शुक्रवार, 5 दिसंबर 2008

देश के सामने युद्ध या आपातकाल की स्थिति!

क्या हम तैयार हैं ?

अनिल सौमित्र

देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति सामान्य नहीं है । एक तरफ दुनिया भर में आई आर्थिक मंदी का असर भारत पर हो रहा है । देश के विभिन्न हिस्सों में सामाजिक वातावरण तनावपूर्ण हो चुका है । जातीय, सांप्रदायिक और आर्थिक विषमताएं तनाव के मुख्य कारण के तौर पर उभरे हैं । देश की वर्तमान राजनैतिक स्थिति भी नाजुक दौर में है । केन्द्र में बड़े दल कमजोर और संकुचित होते जा रहे हैं । कांग्रेस और भाजपा, दोनों की अन्य दलों पर निर्भरता लगातार बढ़ती जा रही है । आने वाले लोकसभा चुनाव में इस स्थिति में और भी अधिक बढ़ोतरी की संभावना है । अंदेशा है कि आसन्न लोकसभा में कांग्रेस और भाजपा दोनों मिलकर 250 सीटों तक सिमट जायेंगे । जाहिर है छोटे और क्षेत्रीय दलों का दखल केन्द्रीय राजनीति में बढ़ने वाला है । यह भी जगजाहिर है कि क्षेत्रीय दल, सरकार बनाने और सरकार चलाने की अपनी-अपनी कीमत वसूलते हैं । कहना न होगा कि बड़े दल कहीं-न-कहीं, छोटे दलों के भयादोहन के शिकार हैं । इन सब का परिणाम है कि ''राज्य'' लगातार कमजोर होता जा रहा है । समाज तो पहले ही कुव्यवस्थाओं का शिकार होकर कमजोर हो चुका है । समाज और राज्य का कमजोर होना एक खतरनाक संकेत है । समाज या राज्य में से कोई भी एक मजबूत हो तो राष्ट्र, अस्तित्व की चुनौतियों का सामना बखूबी कर सकता है । लेकिन आज हालात समाज और राज्य के तंत्र से फिसलते हुए दिख रहे हैं । भारत में लोकतंत्र और राजनीतिक व्यवस्था अभी भी वयस्क होने की प्रक्रिया में है । लेकिन इस दिशा में उच्च स्तर पर किसी स्वस्थ्य प्रयास का नितान्त अभाव है । राजनैतिक दल विचार, सिद्धांत और नीतियों से दूर होकर परिवारवाद, वैयक्तिक महत्वाकांक्षा और येनकेन सत्ता प्राप्ति की लालसा में लिप्त हैं । देश की सुरक्षा, शिक्षा, आर्थिक और सामरिक मामलों में सत्ता दल और विपक्ष उहापोह की स्थिति में है । आतंकवाद जैसी समस्या पर भी देश का राजनैतिक नेतृत्व आवश्यक समझ-बूझ और एकता प्रदर्शित नहीं कर सका । आतंकवाद, बंगलादेशी घुसपैठ, मतान्तरण, नक्सलवाद, रामसेतु, अमरनाथ श्राईन बोर्ड, महंगाई और लगातार हो रहे विस्फोट जैसे मुद्दों पर केन्द्र सरकार आंख-मिचैली खेल रही है । लोकसभा चुनाव निकट है । कांग्रेस के पास मुद्दों की कमी है, लेकिन विपक्ष आक्रामक तेवरों के साथ धावा बोलने को तैयार । पक्ष-विपक्ष दोनों ने तात्कालिक लाभ को ध्यान में रखते हुए दीर्घकालिक दृष्टि से अपना पल्ला झाड़ लिया । कोई प्रधानमंत्री बनना चाहता है तो कोई प्रधानमंत्री बने रहना । यूपीए सरकार की वास्तविक मुखिया सोनिया गांधी अपने सभी पत्ते खेल चुकी हैं । राहुल और प्रियंका का तिलिस्म भी अब काम नहीं आया । कांग्रेस के बड़े-बड़े दिग्गज धराशायी हो रहे हैं । मुम्बई पर हालिया आतंकवादी आक्रमण अब अपना असर दिखाने लगा है । देश में कांग्रेस के खिलाफ माहौल बन चुका है । आम जनता आतंकवाद के मामले पर पाकिस्तान से हिसाब चुकता करना चाहती है । केन्द्र सरकार पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दबाव है । अमेरिका और इजरायल जैसे आतंकवाद से आहत देशों ने भारत को कड़ी कार्यवाई करने की सलाह दी है । घरेलू ही नहीं, बल्कि वैश्विक जनमत भी आतंकवाद के खिलाफ एकमत है । कठोर और जबाबी कार्यवाई होनी चाहिए । लाख टके का सवाल यही है । क्या केन्द्र की यूपीए सरकार इतना दम रखती है ? वह भारत की आम मंशा और अंतरराष्ट्रीय सलाह को लागू करने का नैतिक, राजनैतिक और निर्णायक पहल का साहस व्यक्त कर सकती है? इसका जवाब खोजना शायद इतना आसान भी नहीं है । लेकिन परिस्थितियों के मद्देजर कुछ संभावनाओं पर विचार किया जा सकता है, कुछ अनुमान व्यक्त किए जा सकते हैं । बात घूम फिर कर आने वाले लोकसभा चुनाव के आस-पास जा टिकती है । यूपीए सरकार और सोनिया गांधी के रणनीतिकार आतंकवादियों के संभावित ठिकानों पर कार्यवाई के फलाफल और प्रभावों के बारे में गंभीरता से विचार कर रहे हैं । इसका राजनैतिक प्रभाव अगर सकारात्मक दिखा तो निश्चित तौर पर राजग के करगिल प्रयोग को दुहराने का साहस यूपीए भी कर सकती है, अन्यथा आतंकवाद को ठंढे बस्ते में डाल दिया जायेगा । वर्तमान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम.के. नारायणन ने ताजा आतंकी हमले के बाद इस्तीफे की पेशकश की है । बहुत संभावना है कि इस मामले में उनकी बलि नहीं ली जायेगी । श्री नारायणन के साथ दो महत्वपूर्ण सच्चाइयां जुड़ी है, एक तो वे बहुत ही सूझ-बूझ और दम-खम वाले नौकरशाह हैं, दूसरे यह कि गांधी परिवार के प्रति उनकी निष्ठा असंदिग्ध है । वे गांधी परिवार के अलावा किसी और के हाथों में देश का भविष्य नहीं देखते । उनकी निष्ठा गांधी प्ररिवार के प्रति प्राथमिक है, देश के प्रति दोयम । गांधी परिवार के लिए वे गुमनाम तौर पर काम करें यह तो जायज है, लेकिन आतंकवाद जैसे महत्वपूर्ण मसले पर उनकी चुप्पी खतरनाक है । वे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं, वे अपनी जिम्मवारियों से मुंह नहीं चुरा सकते । सिर्फ इस्तीफे की पेशकश कर वे अपनी असफलताओं से बच नहीं सकते । आखिर उनकी जानकारी में ''हिन्दू आतंकवाद'' का सिद्धांत गढ़ा और विकसित हुआ । खुफिया विभाग के कई अधिकारी दबी जुबान यह कहने लगे हैं कि यूपीए के आने के बाद से हमारी प्राथमिकताएं बदल गई हैं । आईबी, एटीएस और सुरक्षा से जुड़े तमाम एजेंसियों पर लापरवाही और राजनैतिक दुरूपयोग का आरोप लग रहा है । इसके छींटे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार पर भी पड़ेंगे । क्या यह सच नहीं है कि समूचा सुरक्षा महकमा मालेगांव के नाम पर आतंकवाद का ''हिन्दू सिद्धांत'' गढ़ने और विकसित करने में लगा रहा, और पाकिस्तान से आतंकवाद का लश्कर मुम्बई में आ बैठा । मालेगांव (दो) पर कार्यवाई का तौर-तरीका स्पष्टतः इसे उक राजनैतिक दृष्ठि से किया गया सुरक्षात्मक पहल का संकेत दे रहे थे । आम पाठक, श्रोता, दर्शक और सामान्य जन को भी यह लग रहा था-'' मालेगांव (दो) लोकसभा चुनाव का आॅपरेशन है । साध्वी, सेना और संघ को कटघरे में खड़ा कर इस्लामी आतंकवाद को फलने का मौका दिया गया । बिना विचार किए ही चहुं ओर यह घोषणा कर दी गई कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता । क्या यह सच किसी से छुपा है कि वर्तमान आतंकवाद 'इस्लाम, अल्लाह और मोहम्मद साहब' के नाम पर स्थापित किया गया है । क्या इस्लाम का दर्शन और उसका ग्रंथ आतंकवाद को तार्किक और सैद्धांतिक मान्यता नहीं देता? लेकिन झूठ-दर-झूठ, सत्य से मुंह चुराने की बार-बार और लगातार असफल कोशिश की जा रही है । मालेगांव प्रकरण में श्री नारायणन, आईबी प्रमुख श्री हलधर के साथ प्रधानमंत्री के दावेदार और पूर्व प्रधानमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी को अपनी सफाई देने गए थे । यहां उल्लेख करना आवश्यक है कि इस मुलाकात के बाद श्री आडवाणी और अधिक आक्रामक हो गए थे । इन्हीं परिस्थितियों में छुपी है एक और आशंका । इसकी पूरी संभावना है कि राजग को निस्तेज और स्तब्ध करने के लिए कांग्रेस सीमापार आतंकवादी ठिकानों पर हमला करे । इसका राजनैतिक लाभ उसे लोकसभा के चुनाव में मिलेगा । इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पूर्व में इस तरह का लाभ ले चुकी है । कांग्रेस का नेतृत्व कमजोर भले हो, लेकिन मौका उसके हाथ लगा है । लेकिन इन्हीं आशंकाओं और परिस्थितियों के बीच एक सवाल भी मुंह बाए खड़ा है, जवाब की तलाश में । क्या देश की आंतरिक स्थिति ऐसी है कि वह सीमापार हमलों की इजाजत दे ? सीमा को तो देश के सैनिक संभाल लेंगे, लेकिन देश को कौन संभालेगा? आइएसआई, सिमी, इंडियन मुजाहिदीन और इसके जैसे कई संगठन क्या चुप बैठेंगे? देश में फैली हजारों की संख्या में विदेशी संस्थाएं क्या भारत को मदद करेंगी? देश की आंतरिक असुरक्षा क्या सीमा पार आतंकी ठिकानों को तबाह करने की इजाजत देगी? युद्ध जैसे हालात सिर्फ सीमा पर ही नहीं, सीमा के भीतर भी हैं । कांग्रेस, देश में युद्ध जैसे हालात का वास्ता देकर, देश में गृहयुद्ध का अंदेशा जता कर देश को एक और इमरजेंसी (आपातकाल) दे सकती है । देश की सज्जन शक्ति असंगठित है, कमजोर है । विषम परिस्थितियों में वह देश के लिए बहुत अधिक प्रभावी होगी इसकी संभावना कम ही है । मोमबत्ती जलाकर आतंकवाद की खिलाफत करना कर्मकांड से अधिक कुछ भी नहीं । कर्मकांडों का अपना महत्व और प्रभाव होता है, लेकिन आज जरूरत इससे बढ़कर है । संघ, साध्वी और सेना फिर एक बार अपेक्षाओं के कटघरे में हैं । परिस्थितियों की मांग है कि मान, अपमान, आरोप और लांछन को भूला कर संघ और संत, समाज का नेतृत्व करे, सीमा पर डटी सेना का साथ दे । संघ, संत और सेना, सरकारों के निशाने पर भले ही रही हों, लेकिन समाज का विश्वास उन्हें हमेशा मिला है । संघ ने सरकार का साथ पहले भी दिया है, वह आज भी तैयार हो । देश के सामने युद्ध और आपातकाल की स्थिति है । लेकिन हम इन दोनों स्थितियों के लिए तैयार नहीं हैं । युद्ध और आपातकाल में क्या और कैसी आंतरिक स्थिति निर्मित होगी, हमें इसका ध्यान में रखकर तैयार होना होगा । सरकार ने आंतरिक सुरक्षा में भी सेना को लगा रखा है, समाज अपनी सुरक्षा के लिए तैयार हो और सेना को सिर्फ सीमा की सुरक्षा के लिए मुक्त करे । संघ और संत, समाज की सुरक्षा की जिम्मेदारी लें, सेना तो मोर्चा संभाल ही लेगी ।

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