बुधवार, 15 अक्तूबर 2008

बांग्लादेशी घुसपैठिए - भारतीय अर्थव्यवस्था पर बोझ


राष्ट्र की अपनी ही समस्याएँ कम नहीं हैं। सुरसा के मुँह की तरह आम आदमी को डंसती महंगाई, देश की कानून-व्यवस्था को धता बताते हुए स्थान-स्थान पर आतंकी विस्फोट, क्षेत्रवाद की राजनीति के चलते पूर्वोत्तर प्रान्तों व महाराष्ट्र में देश के नागरिकों के साथ किया जा रहा दुर्व्यवहार, कृषि क्षेत्रों में कम उपज व अकाल के कारण आत्महत्या हेतु विवश किसान सहित अनेक ऐसी समस्याएँ हैं, जिनसे राष्ट्र जूझ रहा है। इन समस्याओं के चलते राष्ट्र की समृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, ऐसे में विदेशी घुसपैठियों की देश में उपस्थिति देश की अर्थव्यवस्था एवं कानून-व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डालने में पीछे नहीं है।

कहना गलत न होगा कि संकीर्ण स्वार्थों के चलते राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता की अवधारणा को तिल-तिल खंडित करने का कुचक्र जारी है, यदि ऐसा न होता तो बांग्लादेशी घुसपैठियों को सरलता से देश में आश्रय नहीं मिल पाता। आज स्थिति यह है कि देश के कुछ शहरों में बांग्लादेशी घुसपैठियों की अलग बस्तियाँ हैं।

कुछेक घुसपैठियों को नागरिकता प्रदान करके खुलकर खेलने का अवसर प्रदान कर दिया गया है। धरपकड़ जैसी कोई स्थिति नहीं है, जिसके परिणामस्वरूप देश के विभिन्न भागों में बांग्लादेशी घुसपैठिए भारतीय अर्थव्यवस्था पर बोझ बनते जा रहे हैं। उन्हें देश से निकालने के लिए कारगर प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। यही स्थिति अन्य घुसपैठियों की भी है। देश की मिली-जुली संस्कृति का लाभ उठाकर घुसपैठिए भारतीय जनमानस में इतने अधिक घुल-मिल गए हैं कि उनकी पहचान करना भी टेढ़ी खीर हो गया है।

देश निर्धारित सीमाओं में बसे नागरिकों को सुख-सुविधाएँ देने हेतु बाध्य हैं। नीतियाँ भी राष्ट्र के नागरिकों के सर्वांगीण विकास को दृष्टिगत करते हुए बनाई जाती हैं किन्तु निर्धारित एवं वास्तविक नागरिकों से इतर विदेशी घुसपैठिए यदि भारतीय जनमानस में घुसपैठ करेंगे तो अतिरिक्त जनसंख्या का दबाव क्या भारतीय अर्थव्यवस्था को पंगु नहीं करेगा? भारतीय कानून-व्यवस्था को चुनौती देते घुसपैठियों की स्थिति से यह प्रशन स्वयं स्फुटित है। निसंदेह यदि बांग्लादेशी घुसपैठियों सहित अन्य विदेशी घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें देश से नहीं खदेड़ा गया तो राष्ट्र को अपनी अस्मिता की पहचान बनाने के लिए जूझना पड़ सकता है, क्योंकि जो इस देश के नागरिक नहीं हैं, उन्हें राष्ट्रीय अस्मिता एवं गौरव से भला क्यों कर कोई सरोकार होगा?

1 टिप्पणी:

प्रदीप मानोरिया ने कहा…

आपने बिल्कुल सत्य कहा है अनिल जी मैं आपसे सहमत हूँ . मेरे ब्लॉग पर दस्तक देते रहिये