सोमवार, 17 नवंबर 2008

धर्म से निरपेक्ष कौन ? .................
पवन कुमार अरविन्द
धर्म की अवधारणा के विविध पक्षों में एक अत्यन्त महत्वपूर्ण और सदा चर्चा में रहने वाला शब्द "सेक्युलर" है। इस शब्द के हिन्दी अनुवाद के रुप में देष के कुछ बुद्धिजीवी व राष्टीªयनेताओं ने "धर्मनिरपेक्ष" शब्द कहना शुरु कर दिया है, जो एकदम अनुचित है। भारतीय संस्कृति की विषिष्टता "सर्वधर्म समभाव" की है। अतः धर्म विरोधी कोई भी विचार भारत में स्वीकार्य नहीं है। सेकुलर ;ैमबनसंतद्ध शब्द का भारत और भारतीयता के सम्बन्ध में सही स्थान क्या हो सकता है, यह गम्भीर विचार का विषय है। इसी सन्दर्भ में इस लेख में यह प्रयास किया गया है कि क्या धर्म से निरपेक्ष कोई हो सकता है ? यदि इस देष के सभ्य समाज व विद्वत जन से यह प्रष्न किया जाय कि धर्म से निरपेक्ष कौन है? तो इसका एक ही उत्तर आयेगा,....कोई नहीं! संविधान के नये हिन्दी संस्करण में सेक्युलर का अनुवाद पंथनिरपेक्ष करके इस भूल के परिमार्जन का प्रयास हुआ है। फिर भी, आज की राजनीति में "धर्मनिरपेक्ष" शब्द का बोलबाला है। इस दौर की भारतीय राजनीति में दो शब्द "सेक्युलर" और "कम्युनल" (साम्प्रदायिक) अधिक सुनने को मिलते हैं। लगभग प्रत्येक राजनीतिक दल स्वयं को सेक्युलर और शेष अन्य दलों को कम्युनल होने का आरोप लगा देते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि प्रारम्भ में ही सेक्युलर का अनुवाद पंथनिरपेक्ष या सम्प्रदाय निरपेक्ष कर दिया जाता तो अनेक आषंकाए जन्म नहीं लेती। सेक्युलर शब्द के अर्थ के बारे में भले ही भिन्न-भिन्न मत रहे हों किन्तु उस मतभिन्नता में इस बात पर एकता थी कि राज्य का स्वरुप असाम्प्रदायिक होना चाहिए। इस प्रष्न पर आज भी एकमत हैं। इसलिए सेक्युलर शब्द के उद्भव पर चर्चा करना समीचीन होगा। राजनीतिक फलक पर सेक्युलराइजेषन ;ैमबनसंतपेंजपवदद्ध शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम 1648 ई० में तब हुआ जब यूरोप के गिरिजाघरों की सम्पत्ति पर वहंा के राजकुमारों का पूर्ण वर्चस्व स्थापित हो गया था। ऐसा निरन्तर 30 वर्षों के यु़द्ध के पष्चात सम्भव हो सका था। इस घटना के बाद पूरे यूरोप में गिरिजाघरों की सम्पत्ति को लेकर एक बहस छिड़ गयी थी। फ्रंासीसी क्रान्ति के पष्चात 2 नवम्बर, 1789 ई० को वहां की नेषनल एसेम्बली में टैरीलैण्ड महोदय के द्वारा की गयी एक घोषणा के अनुसार गिरिजाघरों की सम्पूर्ण सम्पत्ति का राष्ट्रीयकरण कर लिया गया। 50 वर्ष पष्चात् इंग्लैण्ड के रेषनलिस्ट मूवमेण्ट (तर्कवादी/बुद्धिवादी आन्दोलन) के नेता जार्ज जैकब हाॅलियोक (1817-1906), जिन्हें निरीष्वरवादी विचारक भी कहा जाता है, ने तत्कालीन परिस्थितियों में अपनी विचारधारा को व्यक्त करने के लिए एक नये शब्द ैमबनसंतपेउ का प्रचलन किया था। यदि हम वर्तमान भारतीय राजनीतिक परिदृष्य पर विचार करें तो एक ऐसे शब्द ैमबनसंत की चर्चा बार-बार होती है जिसका प्रयोग भारतीय संविधान के मूल रुप में अनुच्छेद 25, खण्ड 2 के उपखण्ड (क) में केवल एक बार किया गया है, जिसके अन्तर्गत धर्म की स्वतन्त्रता के अधिकार पर उपबन्ध किया गया है। आपातकाल के दिनों में तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने "42 वाँ संविधान संषोधन अधिनियम 1976" के द्वारा संविधान की प्रस्तावना में दो शब्द "सोषलिस्ट" और "सेक्युलर" जोड़ दिया था, लेकिन इनमें से एक महत्वपूर्ण षब्द सेक्युलर को कहीं भी स्पष्ट परिभाषित नहीं किया गया। आज भी यह शब्द अपरिभाषित है। सेक्युलर को धर्मनिरपेक्ष कहना कितना सही है? यदि हम चिन्तन करें तो इसका अर्थ स्वतः स्पष्ट हो जायेगा। 'धर्मसापेक्ष' शब्द का विलोम 'धर्मनिरपेक्ष' है। ये दोनों शब्द दो-दो शब्दों से मिलकर बने हैं। पहला धर्म$सापेक्ष व दूसरा धर्म$निरपेक्ष। पहले शब्द 'धर्म' का अर्थः इस शब्द के मूल में "धृ" धातु है, जिसका सम्बन्ध धारण करने से है। वेदों में कहा गया है कि, 'धारयते इति धर्मः' अर्थात जो धारण करने योग्य है, वही धर्म है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि जो जिसका वास्तकविक रुप है, उसे बनाए रखने और उस पर बल देने में जो सहायक हो वही उसका धर्म है। धर्म, वस्तु और व्यक्ति में सदा रहने वाली सहज वृत्ति, उसका स्वभाव, उसकी प्रकृति अथवा गुण को सूचित करता है। धर्म, कर्तव्य के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है। जैसे- व्यक्तियों और समाज के सम्बन्धों को नियमित करने वाली जो चीजें हैं, उनको धर्म कहा जाता है। जहां तक कर्तव्य की बात है तो मातृधर्म, पितृधर्म, पुत्रधर्म, छात्रधर्म, प्रजा धर्म, पड़ोस धर्म आदि। ये सब हमारे कर्तव्य को बताते हैं। जैसे- माता का कर्तव्य क्या है, पिता का कर्तव्य क्या है, पुत्र का कर्तव्य क्या है, छात्र का कर्तव्य क्या है, राजा का कर्तव्य क्या है, प्रजा का कर्तव्य क्या है, एक पड़ोसी का दूसरे पड़ोसी के प्रति कर्तव्य क्या है, आदि-आदि ? अर्थात सबके कर्तव्य का निरूपण जिससे होता है, वह धर्म है। दूसरे शब्द "सापेक्ष" का अर्थ है- दूसरे पर निर्भर रहने वाला और इसका विलोम है "निरपेक्ष" यानि दूसरे पर निर्भर न रहने वाला या अलग, विलग, पक्षविहीन होकर रहना। अतः हम कह सकते हैं कि धर्म पर निर्भर रहने वाला या धर्म के अनुसार चलने वाला धर्मसापेक्ष है और धर्म पर निर्भर न रहने वाला या इससे पृथक या विलग रहने वाला "धर्मनिरपेक्ष" है। उदाहरण के लिए, सड़क पर बाएं चलने का नियम है। यदि हम दायें चलने लगें तो एक दूसरे को क्रास करना दुर्घटना को निमन्त्रण देना ही है, क्योंकि दाएं चलना स्वाभाविक नहीें है। दूसरा उदाहरण, यदि रास्ते में कोई पीड़ित या घायल व्यक्ति हमसे मिल जाये, जिसको हमारी सहायता की आवष्यकता है। हमारा धर्म भी है और मानवता भी कि हम उसकी यथोचित सहायता करें। इस प्रकार कर्तव्य के रुप में "धर्म" हमारे सामने उपस्थित है। यदि हम उसकी सहायता न करके कर्तव्य से विमुख हो जायें अर्थात धर्म से विमुख या धर्मनिरपेक्ष हो जायें, तो उस समय हमारी मानवता मर जायेगी। यानि धर्म से निरपेक्ष होना न तो मानव के हित में है और न ही मानवता के हित में। अब प्रष्न उठता है कि इस सृष्टि में धर्म से निरपेक्ष होकर कौन चल सकता है ? भारत और भारत के लोग तो कदापि नहीं। क्योंकि श्रीमöगवद्गीता के चैथे अध्याय के आठवें श्लोक में लीला पुरूषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण, अपने अवतार का हेतु बताते हुए कहते हैं कि, "जब-जब देष में अधर्म का बोलबाला और धर्म अथवा सुव्यवस्था का नाष होने लगता है, तब-तब मैं अवतार लेता हूं और साधु सज्जनों की रक्षा तथा दुष्टों का विनाष कर, धर्म की स्थापना करता हंू।" कुछ इसी प्रकार का वाक्य तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के बालकाण्ड में वर्णन किया है- जब-जब होई धरम के हानी, बाढ़हिं असुर, अधम अभिमानी।। करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी, सीदहिं विप्र धेनु सुर धरनी।। तब-तब प्रभु धरि विविध सरीरा, हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।।उपर्यक्त आधार पर मैं कह सकता हूं कि जिस धर्म की स्थापना के लिए स्वयं साक्षात् नारायण और सभी सत्पुरुष समाज सतत् प्रयत्नषील रहते हैं, उससे निरपेक्ष होकर कौन चल सकता है। भारत के मा० सर्वोच्च न्यायालय की त्रि-सदस्यीय पीठ ने भी डेण् ।तनदं त्वल - व्जीमते टे न्दपवद व िप्दकपं - व्जीमते के केस के सन्दर्भ में 12 सितम्बर, 2002 के अपने फैसले में ैमबनसंतपेउ को विधिवत परिभाषित किया है- ।बबवतकपदह जव श्रनेजपबम क्ींतउंकीपांतपए श्ज्ीम तमंस उमंदपदह व िैमबनसंतपेउ पद जीम संदहनंहम व िळंदकीप पे ष्ैंतअं।क्ींतउं.ैंउइींअष् उमंदपदह मुनंस जतमंजउमदज - तमेचमबज वित ंसस तमसपहपवदेए इनज ूम ींअम उपेनदकमतेजववक जीम उमंदपदह व िेमबनसंतपेउ ंे ष् ैंतअं.क्ींतउं.ैंउ.।इींअ ष् उमंदपदह दमहंजपवद व िंसस तमसपहपवदेण्श् प्रथम राष्ट्रपति डा० राजेन्द्र प्रसाद के अनुसार, "सेकुलर का वास्तविक अर्थ यह है कि इस देष में सभी लोग अपनी इच्छा की आस्था का पालन अथवा प्रचार करने के लिए स्वतन्त्र हैं, तथा हम सभी धर्मों की सफलता की कामना करते हैं और उन्हें बिना बाधा के अपने ढंग से ही विकसित होने देना चाहते हैं। " अतः ैमबनसंत शब्द का हिन्दी अनुवाद धर्मनिरपेक्ष करना गलत है। सही अनुवाद होगा पंथनिरपेक्ष, मजहबनिरपेक्ष, सम्प्रदाय निरपेक्ष या सर्वधर्म समभाव, और यह अवधारणा भी राज्य के सन्दर्भ में है। भारतीय संस्कृति के सन्दर्भ में अपने पंथ की निरपेक्षता भी अनुचित है। भारतीय दर्षन, पंथ से निरपेक्ष होने की बात सोच भी नहीं सकता। भारतीयता का भाव "सर्वधर्म समादर भाव" है। किन्तु "धर्मनिरपेक्ष" तो अधार्मिक और पतित ही कहा जायेगा। कोई राज्य धर्म से निरपेक्ष हो कर नहीं चल सकता क्योंकि नागरिकों के प्रति राज्य के कुछ कर्तव्य होते हैं। धर्मसापेक्ष राज्य ही पंथनिरपेक्ष हो सकता है। धर्मनिरपेक्ष राज्य अर्थात कर्तव्यपरायणता से विमुख राज्य, पंथनिरपेक्षता का पालन कभी नहीं कर सकता। अतः हम कह सकते हैं कि सेकुलरवाद की भारतीय परिकल्पना अधिक सकारात्मक है, साथ ही यूरोपीय धर्मेत्तर सेकुलरवाद के सिद्धान्त से भिन्न भी है। ब्यूरो चीफदिव्य भारत साप्ताहिक144 बी /12, गुरुनानकपुरालक्ष्मीनगर , नई दिल्ली-92मोबाइल- 09873875050

3 टिप्‍पणियां:

डुबेजी ने कहा…

really good article everybody must read it

बेनामी ने कहा…

bhaarat me dharma nirpexta ka matalab "alpasankhyakwaad" hai. Yaha bahusankhyako ko pirda pahuchaana hi dharma nirpexta ki paribhasha hai.

मा पलायनम ! ने कहा…

बहुत अच्छा लिखा है आपने.महाभारत में धर्मं की परिभाषा देते हुए खा गया है कि धारणात् धर्म्म्युत्याहो धर्मो धार्यते प्रजा .ऐसे ही लिखते रहिये .बधाई .