सोमवार, 23 फ़रवरी 2009













झिरी गांव - अब आदर्श ग्राम का सपना दूर नहीं
संघ की शाखा का प्रभाव, आदर्श बने झिरी गांव
संघ के स्वयंसेवकों के लिए यह गर्व का विषय है, अपने स्वप्न को साकार हुआ देखना गौरवान्वित करता है। मीडिया के लिए यह कौतुहल का मुद्दा है। आखिर पूरा गांव संस्कृतमय कैसे है! बच्चा-बच्चा संस्कृत कैसे बोलता-समझता है। शोधार्थियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण विषय है। एक समूचा गांव स्वावलंबी और समर्थ कैसे बना, संपूर्ण समाज समरस कैसे है, गांव को सम्पन्न और समृद्ध बनाने वाले प्रेरक तत्व कौन-कौन हैं, गांव में स्व विकास का दौर कब और कैसे शुरू हुआ- ये और ऐसे कई सवाल हैं जो झिरी गांव को गर्व, कौतुहल और शोध का विषय बनाते है। झिरी गांव का प्रयोग संघ विरोधियों को विरोध का नहीं बल्कि विचार का विषय दे रहा है। संघ सिर्फ लाठी और चड्डी (निकर) वालों का ही संगठन नहीं है। संघ जीवन के सभी क्षेत्रों में व्याप्त हुआ है - ग्राम विकास के क्षेत्र में भी। यह ग्राम विकास पश्चिमी विकास माॅडल को नकारता और भारतीय पारंपरिक विकास प्रतिरूपों का दर्शन कराता है। झिरी गांव राजगढ़ जिले में है। प्रदेश की राजधानी भोपाल से लगभग 200 किमी की दूरी पर। एक गांव के कारण मध्यप्रदेश ही नहीं पूरे देश में राजगढ़ की चर्चा है। संभव है यह चर्चा राष्ट्र की सीमाओं को लांघ जाए। आखिर इस गांव के बारे में इतनी बातें क्यों हो रही है। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक कुप्हल्ली सीतारमैया सुदर्शन 9 फरवरी को झिरी गांव गए। इसके पहले वे शाजापुर में संघ कार्यकर्ताओं के दो दिवसीय प्रांतीय शिविर में थे। झिरी ग्राम पंहुचकर संघ प्रमुख घर-घर गए। एक-एक घर विकास, स्वावलंबन और समरसता का संदेश दे रहा था। जगह-जगह संस्कृत में लिखे वाक्य और पारंपरिक तौर पर स्वागत से संघ प्रमुख अभिभूत थे। उनकी खुशी का कारण भी था- वे संघ का सपना साकार होते देख रहे थे। स्वयंसेवकों का प्रयास और शाखा का प्रभाव संघ प्रमुख की आंखों के सामने था। 110 परिवार और लगभग 800 की आबादी वाला यह गांव स्वावलंबन और समरसता का परिचय दे रहा है। पानी, अन्न, शिक्षा और रोजगार के मामले में गांव स्वावलंबी है। विवाद और न्यायालयीन मामले ढूंढने पड़ते हैं। कुछ र्है भी तो स्थानीय समाधान पाकर खत्म होने की कगार पर। पूरा गांव संस्कृतमय। बच्चे-बूढ़े और जवान, स्त्री-पुरूष, गरीब-अमीर सभी संस्कृत में बातें करते हैं। अब गांव स्वयं को देववाणी में अभिव्यक्त कर रहा है। यह सब आश्चर्यजनक तो है, लेकिन हकीकत है। संघ के पुराने स्वयंसेवक बताते हैं। इस गांव में सन् 1978 में पहली बार शाखा लगी। पहले शाखा शुरू हुई और व्यवस्थित हुई। धीरे-धीरे यह शाखा प्रभावी होने लगी। प्रभावी शाखा का मतलब है - आस-पास के परिवेश और वातावरण को प्रभावित करने वाली शाखा। देशभर में शाखाओं को प्रभावी बनाने की संघ की पुरानी चाहत रही है। झिरी गांव की शाखा एक नमूना है। देशभर में ऐसी और भी कई शाखाएं हैं, लेकिन झिरी की यह शाखा, प्रभाव का नायाब नमूना है। शाखा के प्रभाववश झिरी गांव व्यवस्थित होने लगा हैं। शुरूआत गांव के जीर्ण-शीर्ण विद्यालय के जीर्णोद्धार से हुई। बाद में परंपरागत जल संरचनाओं का नवीनीकरण और नई संरचनाओं का निर्माण हुआ। खेती को रासायनिक प्रयोगों से मुक्त करने की कवायद की गई। अब गांव में जैविक खेती होती है। पानी और अन्न की उपलब्धता पूरे साल रहती है। लोगों की शिक्षा और साक्षरता के लिए वैयक्तिक और संागठनिक तौर पर कोशिश की जा रही है। गांव में भिन्न-भिन्न जाति वर्ग के लोग तो हैं, लेकिन वैमनस्य का नामोनिशान नहीं। समरसता की झलक चारों ओर दिखती है। गांव से पलायन नहीं है। हां, लोगबाग रोजगार की तलाश जरूर करते हैं। लेकिन वे रोजगार पाने में सक्षम हुए हैं। वे अब अवसरों का बेहतर लाभ ले सकते हैं। उदय सिंह चैहान इसी गांव के निवासी हैं। संघ के स्वयंसेवक और कार्यकर्ता हैं और संस्कृत भारती संगठन के जिला प्रमुख भी । श्री चैहान गांव में संस्कृत विकास के बाबत बताते हैं- वर्ष 2002-03 से झिरी गांव में संस्कृत का प्रचार-प्रसार श्ुारू हुआ। संस्कृत भारती की दो महिला पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं ने यहां काम शुरू किया। गौरतलब है कि इसमें से एक कार्यकर्ता मतान्तरित इसाई है। विमला पन्ना और बालाप्रसाद तिवारी ने गांव के लोगों को संस्कृत सिखाना शुरू किया। आज गांव के समस्त बाल, युवा और वृद्ध संस्कृत बोलते है। झिरी आज संस्कृत ग्राम बन चुका है। अब तो आस-पास के गांव भी संस्कृत अपनाने लगे हैं। झिरी गांव की प्रभावी शाखा ने गांव को ही प्रभावी बना दिया है। अब खरबूजे (झिरी) को देख आस-पास के खरबूजे (मंडला और सुसाहेड़ी) भी रंग बदलने लगे हैं। संघ के सरसंघलाचक श्री कुप्.सी. सुदर्शनजी ने गांव के लोगों के बीच बोलते हुए कहा कि चाहे ग्राम विकास हो या संगठन का विकास, कुछ लोगों को विशेष प्रयास करना होता है। अगर संकल्प के साथ काम करें तो हमें कोई रोक नहीं सकता। प्रगति के लिए समूचे समाज को हाथ मिलाकर रास्ते खोजने होंगे। गांव के पिछडेपन, गरीबी और दुर्दशा के लिए सरकारी नीतियों, खासकर नेहरू की पश्चिमी परस्त नीतियों को जिम्मेवार बताते हुए उन्होंने कहा कि श्री नेहरू के प्रधानमंत्री बनने से शहरों का विकास हुआ, गांवों का नहीं। वे शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के पोषक थे, ग्रामीण विकास के नहीं। नेहरू ने यह सब पश्चिमी प्रभाव के कारण किया। अंग्रेजों के समय से ही शहरों के विकास पर विशेष बल दिया गया, लेकिन गांव की उपेक्षा की गई। नेहरू ने भी इसी नीति को आगे बढ़ाया। जबकि सच्चाई यही है कि गांवों के विकास से ही देश का विकास संभव है। गांव के लोग समृद्ध होंगे तभी देश समृद्ध होगा। हमें गांव के सर्वांगीण विकास पर जोर देना है। संघ प्रमुख ने अपना उद्बोधन संस्कृत में न दे पाने के कारण गांव के लोगों से क्षमा मांगी। उन्होंने कहा कि झिरी अब ‘प्रभात ग्राम’ की श्रेणी में आ गया है। संघ ने ग्राम विकास की दृष्टि गांवों की तीन श्रेणियां बना रखी है। संघ के मुताबिक गांव पहले किरण, फिर प्रभात और अंत में उदय ग्राम का दर्जा पायेंगे। सभी के लिए अलग-अलग मानक भी तय किए गए हैं। गौरतलब है कि प्रभात ग्राम के मानकों पर खरे उतरने के बाद ही झिरी को प्रभात ग्राम का दर्जा मिला है। झिरी को अब उदय ग्राम बनना है। तभी वह संपूर्ण आदर्श ग्राम बन पायेगा। श्री सुदर्शन जी ने कहा कि गांव को ‘प्राकृतिक खेती’ का केन्द्र बनाया जाए। यह गांव पूरे देश के लिए एक उदाहरण बन सकता है। मध्यप्रदेश सरकार के मुखिया श्री शिवराज सिंह चैहान ने ‘स्वर्णिम मध्यप्रदेश’ का नारा दिया है। लेकिन नारा सरकारी प्रयासों से पूरा नहीं हो सकता। झिरी ग्राम, सामुदायिक प्रयास और जन भागीदारी का भी सटीक उदाहरण है। यहां का प्रयास, सरकारी महकमे के लिए भी उदाहरण बन सकता है। अनिल सौमित्र

3 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

सही कह रहे हैं. सधा हुआ आलेख.

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत सुंदर आलेख...महा शिव रात्रि की बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं..

बेनामी ने कहा…

Its really very heartening to read this entry. I wish that Jhiri becomes a Uday Gram.
And the light spreads to entire world.