सोमवार, 15 दिसंबर 2008

श्री बालकृष्ण शर्मा ‘‘नवीन’’ की संपादकीय टिप्पणियां ......

अनिल सौमित्र
कविवर और पत्रकार श्री बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ के आलेखों और संपादकीय टिप्पणियों के बारे में कुछ भी कहने और लिखने की मेरी औकात नहीं है, उनके लिखे हुए पर आलोचनात्मक ही नहीं, प्रशंसात्मक दृष्टि रखने का भी साहस नहीं कर सकता। सही कहें, तो यह मेरी योग्यता और क्षमता से परे है। हां! मैं इतनी हिमाक़त ज़रूर कर सकता हूं कि श्री ‘‘नवीन’’ जी की लिखी रचनाओं, अग्रलेखों और संपादकीय टिप्पणियों से मेरी जो समझ बनी है, उसे आपके साथ बांटने की कोशिश करूं। सही मायने में तो यह कार्यक्रम भी पत्रकारिता के बारे में और विशेषकर श्री नवीन जी के व्यक्तित्व और कर्तृत्व के बारे में स्वयं मुझे समृद्ध करने का एक निमित्त बना है। मेरे लिए यह सौभाग्य का विषय है, इस सौभाग्य के लिए आयोजकों के प्रति अनुग्रह भाव व्यक्त करता हूं। श्री बालकृष्ण शर्मा नवीन का व्यक्तित्व बहुआयामी था। उनका व्यक्तित्व कई अर्थों में अनोखा और असाधारण रहा। दरअसल उनके व्यक्तित्व का एक संश्लिष्ट प्रभाव था, जिसमें सर्जक, पत्रकार, विचारक, राजनीतिज्ञ और इतिहासकार सभी समाहित थे। इन सबके साथ, बल्कि इन सबके उपर, वे एक बेहद संवेदनशील मनुष्य थे। मैं यहां उनके पत्रकारिता कर्म के बारे में अपनी समझ का उल्लेख करूंगा। समाज, साहित्य और परहित में अतिशय तल्लीनता और अपने प्रति नितांत निस्संगता के कारण, उन्होंने रचनाओं के संकलन-प्रकाशन की चिन्ता कभी नहीं की थी। उनकी कविताओं के संग्रह तो उनके जीवन काल में प्रकाशित हुए, दो संग्रह - ‘‘प्राणार्पण’’ एवं ‘‘हम विषपायी जनम के’’ उनकी मृत्यु के बाद छपे। लेकिन उनका सबसे अधिक सार्थक और प्रभावी लेखन, उनका गद्य साहित्य, जो लेखों, निबंधों, संस्मरणों, भाषणों और संपादकीय टिप्पणियों के रूप में यत्र-तत्र बिखरा हुआ है, संपूर्ण रूप में एक जगह संकलित नहीं हो सका। जो कुछ भी उपलब्ध साहित्य है, उसके अध्ययन से कई महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक तथ्य उजागर होते हैं । ये तथ्य और विचार, भले ही तत्कालीन संदर्भों के मद्देनज़र लिखे गए हों, लेकिन उनका महत्व आज के संदर्भों में अधिक समीचीन दिखता है। श्री नवीन जी का लेखन भविष्य को परिलक्षित करने वाला वर्तमान था। श्री बालकृष्ण शर्मा नवीन की टिप्पणियों में अंबेडकर, राजगोपालाचारी, महात्मा गांधी, पं। जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचन्द्र बोस, पुरूषोत्तमदास टंडन, सरदार पटेल, संपूर्णानंद, रफी मोहम्मद, कमला नेहरू आदि पर संस्मरणात्मक टिप्पणियां और लेख हैं। राष्ट्रीय आंदोलन, मजदूर संगठन, साम्यवादी दल और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गंभीरतापूर्वक मूल्यांकन है। दुनिया में होने वाले बदलावों और भारत पर उसके प्रभावों, युद्ध और क्रांतियों आदि के बारे में उनकी संपादकीय टिप्पणियों ने न सिर्फ पाठकों को, बल्कि आमजन को उद्वेलित किया। उनके लेखों में साहित्य की विभिन्न विधाओं, मंजिलों और धाराओं के साथ ही आंदोलनों, वादों और बहसों से परिचय होता है। उन्होंने स्थानीय और वैश्विक, सभी मुद्दों को राष्ट्रीय दृष्टि से देखने की कोशिश की। रूस के व्यापक समर्थन के साथ-साथ अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, इटली, ग्रेट ब्रिटेन से सम्बद्ध समझौतों और विरोधों पर भी उन्होंने बेबाक टिप्पणियां की हैं। ‘प्रताप’ और ‘प्रभा’ के संपादकीय लेखों और स्तंभों में राष्ट्र के लिए अंग्रेजों के खिलाफ ललकार और हिन्दू-मुस्लिम एकता के बारे में दूरगामी दृष्टि दिखती है।

वस्तुतः नवीन जी के लेखन को समझने के लिए हमें तत्कालीन देश, काल और परिस्थितियों के संदर्भ में भी विचार करना होगा। हमें उस वातावरण के बारे में भी विचार करना होगा जिसमें श्री नवीन जी की पत्रकारिता को संस्कार प्राप्त हुआ। श्री बालकृष्ण शर्मा नवीन जी का जन्म वैसे तो मध्यप्रदेश में हुआ, लेकिन उनकी कर्मभूमि उत्तरप्रदेश और वियोग भूमि दिल्ली रही। उनकी प्रारंभिक शिक्षा यहीं शाजापुर में हुई, लेकिन पत्रकारिता की दीक्षा उन्हें अमर शहीद गणेश शंकर विद्याथी जी से मिली। श्री विद्यार्थी जी के समस्त संस्कार और क्रांति की भावना, नवीन जी में अवतीर्ण हो गई। 1916 में वे श्री विद्यार्थी जी के संपर्क में आए। 1917 में उनका संपर्क ‘‘प्रताप’’ के साथ आया। यह संबंघ निरन्तर प्रगाढ़ होता गया और मृत्युपर्यन्त बना रहा। वे अल्हड़, किन्तु संवेदनशील और आक्रामक स्वभाव के थे। श्री नवीन के सहयोगी श्री पालीवाल ने लिखा है कि ‘‘ 1920 तक जिस बालकृष्ण शर्मा नवीन की ओर से हम पत्रकारिता की दृष्टि से निराश थे, वही बालकृष्ण परम प्रसिद्ध पत्रकार हो गया। उसके लेखों की धाक थी। अंग्रेजी के अच्छे-अच्छे दैनिक पत्रों में भी बालकृष्ण के लेखों की चर्चा होती थी।’’ उनके लेखन को अगर वर्तमान देश-काल के संदर्भ में देखने की कोशिश करें तो कई खतरनाक सच उजागर होते हैं। भारत में मुस्लिम समस्या को उन्होंने सांप्रदायिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय दृष्टिकोण से देखा। इस विषय पर समाज का उद्बोधन किया। देश पर मुस्लिम आक्रमण के प्रारंभ से मुगल काल, खिलाफत आंदोलन, देश विभाजन, घुसपैठ, आतंकवाद और अल्पसंख्यकवाद की विषबेल को देखें तो वर्षों पहले उनके लिखे और कहे का मोल समझ में आता है। ‘प्रताप’ के 17 सितंबर, 1923 के अंक में ‘‘मंा तेरे बच्चे!’’ शीर्षक से उन्होनें अपनी संपादकीय टिप्पणी में लिखा - ...... हां मां ! तेरे मुसलमान बच्चे पागल हो जाते हैं। वे अपने-पराये को भूल जाते हैं। वे नहीं जानते कि मां की छाती पर मूंग दलने से नाश हो जाता है। वे अपने-पराये को भूल जाते हैं। बात-बात में अपने संकुचित धर्मभाव को ले आते हैं, इस्लाम धर्म की पवित्रता सारे संसार की आंखों में गिरा देने में वे तनिक भी नहीं हिचकते हैं। मां, उनके जीवन के अन्य आचरण और उनके धर्माचरण में कितना अंतर है। वे धर्म को भूल गए हैं। हां, वे दिन में छह बार ‘अश्शहत बन लाइलाह इल्लिल्लाह’ की प्रेमपूर्ण ध्वनि करते हैं। दिन में कई बार - ईश्वर एक ही है, की वे शहादत देते हैं। परन्तु मां, बतला तो यह कौन-सा ईश्वर विश्वास है, जो उन्हें जरा-सी बात पर पशु बना देता है और जरा-सी बात पर वे जघन्य कांड करने में नहीं हिचकते हैं।’ अपने लेखन की तीव्रता तथा तीक्ष्णता के कारण ही, सन् 1931-32 में उन्होंने, मुस्लिम लीग के बारे में ‘‘प्रताप’’ में लिखा - ‘गंुडागिरी रोकने में यह नपुंसकता कैसी?’ इस संपादकीय अग्रलेख ने उत्तरप्रदेश सहित समूचे देश में हडकंप मचा दिया था। इस लंबे अग्रलेख के कुछ अंशों का यहां उल्लेख कर रहा हूं - ‘‘हम वह उंट हैं जिसकी पीठ पर बेतहाशा बजनी लाद दी गई है और हमने आज तक किसी प्रकार की चूं-चा नहीं की। हम बलबलाए नहीं। नकेल नहीं तुडाई, दुम नहीं हिलायी। चुपचाप रहे। लेकिन अब ता. 14 अप्रैल के लखनउ एसेम्बली भवन वाले वाकयात ने हमारे ऐसे ऐबदार की भी कमर तोड़ दी है और हम आज चीखने और चिल्लाने पर मजबूर हो गए हैं। आखिर कमजोर और ढिल्लड़पन की कोई हद भी होती है? शुरू से लेकर आज तक इस सूबे में फिरकेवाराना फसादात और पुलिस के सिर्फ एक तबके की खुल्लम-खुल्ला फिरकापरस्ती और हाल ही की हरकतों को रोकने या संभालने में हमारी कांग्रेस सरकार ने निहायत बुजदिली और बेबसी से काम लिया है। महीनों की ढील-ढाल और तूलतबील कार्यशैली ने गुंडापन को उभारा है। लोग शेर हो गए हैं। अब गुंडे खुल्लम-खुल्ला कहते हैं कि कोई हमारा क्या कर लेगा? और वे ठीक कहते हैं। किसी ने उनका क्या कर लिया? उन्होंने जो मन में आया, किया। एक मर्तबा वे पहले, शायद गुजिश्ता मार्च में एसेम्बली भवन में घुस गए, वहां उन्होंने मनमाने नारे लगाए और चलते बने। वे मूंछों पर ताव देते हैं कि किसी ने हमारा क्या कर लिया? 24 तारीख को वे फिर एसेम्बली में घुस आए। सरकारी कागजा़त फाड़े, फाइलों पर हाथ साफ़ किए, एसेम्बली सभा भवन में प्रधानमंत्री की लू-लू बोली, मेज कुर्सियां तोड़ी, और तब हटे जब नवाब इस्माइल ने उनसे चले जाने को कहा। हमारी सरकार बड़ी भली है, उदार है। बड़ी दूरन्देश है। बहुत फंूक-फूंककर क़दम उठाती है - क्या कहने हैं? लानत है इस भोलेपन और इस दूरन्देशी पर। क्या पचास-साठ या सौ-सवा सौ गुंडे गिरफ्तार नहीं किए जा सकते थे? सुना है कि जिस वक्त एसेम्बली भवन में यह उत्पात हो रहा था उस वक्त आला सरकारी अफसर ने कहा कि गुंडों पर गोली चला देनी चाहिए। लेकिन नहीं। भलमनसाहत का प्रदर्शन किया गया। नतीजा यह है कि उत्पाती लोग आज लखनउ की गलियों और बाजा़रों तक में सीना उभारे घूम रहे हैं। और अपनी दिलेरी का परवान अकड़-अकड़कर कर रहे हैं।’’ श्री नवीन की तल्ख टिप्पणियों में एक और है - खिलाफत आंदोलन से संबंधित। ‘प्रभा’ के 1 अप्रैल, 1924 के अंक में बालकृष्ण शर्मा नवीन ने लिखा कि ‘गत मास अन्तर्राष्ट्रीय जगत में सबसे महत्वपूर्ण घटना खिलाफत का उन्मूलन है। खिलाफत का उन्मूलन और वह भी टर्की की ग्रांड नेशनल एसेम्बली द्वारा यह ऐसी घटना है, जिसका महत्व और जिसका गुरूत्व हम और समझने की कोशिश कर सकते हैं। ... कहने को तो कहा जा सकता है कि खलीफा अखिल मुस्लिम समाज को ऐक्य सूत्र में बांधे रख सकते हैं, पर क्या यह बात ठीक है? .... यदि खिलाफत का सारा का सारा इतिहास इस तरह की मार-काट से भरा हुआ है तो ऐतिहासिक दृष्टि से यह कैसे कहा जा सकता है कि खिलाफत की संस्था ऐक्य स्थापना की पहली सीढ़ी है। धार्मिक कारणों की छानबीन करने का अधिकार हमें प्राप्त नहीं, क्योंकि मुस्लिम धर्म भावना के औचित्य-अनौचित्य का विचार करना हमारे लिए अनाधिकार चेष्टा होगी। हम तो केवल बौद्धिक कारणों पर विचार कर सकते हैं।’ नवीन जी के सम्पादकीय अग्रलेख खासे लम्बे होते थे। निश्चित रूप से अग्रलेख पाठकों द्वारा पढ़े जाते थे। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि तब पत्रों में समाचारों की संख्या आज की तुलना में काफी कम हुआ करती थी। लोगों को पढ़ने के लिए समाचार कम, किन्तु विचारों की अधिकता होती थी। इसलिए अग्रलेख और संपादकीय टिप्पणियों को गंभीरता के साथ पढ़ा जाता था। भाव-प्रवणता और तीक्ष्णता ही, नवीन जी की संपादकीय टिप्पणियों की जान थी। तत्कालीन सामाजिक, राजनीति, आर्थिक व अन्य विषयों पर तत्काल और लगातार टिप्पणियों के कारण पाठक नवीन जी के लेखों की प्रतीक्षा करता, उनके विचारों का विश्लेषण और उसपर विमर्श किया जाता, यही एक लेखक, पत्रकार और संपादक के प्रयासों की सार्थकता थी। ‘प्रताप’ के 24 सितंबर, 1924 के अंक में श्री नवीन लिखते हैं - देश का राजनीतिक जीवन शिथिल-सा हो गया था और दलबंदियों की कृपा से हमलोगों ने एक-दूसरे के उपर आक्षेप करने में ही अपनी इति-कर्तव्यता समझ रखी थी। ..... अब यदि नेताओं के सामने किसी महान् समिति की आज्ञा न होगी तो वे देश को अपनी-अपनी दिशा में खींचते रहेंगे। उन्होंने लिखा कि ‘हिन्दू-मुस्लिम ऐक्य की दृष्टि से बैठक काफी महत्वपूर्ण थी। ‘महात्मा जी और मजदूर’ शीर्षक से प्रभा के 1 अप्रैल, 1924 के अंक में श्री नवीन जी ने लिखा - ...क्योंकि भारत को तो अपने ही पांवों के बल खड़ा होना है। यदि भारतवर्ष पूरा बलवान और स्वावलंबी हो जाए तो फिर ब्रिटिश मंत्रिमंडल चाहे किसी पक्ष का क्यों न हो, वह झुके बिना नहीं रह सकता।

तत्कालीन राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियां ऐसी थी कि उन्होनें, श्री नवीन जी का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया। श्री नवीन जी ने भी अपनी लेखनी से जनता और सरकारों का ध्यान देशी और विदेशी समस्याओं की ओर आकर्षित किया। यह वह समय था जब प्रथम विश्व युद्ध से निकल कर दुनिया के महत्वपूर्ण देश, दूसरे विश्व युद्ध की ओर तेजी से बढ़ रहे थे। ब्रिटेन समेत अनेक बड़े देश दो समूहों में बंट गए थे। दुनिया में मुस्लिम आंदोलन भी जोरों पर था। एक तरफ सामाजिक आंदोलनों को गति मिल रही थी, वहीं अंग्रेजी सत्ता की मुखालफत भी तेज हो गई थी। अंग्रेज विरोधी संघर्ष पर खिलाफत आंदोलन का भी काफी असर होने लगा था। अपने देश में भी समाज को संगठित करने, विशेषरूप से हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात जोर-शोर से उठाई जा रही थी। भारत में हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य के बारे में श्री नवीन जी ने लिखा कि ‘दुश्मनों के घर में घी के दीये जलते हैं, जब हम लोग आपस में लड़ते हैं।’ प्रताप के 17 सितंबर के अंक में उन्होंने ‘हिन्दू संगठन या संगठन’ शीर्षक से लिखा - देहली में हिन्दू-मुस्लिम नेताओं की एक सभा में हिन्दू संगठन और श्ुाद्धि के प्रश्नों पर विचार किया गया। संगठन के विषय में हिन्दू नेताओं ने राष्ट्रीयता के नाम पर संगठन में हिन्दू और मुस्लिम दोनेां को एकत्रित करने का विचार किया है। हिन्दू संगठन के पक्षपातियों का सबका यह कर्तव्य है कि हम ऐसी परिस्थिति उत्पन्न करें जिससे यह हिन्दू संगठन, संगठन का एक साधन हो जाए। दुनिया के अन्य देशों में जातीय, भाषायी और राष्ट्रीय एकसूत्रता का उदाहरण देकर, उन्होंने बार-बार कोशिश की कि अपने देश भारत में भी सब एक होकर नवयुग की शुरुआत करें। ‘प्रभा’ में उन्होंने ‘‘मिस्र में नवयुग’’ शीर्षक से लिखा - ....हे प्राचीन मिस्र देश, तुम्हारी प्राचीन सभ्यता से भी जिस देश की सभ्यता प्राचीनतर है, वह देश आज परतंत्रता की जंजीरों में जकड़ा हुआ है। तुम प्रसन्न रहो और एकता के आदर्शों से प्रार्थना करो कि जिस प्रकार तुम्हारे पुत्रों ने क्रिश्चियन, मुसलमान और यहूदी के भेद-भाव को भूलकर तुम्हारी अर्चना की है उसी प्रकार वृद्ध भारतवर्ष के पुत्र हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, पारसी, क्रिश्चियन और यहूदी के भेद-भाव को भूलकर स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए तन-मन से तत्पर हो जायें। नवीन जी के इन आह्वानों में विश्व स्थिति की गंभीर विवेचना और भारतीय स्थिति का तथ्यपूर्ण विश्लेषण संदर्भ की तरह है। वे अपने देश के लिए भी सुधारों और क्रांति की अपेक्षा करते थे, इस निमित्त वे सतत प्रयत्नशील और क्रियाशील रहे। एक तरफ भारत में अंग्रेजी सत्ता अपने को बचाए रखने या सुरक्षित अपने वतन वापस जाने की जद्दोजहद कर रही थी, वहीं दुनिया में भी लगातार नए-नए समीकरण बन रहे थे। छोटी-बड़ी घटनाएं देशों की परराष्ट्र नीतियों और संबंधों को प्रभावित कर रहा था। इस समय भी नवीन जी ने अपने पत्रकारीय धर्म का बखूबी निर्वाह किया। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय विषयों पर भी खूब लिखा। तिब्बत को लेकर इंगलैंड के रवैये और उसकी नीति का अत्यन्त रोचक व मार्मिक वर्णन किया है। इटली और रूस के बारे में उन्होंने लिखा - अभी तक फ्रांस, रूस को स्वीकार करने में आनाकानी कर रहा है। इसका कारण यह है कि जारकालीन रूस ने फ्रांस से कई अरब रूपया उधार लिया था। सोवियत सरकार जार के कुकर्मों का उत्तरदायित्व अपने उपर लेने को तैयार नहीं। श्री बालकृष्ण शर्मा नवीन ने अपने संपादकीय टिप्पणियों में जहां एक ओर निर्भिकता और बेबाकपन का परिचय दिया है, वहीं उनमें गहरी समझ और संतुलन भी देखने को मिलता है। इनके अग्रलेखों में साम्राज्यवादी शक्तियों के गठजोड़ और आर्थिक शोषण की निंदा भी है। प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की स्थितियों पर पैनी नज़र से मूल्यांकन भी दिखता है। हांलाकि वे कई बार पक्ष लेते हुए भी दिखते हैं। उनके आलेखों से रूसी क्रांति के प्रति उनकी निष्ठा व्यक्त होती है। ट्राटस्की की तुलना में स्टालिन का समर्थन करते हुए वे आध्यात्मिकता और मानवीयता का पक्ष लेते हुए दिखते हैं। उनके लेखन में महात्मा गांधी के स्वदेशी आंदोलन और डांगे पर चलाये गए बोल्शेविक मुकदमें पर तल्ख टिप्पणियां हैं, साम्राज्यवादियों और महात्मा गांधी के समझौते पर विचार हैं, मजदूर आंदोलनों और अछूत आंदोलनों पर महत्वपूर्ण सामग्री पाठकों को मिलती है। ‘प्रताप’ के संपादकीय विभाग में श्री गणेश शंकर विद्यार्थी के पश्चात् नवीन जी का ही स्थान था। श्री गणेश जी के निधन के बाद वे प्रताप के मुद्रक और संपादक दोनों बन गए। नवीन जी को जिन वरिष्ठों का सानिध्य मिला, उनका प्रभाव उनके व्यक्तित्व और पत्रकारिता पर भी पड़ा। सर्वाधिक प्रभाव श्री विद्यार्थी जी का ही था। यद्यपि विद्यार्थी जी की पत्रकारिता के आदर्श तथा सिद्धान्त और संपादकीय लेखन पद्धति को नवीन जी ने अपने में उतार लिया था, लेकिन भाषा के आधार पर दोनों में अंतर स्पष्ट था। श्री विद्यार्थी जी की भाषा ‘जनभाषा’ थी, लेकिन नवीन जी संस्कृतनिष्ठ हिन्दी का उपयोग करते थे। भाषा को लेकर वे गांधी जी से भी मतभेद रखते थे। हां, नवीन जी की पत्रकारिता पर उनके कवित्व और साहित्यकार का भी काफी प्रभाव रहा। श्री नवीन जी का लेखन किसानों की पीड़ा व्यक्त करता था, नवजवानों की आवाज बनता और उन्हें आवाज देता था। उनका लेखन, आम जनता को उठाने और अहंकारियों को नीचा दिखाने का प्रयत्न था। उन्होंने अपने जीवनकाल में अनेक बार पाखंडियों की पोल खोली और त्रस्त और पीड़ितों को अभयदान दिया। वे सिर्फ घटनाओं का विवरण नहीं देते थे, बल्कि घटनाओं और तथ्यों के सटीक और व्यापक विश्लेषण, उनकी विशेषता थी। इन विशेषताओं के कारण ही वे पाठकों को झंकृत कर पाते थे। श्री नवीन जी की देशसेवा, पत्रकारिता के लिए एक गौरवपूर्ण मिशाल है। पत्रकारिता, उनका लक्ष्य नहीं, बल्कि राष्ट्रसेवा का एक माध्यम था। इस माध्यम को उन्होनें आमजन के हितार्थ जीवनपर्यन्त उपयोग किया। आमजन को साहस और पहल के लिए प्रेरित किया। सज्जन शक्ति को संगठित होने की शक्ति दी। नवीन जी के लेखन ने देश में तत्कालीन बौद्धिक, रचनात्मक और आंदोलनात्मक गतिविधियों को बल प्रदान किया। हम अगर वर्तमान संदर्भों में नवीन जी के लेखन, उनके संपादकीय टिप्पणियों और अग्रलेखों को देखें तो परिस्थतियों का जायजा भी मिलेगा और समाधान के रास्ते भी दिखेंगे। समाज और पत्रकारिता, नवीन जी के जमाने से काफी आगे निकल चुकी है। लेकिन दोनों दिशाभ्रम की स्थिति में प्रतीत हो रहे हैं। श्री नवीन का लेखन आज भी प्रासंगिक है, तब की छोटी दिखने वाली समस्या आज बडे रूप में हमारे सामने खड़ी है। हमें आज की पत्रकारिता में भी बालकृष्ण की खोज करनी है, बालकृष्ण का नवीन रूप, अखबारों और पत्रिकाओं में भी दिखे यह वक्त का तकाजा है।

1 टिप्पणी:

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

श्री बालकृष्ण शर्मा नवीन के बारे में पढ़कर बहुत अच्छा लगा.