बुधवार, 10 दिसंबर 2008

एचआई.वी./एड्स को मुख्यधारा में लाने की जरूरत क्यों?-

डा. परशुराम तिवारी

एच.आई.वी./एड्स वर्तमान समय की सबसे चिंतनीय स्वास्थ्य एवं सामाजिक समस्याओं में से एक है। लगभग ढाई दशक पहले दुनिया को इस समस्या का पता चला था। निरंतर हस्तक्षेपों के बाद अब तक विश्व भर में लगभग 33.2 मिलियन अर्थात् 33 करोड़ 20 लाख से अधिक एच.आई.वी./एड्स संक्रमित एवं बीमार व्यक्तियों की पहचान हो चुकी है। महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि इनमें से लगभग 30 करोड़ व्यक्ति युवा आयु समूह (15 से 49 वर्ष) के हैं। इनमें से भी लगभग आधी आबादी महिलाओं की है। वर्तमान में अकेले भारत में ही लगभग 25 लाख एच.आई.वी. संक्रमित व्यक्ति जीवन जी रहे हैं। म.प्र. में अब तक लगभग 2780 एड्स रोगियों की पहचान हो चुकी है। इनका पंजीयन जिलों में स्थित एकीकृत जांच एवं परामर्ष केन्द्रों पर है। आशंका है कि इससे कहीं अधिक एड्स रोगी और एच.आई.वी. संक्रमित व्यक्ति प्रदेश में हो सकते हैं। इनका पंजीयन जिलों में स्थित एकीकृत जांच एवं परामर्ष केन्द्रों पर है। यहां यह भी गौरतलब है कि तमाम प्रयासों के बावजूद अब तक इस गंभीर बीमारी के उपचार की कोई दवा नहीं खोजी जा सकी हैे अरबो रूपये प्रति वर्ष खर्च करने के बावजूद आखिर क्यों एच.आई.वी./एड्स पर नियंत्रण नहीं पाया जा सका है? इस यक्ष प्रश्न का उत्तर पाने से पहले हमें इसके विभिन्न पहलुओं पर मंथन करना होगा। अव्वल तो ये कि जनमानस में (और पढ़े-लिखे वर्ग में भी) एच.आई.वी./एड्स को लेकर कुछ-कुछ उसी तरह की गलत धारणायें या भ्रांतियाॅ हैं जो प्रायः कुष्ठ अथवा तपेदिक (टी.बी.) जैसे रोगों के बारे में रही है। यही कारण है कि एच.आई.वी./एड्स के बचाव व उपचार का कार्य सफल नहीं हुआ। एच.आई.वी./एड्स का मुद्दा शर्म और भेदभाव से जुड़ा है जिसका परोक्ष असर मानव संसाधनों, उत्पादन व विकास पर पड़ता है। लोकलाज के भय से लोग भ्प्ट की जाॅच करवाने से भागते हैं, इसके बारे में बोलने से कतराते हैं। संक्रमित व्यक्ति देखभाल के लिए नहीं जाते और निवारक उपाय करने से कतराते हैं। काउंसलिंग और जांच करवाने का सुझाव देने के बाद भी लोग यह नहीं जानना चाहते कि वे भ्प्ट से संक्रमित हैं और उनका यह संक्रमण दूसरों में भी फैल सकता है। समन्वित प्रयासों के अभाव में ऐसे लोग दबे-छुपे हैं और उपलब्ध सेवाओं का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। फलस्वरूप वे असमय ही मौत के शिकार हो रहे हैं। यह हालात बदलना होंगे ताकि प्रदेश को देश के अधिक प्रभावित राज्यों - तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश अथवा महाराष्ट्र जैसे राज्यों में फैले संक्रमण की श्रेणी में जाने से रोका जा सके। जन स्वास्थ्य कार्यक्रमों और योजनाओं में इस मुद्दे पर पूर्व में गंभीरता से कार्य न होना, मानव विकास सूचकांकों की बहेतरी के लिये कार्य करने वाले विभागों, संस्थाओं अथवा उपक्रमों की इस कार्यक्रम में भागीदारी न होना, उद्योग जगत और सामाजिक एवं गैर सरकारी संस्थाओं, आध्यात्मिक एवं धार्मिक समूहों की व्यापक भागीदारी न होना भी एच.आई.वी./एड्स पर नियंत्रण न होने के प्रमुख कारण रहे हैं। विगत दो-ढाई दशक के अनुभवों से सबक लेते हुये दुनिया के देशो ने एच.आई.वी./एड्स के खिलाफ लड़ने, इसे नियंत्रित करने एवं सफलता हासिल करने के लिये और अधिक सघन एवं प्रभावी रणनीति बनाई है। इस दिशा में पहला कदम है- सहस्त्राब्दि विकास के 8 लक्ष्यों में एच.आई.वी./एड्स के खिलाफ लड़ाई को भी शामिल किया जाना। दुनिया के 150 स्वतंत्र और सम्प्रभु राष्ट्रों की तरह भारत ने भी इन विकास लक्ष्यों को हासिल करने का संकल्प व्यक्त किया है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन कार्यरत राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको) ने 2007 से 2012 तक चलने वाले तृतीय चरण के अंतर्गत अन्य गतिविधियों के साथ एच.आई.वी./एड्स को मुख्यधारा में लाने की कार्य योजना भी बनाई गई है। इसके तहत एच.आई.वी./एड्स के मुद्दे को शासकीय विभागों, उपक्रमों संस्थानों, उद्योग जगत, गैर सरकारी संस्थानों और समूहों में ले जाने एवं उनकी सहमति से उनके कार्यस्थल में लागू करना शामिल है। इस तरह के हस्तक्षेप से बढ़े पैमाने पर अलग-थलग पड़ी संगठित व असंगठित आबादी को समस्या की गंभीरता के प्रति जागरूक कर उनकी सोच और व्यवहार में परिवर्तन लाया जा सकेगा। साथ ही इन विभागों और संस्थाओं के कार्यस्थलों में एच.आई.वी./एड्स के प्रति सरोकार की नीति भी बन सकेगी।क्या होगा मुख्यधारा में? - चॅूकि एच.आई.वी./एड्स व्यवसाय का भी मुद्दा है, अतः विकास के क्षेत्र में काम करने वाले विभागों/संस्थानों के नीति निर्माण, प्रबंधन, उत्पादन अथवा क्रियान्वयन कार्य में संलग्न लोगों को उनके दैनिक काम काज के साथ ही थोड़ा सा वक्त निकालकर विषय पर जानकारी दी जायेगी। इस प्रक्रिया में संस्थान के उच्च, मध्यम व निचली पंक्ति के विशेषकर प्रचार-प्रसार, शिक्षण -प्रशिक्षण, मानव संसाधन विकास, जन संपर्क, मीडिया प्रबंधन से जुड़े लोगों को विषय पर प्रशिक्षण देकर संवेदनशील बनाया जायेगा। इनमें से कुछ लोग संस्थान में निरंतर नई जानकारी देने, रिफ्रेशर करने अथवा नये कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने का काम करेंगे। कार्य के सफल संचालन हेतु कार्यस्थल नीति बनेगी और एक अधिकारी की प्रभारी के रूप में क्रियान्यवन की जवाबदेही तय होगी। मुख्यधारा की इस प्रक्रिया से संस्थान के भीतर एच.आई.वी. संक्रमित व्यक्तियों की पहचान होगी, उन्हें परामर्श व सेवायें मिल सकेंगीं। साथ ही उनके मानव अधिकारों की रक्षा व परिवार की देखभाल की व्यवस्था भी सुनिश्चित हो सकेगी। मुख्यधारा की इस पहल से सकल राष्ट्रीय आय और उत्पादन के संभावित नुकसान को कम किया जा सकेगा। राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको) ने मुख्यधारा की दिशा में प्रयासों को गति देते हुये भारत सरकार के लगभग 30 मंत्रालयों एवं सार्वजनिक क्षेत्र की विभिन्न इकाइयों में एच.आई.वी./एड्स को उनके मूल कार्यो के साथ नियमित कार्यकलापों से जोड़ने हेतु सहमति प्राप्त कर ली है। राज्य एड्स नियंत्रण समितियों के माध्यम से राज्यों व जिला स्तर पर मैदानी गतिविधियाॅ प्रारंभ हो गई हैं। मध्यप्रदेश में ही मुख्यधारा का कार्य महिला एवं बाल विकास, उच्च शिक्षा, पुलिस विभाग एवं पंचायत राज संचालनालय के साथ तथा पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के अंतर्गत कुछ उद्योग समूहों से संवाद व प्रशिक्षणों का काम शुरू हो गया है। शासन के हर विभाग व निजी क्षेत्र के उद्योग या कंपनी के नीति निर्माण से जुड़े व्यक्ति को इस संवेदनशील विषय पर काम करने के लिये स्वेच्छा से विचार करना चाहिये, ताकि एच.आई.वी. संक्रमण के शिकार किन्तु दबे छुपे लोगों को सामने लाकर उनकी समय रहते देखभाल हो सके व उपलब्ध उपचार का लाभ दिलाया जा सके। यह इसलिये भी संभव है क्योंकि इसमें संस्थान को विशेष अतिरिक्त धन या समय नहीं खर्च करना पड़ेगा। बल्कि यह कार्य करने से वे उत्पादन हेतु ‘एक्सट्रा माइलेज’ ही प्राप्त करेंगे जो राष्ट्र निर्माण, स्वयं के लाभ कर्मकार कल्याण के लिये आवश्यक है। इसी तरह से एच.आई.वी./एड्स की रोकथाम में श्रमिक संगठनों, स्वयं सेवी एवं धार्मिक संस्थाओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका नाको ने महसूस की है। इन समूहों की अपने वर्ग, समुदाय या जन साधारण में व्यापक मान्यता होती है। अतः इनका विषय पर संवेदनशील होना बहुत जरूरी है। इस हेतु अन्य देशों में मिली सफलताओं के मद्देनजर एवं स्थानीय सांस्कृतिक-सामाजिक पृष्ठभूमि में सामाजिक समूहों को संक्रमण की रोकथाम, सेवाओं के प्रचार-प्रसार एवं एच.आई.वी./एड्स के प्रति शर्म और भेदभाव को समाप्त करने हेतु जोड़ा जा रहा है। इस कार्य में संयुक्त राष्ट्र संघ की विभिन्न इकाईयाॅ, दानदाता संस्थायें व नेटवर्क सपोर्ट संस्थाओं का भी सहयोग लिया जा रहा है। लेकिन राज्यों व स्थानीय स्तर पर राजनीतिक इच्छा शक्ति बढ़ाने की अभी भी आवश्यकता है। कुल मिलाकर भारत में एच.आई.वी./एड्स से लड़ने के लिये अब सरकारी, गैर सरकारी, निजी व उद्योग जगत के स्तर से भी जंग की शुरूआत हो गयी है। यदि सभी सम्बद्ध पक्षों ने ईमानदार प्रयास किये तो हम कुछ अफ्रीकी या एशियाई देशों की तरह अपनी बहुमूल्य श्रम एवं युवा शक्ति को खोने से बचा सकेंगे। ‘मुख्यधारा’ की कार्यनीति व भावना साझी जिम्मेदारी से है। आइये चुप्पी तोडें और जिम्मेदारी निभाने का वादा करें ।

कोई टिप्पणी नहीं: