वैच्छिक संस्थाओं का संग्रह और संकलन किया जा रहा है। उनके गूण-दोष और विशेषताओं की पहचान की जायेगी। तदनुसार उनके लिए प्रशिक्षण, सशक्तिकरण और नियमन की पद्धति और रूपरेखा तैयार की जायेगी।
प्रदेश के मुख्यमंत्री, जन अभियान परिषद् के पदेन अध्यक्ष होते हैं। मुख्यमंत्री के मार्गदर्शन में ही परिषद् का समूचा तंत्र कार्यरत है। विधान के मुताबिक एक अशासकीय व्यक्ति और वित्त, योजना, आर्थिक व सांख्यिकी मंत्री सहित इसके दो उपाध्यक्ष होते हैं। इसकी कार्यकारिणी सभा के सभापति मध्यप्रदेश शासन के मुख्यसचिव होते हैं। इसके साथ ही विभिन्न विभिगों के प्रमुख सचिव और पांच अशासकीय प्रतिनिधि इसके सदस्य होते है। अशासकीय प्रतिनिधि के तौर पर नामचीन स्वैच्छिक संस्थाओं के प्रतिनिधि मनोनीत किए जाते हैं। परिषद् का राज्य कार्यालय अपने अमले के साथ कार्यपालन निदेशक के नेतृत्व में निर्दिष्ट कार्यों को अंजाम देता है। वर्तमान में विभागीय मंत्री के अलावा अनिल माधव दवे भी इसके उपाध्यक्ष हैं। श्री दवे भाजपा के भी उपाध्यक्ष हैं। प्रदेश भाजपा के मुखपत्र ‘चरैवेती’ के संपादक होने के साथ-साथ वे ‘नर्मदा समग्र न्यास’ के अध्यक्ष भी हैं। लंबे अरसे से वे सामाजिक कार्यों और गतिविधियों में भागीदार रहे हैं। शिक्षा, महिला उत्थान और पर्यावरण के क्षेत्र में कार्यरत संस्था ‘भारती समाज’ के भी वे अध्यक्ष हैं। ‘‘जाणता राजा’’ नाम से संचालित सांस्कृतिक गतिविधि में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इनके मार्गदर्शन में जन अभियान परिषद् ने ‘‘रोटी और कमल यात्रा’’ तथा अंतरराष्ट्रीय नदी महोत्सव को अंजाम दिया। जन अभियान परिषद् के कार्यपालन निदेशक की जिम्मेदारी का निर्वहन पुलिस विभाग के अधिकारी राजेश गुप्ता कर चुके हैं। श्री गुप्ता का संबंध पुलिस विभाग से जरूर है लेकिन वे विकास कार्यो के भी सिद्धस्त हैं। खंडवा जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी के तौर पर उन्होंने जल संरक्षण और संवर्द्धन से संबंधित कार्यों को एक नया आयाम दिया। वे पर्यावरण, पारंपरिक खेती और जल संवर्द्धन के विशेषज्ञ के तौर पर जाने जाते हैं। अब जन अभियान परिषद् ढांचा विकासखंड स्त्र तक विकसित हो चुका है। संभाग, जिला और विकासखंड समन्वयक, मैदानी कार्यों को बेहतर तरीके से संपादित करने के लिए तैयार हैं।
प्रदेश की स्वयंसेवी संस्थाओं को सरकार से बहुत अपेक्षाएं हैं। सरकार भी इन संस्थाओं से अनेक अपेक्षाएं रखती है। अभी तो आरोप-प्रत्यारोप ही अधिक दिख रहा है। सरकार पर अनुदान में पारदर्शिता और ईमानदारी न बरतने का आरोप लगता रहा है। एक नई धारणा भी विकसित हुई है कि एनजीओ को अब ठेकेदार एजेंसी की तरह समझा जाने लगा है। वहीं सरकार को भी एनजीओ से कई शिकायतें रही है। अनुदान राशि का दुरूपयोग, विदेशी अनुदान का समाज और राष्ट्रविरोधी कार्यों में व्यय तथा कई एनजीओ की सरकार और समाज विरोधी कार्यों में संलिप्तता का आरोप भी गलता रहा है। विभिन्न कार्यों के लिए संस्थाओं के चयन में भेद-भावपूर्ण तौर-तरीके के बारे में भी आपत्ति दर्ज करायी जाती रही है। सरकार भी चाहती है कि एनजीओ पूर्वाग्रह रहित होकर विकास कार्यों में सहभागी बनें। निश्चित तौर पर देश में एनजीओ क्षेत्र का तेजी से विकास हो रहा है। मध्यप्रदेश ऐसा राज्य है जहां विकास में जनांदोलन में स्वैच्छिक संस्थाओं की काफी महत्वपूर्ण भूमिका है। निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की ही तरह एनजीओ क्ष्ेात्र का भी व्यापक विस्तार हुआ है। इस क्षेत्र के साथ ताल-मेल, समन्वय, सहयेाग और नियमन कठिन और चुनौतिपूर्ण तो है, लेकिन असंभव नहीं। हां इसके लिए स्पष्ट सोच और व्यापक दृष्टि जरूर चाहिए। जन अभियान परिषद् को स्वैच्छिक संस्थाओं के लिए आकर्षण का केन्द्र बनना है। उसे स्वयं सशक्त और सक्षम होना है। तदर्थ और संविदा ढांचागत विकास से आगे बढ़कर स्थायी संरचना और ढांचा विकसित करना है।
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने ‘स्वर्णिम मध्यप्रदेश’ का नारा दिया है। सच में यह प्रदेश को स्वर्णिम बनाने के लिए समाज और सरकार से आह्वान है। मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद् भी इस आह्वान को सफल बनाने के लिए सक्रिय हुआ है। यह समाज और सरकार के बीच एक सेतु की तरह काम करेगा। विकास की यात्रा को जरूरतमंदों तक ले जाने का प्रयास। सहस्रो जन संगठनों को साथ लेकर विकास की उड़ान भरने का काम। मुख्यमंत्री चाहते हैं- प्रदेश में कोई भूखा और भयभीत न रहे, निरक्षर और अशिक्षित न रहे। जन-जन समृद्धि और सम्पन्नता के साझीदार बनें। मानव और प्राकृतिक संसाधनों का कुशल प्रबंधन हो। हर हाथ को काम मिले। अर्थात् भय, भूख और भ्रष्टाचार रहित प्रदेश। ऐसा प्रदेश ही देश और दुनिया में सिरमौर बनेगा।
जाहिर है यह सब तभी होगा जब जन अभियान में व्यक्ति तो हो लेकिन यह व्यक्गित न हो, जन अभियान की राजनीति न हो, लेकिन इसमें राजनीति न हो। जन अभियान परिषद् जन संगठनों और स्वैच्छिक संस्थाओं का संगठन करे, इनके बीच में एक संगठन बनकर न रह जाए। व्यक्तिगत आशा-आकांक्षा, अपेक्षा और महत्वाकांक्षा विलीन होकर व्यापक रूप धारण करे। जन भागीदारी का दर्शन तभी फलीभूत होगा जब साफ नीयत से ईमानदार प्रयास होगा। कथनी और करनी में एकरूपता से ही ऋग्वेद के सूत्र को लागू कर पायेंगे, प्रदेश के हित में कुछ परिणाम दे पायेंगे। अभी तो जन अभियान की पक्रिया चल रही है, जल्दी ही कुछ परिणाम मिले यह सबकी अपेक्षा है। मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद् विकास में जन भागीदारी का ताना-बाना बुन रहा है। यह ताना-बाना निश्चित ही ‘स्वर्णिम मध्यप्रदेश’ के स्वप्न को साकार करेगा।

2 टिप्‍पणियां:

संगीता पुरी ने कहा…

हर राज्‍य ऐसा ही सोंचे .. शुभकामनाएं।

sareetha ने कहा…

विचार तो सभी आदर्श होते हैं लेकिन उनके क्रियान्वयन में ईमानदारी ज़रुरी है । बीजेपी चापलूसों,चाटुकारों और झाँकीबाज़ों से घिर चुकी है । जब तक वह अपने साथ ज़मीन से जुड़े लोगों नहीं जोड़ती किसी भी स्तर पर कुछ भी हासिल कर पाना नामुमकिन दिखाई देता है । हाल ही में बड़े तालाब के गहरीकरण अभियान में संघ के कार्यकर्ताओं को देखने का मौका मिला । स्वयंसेवकों को देखकर लगा कि इनके बूते पर संघ की विचारधारा कितनी दूर जा सकेगी ? सरस्वती शिशु मंदिर में अध्ययन का मेरा अनुभव कहता है कि संघ विचारधारा और मानसिक दृढ़ता की बात कहता है लेकिन जब श्रमदान महज़ फ़ोटो सेशन बन जाए और मैदान में तब्दील तालाब पिकनिक स्पॉट और संघ के अधिकांश कार्यकर्ता अपना कर्तव्य भुलाकर मौज-मस्ती में डूब जाएँ,अपने व्यक्तिगत हित साधने में व्यस्त हो जाएँ,सुबह दस बजे की धूप में कुम्हलाने लगें,तो फ़िर कहने-सुनने को कुछ भी शेष नहीं रह जाता । बीजेपी को समझना होगा कि चर्चा में बने रहने से सफ़लता हासिल नहीं होती । मज़बूती से पैर जमाने के लिये ठोस धरातल तैयार करना पड़्ता है ।