शनिवार, 23 मई 2009

15 वीं लोकसभा का एक संदेश यह भी -
राजनीति के दलाल, भगोड़े और ब्लैकमेलर सबक सीखें
अनिल सौमित्र
15 वीं लोकसभा का गठन हो चुका। लेकिन विश्लेषणों का दौर थमा नहीं है। राजनीति के जानकार और मीडिया के लोग अपने-अपने हिसाब से विश्लेषण कर रहे हैं, अपने-अपने तर्काें और विचारों की जमावट और सजावट कर लोगों तक परोस रहे हैं। इन्हीं विश्लेषणों में एक विश्लेषण यह भी है कि 15 वीं लोकसभा के लिए मतदाताओं ने खास किस्म के नेताओं के लिए कुछ संदेश और कुछ सबक दिए हैं। इन संदेशों और सबक पर भी गौर किया जाना चाहिए। हालांकि अभी यूपीए की सफलता के जयकारे में कोई भी दूसरी आवाज सुनाई दे यह मुश्किल है। लेकिन सुनाई न देने के डर से आवाज देना तो नहीं छोड़ा जा सकता। यूपीए, राहुल, सोनिया, मनमोहन की जय हो! लेकिन मतदाताओं ने ममता, नवीन, नीतीश और रमन की भी जय की है। छत्तीसगढ़ की 11 में से भाजपा को 10 सीटें देकर मतदाताओं ने राहुल, सेनिया और मनमोहन फैक्टर को नकारा और रमन फैक्टर को स्वीकारा है। यही हाल बिहार में, बंगाल में और उडी़सा में भी हुआ है। यद्यपि 15 वीं लोकसभा के लिए अखिल भारतीय स्तर पर किसी एक राजनैतिक दिशा का संकेत नहीं मिल रहा है, लेकिन मोटै तौर पर इस चुनाव ने कुछ इशारा तो दिया ही है, मसलन - युवा मतदाताओं का उत्साह और युवा नेतृत्व का उभार, सादगी और ताजगी को जनता का स्वीकार, सुशासन की ललक और स्वच्छ छवि वाले नेताओं के प्रति झुकाव आदि नए संकेत हैं।
लालू यादव, मुलायम सिंह, रामविलास पासवान, मायावती और अजीत सिंह जैसे नेताओं ने चुनाव के पूर्व और चुनाव के बाद जिस तरह की राजनीतिक हरकतें की है उससे आम जनता के बीच जो संदेश गया है वह बहुत ही निराशाजनक है। इनकी हरकतों से राजनीति में अब नए जुमलों का चलन हो जायेगा। ऐसा लगने लगा है कि राजनीति के दलालों, भगोड़ों और ब्लैकमेलरों को जनता ने सबक सिखाने की कोशिश तो की है, लेकिन शायद ये नेता अब भी सीखने को तैयार नहीं हैं। बिना किसी तर्क और आधार के जिस तरह से बिन बुलाए मेहमान की तरह बसपा, सपा, राजद और राष्ट्रीय लोकदल ने पाला बदलते हुए बिना मांगे ही समर्थन की घोषणा कर दी है। यह तो सरासर जनमत का अनादर और अपमान है। लालू और पासवान में तो इतना भी राजनैतिक शर्म नहीं बचा की वे जनादेश को स्वीकार कर विपक्ष में बैठकर रचनात्मक राजनीति करें। शायद उन्हें सत्ता की राजनीति की आदत हो गई है। वे सोनिया गांधी की तरफ मुंहबाए खड़े हैं कि किसी भी तरह उन्हें यूपीए में शामिल कर लिया जाए। सत्ता सुख न सही, कोई उनसे सम्मानजनक बात ही कर ले। कांग्रेस के बार-बार मना करने के बावजूद राजद, सपा और बसपा ने यूपीए को एकतरफा समर्थन की घोषणा कर दी है। ये दल और इनके नेताओं को अपने पापों का अनुमान है। वे भीतर-ही-भीतर डरे हुए हैं। नाजायज तरीके से जमा धनबल और बाहुबल का खतरा अब सताने लगा है। चुनाव प्रचार के दरम्यान कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने बसपा प्रमुख मायावती को सीबीआई का डंडा दिखाया ही था। कांग्रेस के पास अब तो सत्ता का डंडा है। इस डंडे का डर अब राजनीतिक दलालों, भगोड़ों और ब्लैकमेलरों को भयभीत करने लगा है। इसलिए भारतीय राजनीति में शायद पहली बार ऐसा हो रहा कि बिना मांगे ही समर्थन की बाढ़ आ गई है। वाम दलों ने तो जनता का संदेश समझते हुए विपक्ष में बैठने की घोषणा कर दी है, लेकिन तथाकथित तीसरे और चैथे मोर्चे के घटक दल तो जनता को फिर से धोखा देने पर आमादा हैं।
इसबार जनता ने भाजपा को भी कुछ सबक और संदेश देने की कोशिश की है। समझना-न समझना, मानना-न मानना पार्टी के नेताओं के उपर है। जनता का यह संदेश भाजपा के चाल, चरित्र और चेहरे के बारे में ही है। नरेन्द्र मोदी भले ही भाजपा को कांग्रेस से ज्यादा जवान बताते रहे, लेकिन भाजपा के थके-मांदे, बूढ़े और जर्जर चेहरे, पार्टी की चाल और चरित्र बयान कर रहे थे। जनता और मतदाता भाजपा के इन चेहरों को नानाजी देशमुख का संकल्प और आदर्श याद दिला रही है। क्या भाजपा के ये दीर्घजीवी नेता तब तक राजनीति का रास्ता और पार्टी का दामन नहीं छोडेंगे जब तक उनके वारिश इसे थाम न लें! भाजपा के ऐसे अनेक नेताओं को अपना प्रतिनिधित्व देने से जनता ने साफ मना कर दिया। अनेक क्षेत्रों में अपराधी और धनपशुओं को भी जनता ने करारा झटका दिया है। वरूण व मेनका गांधी, मुरलीमनोहर जोशी और योगी आदित्यनाथ की विजय सांप्रदायिक और जातीय राजनीति पर हिन्दुत्व की विजय पताका है। भाजपा को अपने स्थायी मुद्दे पर लौटने और दृढ़ता प्रदर्शन का संकेत है। भाजपा के कमराबंद चुनाव प्रबंधकों के लिए भी एक सबक - बंद कमरे में राजनीतिक प्रबंधन से बाज आएं, जनता की नब्ज टटोलें और जमीनी प्रबंधन करें। आयातित और भगोड़े नेता-कार्यकर्ता को जुटाने की बजाए नेता और कार्यकर्ता का निर्माण करें। जनता का मत है- भाजपा दूसरों की डालियों पर बैठने की बजाए अपनी जड़े मजबूत करे। भाजपा को फिर अपने कैडर, विचारधारा, मुद्दों और संगठन की ओर लौटना होगा।
15 वीं लोकसभा में जनता और मतदाता ने जाने-अंजाने एक साफ और स्पष्ट संकेत स्थायी सरकार का दिया है। जातीय, क्षेत्रीय, पारिवारिक और व्यक्तिवादी आधार पर चलने वाले दलों का किनारे लगाने की कोशिश मतदाताओं की है, हालांकि यह काम पूरा-पूरा नहीं पाया। देश की राजनीति दो दलीय और दो ध्रुवीय हो ये जनता की चाहत और राष्ट्रीय राजनीति की जरूरत है। लेकिन इसके लिए कांग्रेस और भाजपा दोनों को मशक्कत करनी होगी। कांग्रेस को सरकार और यूपीए गठबंधन की मर्यादा हो सकती है, लेकिन इस दिशा में शिद्दत से आगे बढ़ना भाजपा की जरूरत भी है और उसके लिए पांच साल का अवसर भी। संभव है बिहार का अगला चुनाव नीतीश कुमार बिना भाजपा के लड़े, जैसे उड़ीसा में नवीन पटनायक ने किया। नीतिश कुमार के सहयोग से बिहार में भाजपा आगे नहीं बढ़ रही, बल्कि पिछड़ रही है या यथास्थिति में है।
यूपीए, कांग्रेस, सोनिया, राहुल और मनमोहन सिंह के बारे में अभी कोई भी विश्लेषण निरर्थक होगा। क्योंकि अभी कांग्रेस को सबसे अधिक सांसद मिले हैं। अभी सरकार बनाने की खुशी है। सभी तर्क, विश्लेषण और विचार कांग्रेस के पक्ष में ही किए जायेंगे। ये सब वातानुकूलित हैं। लेकिन उन सवालों को झुठलाया नहीं जा सकता जो राष्ट्रीय क्षितिज पर मंडरा रहे हैं। आंतरिक और बाह्य सुरक्षा, आतंकवाद, आर्थिक मंदी, बढ़ती बेराजगारी, मंहगाई, दीर्घकालीन तुष्टीकरण से पैदा हुई समस्याओं को न तो यूपीए सरकार और न ही विपक्ष नकार सकता है। यह तो देश का काॅमन मिनिमम प्रोग्राम है। देश की जनता चाहती है समस्याओं का निदान, विकास के अवसर और सुरक्षित माहौल। उसने वादाखिलाफी, परिवारवाद, अहंकार, बेरूखी और दागदार छवि को नकार दिया है। नेताओं, पार्टियों और दलों के रहनुमाओं सावधान! भारतीय लोकतंत्र अब वयस्क हो रहा है। मतदाता सतर्क और सावधान है, इनके संकेत और सबक को पहचानों, उसपर अमल करो।

1 टिप्पणी:

Anil Pusadkar ने कहा…

इसमे कोई शक़ नही कि जो जनादेश जनता ने दिया है वो खण्डित है। चाहे छ्त्तीसगढ हो या उड़ीसा,वंहा के नतीजे अलग कहानी कह रह हैं। आपने बहुत सही लिखा है अनिल जी आपसे सौ प्रतिशत सहमत हूं।