गुरुवार, 16 अक्तूबर 2008

मध्यप्रदेश में
विधानसभा चुनाव की रणभेरी बज गई
भोपाल। चुनाव आयोग ने बहुप्रतीक्षित विधानसभा चुनाव की अधिसूचना जारी कर दी है। आयोग के दिशा-निदेर्शों के मुताबिक मध्यप्रदेश सहित पांच राज्यों में नवम्बर माह की अलग-अलग तारीखों में चुनाव कराए जायेंगे। मध्यप्रदेश में मतदान की तारीख 25 नवम्बर है। अन्य चार राज्यों - छत्तीसगढ़ में दो चरणों में - 14 और 20 नवम्बर को, दिल्ली और मिजोरम में 29 नवम्बर और राजस्थान में 4 दिसंबर को मतदान होगा। आयोग ने सभी राज्यों की मतगणना 8 दिसंबर को कराने का निर्णय लिया है। इसी दिन इन राज्यों में नई सरकार के गठन का रास्ता साफ हो जायेगा।
मध्यप्रदेश में 12 विधानसभाओं का गठन हो चुका है। दिसंबर में 13 वीं विधानसभा का गठन होगा। मध्यप्रदेश के गठन के बाद से भाजपा को तीन बार सरकार बनाने का मौका मिला। लेकिन भाजपा की दो सरकारें, कांग्रेस की बदनीयत का शिकार हो गईं । पहली बार भाजपा को पांच साल सरकार चलाने का अवसर मिला है। लेकिन भाजपा ने पूर्व की ही भांति इस बार भी तीन मुख्यमंत्री दिए। उल्लेखनीय है कि इसके पूर्व भी जब संविद सरकार बनी थी तो कैलाश जोशी, वीरेन्द्र सखलेचा और सुंदरलाल पटवा मुख्यमंत्री बने थे। बाद में जब 1990 में भाजपा की सरकार बनी तो पुनः सुन्दरलाल पटवा ही मुख्यमंत्री बने लेकिन केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने दो साल में ही पटवा सरकार को बर्खास्त कर दिया। वर्ष 2003 में जब भाजपा को पुनः दो तिहाई बहुमत मिला तो उमा भारती मुख्यमंत्री बनीं, उसके बाद बाबूलाल गौर और फिर शिवराज सिंह चैहान। कुल मिलाकर मध्यप्रदेश के 42 वर्षीय लोकतांत्रिक सफर में 32 वर्ष तक कांग्रेस का राज रहा है, भाजपा सिर्फ 10 वर्षों तक ही सत्ता में रह पायी। मुख्यमंत्री बदलने में भी कांग्रेस भाजपा से आगे ही रही है। 32 वर्षों के शासन में कांग्रेस ने 21 मुख्यमंत्री दिए।
भाजपा, वर्तमान चुनाव मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान के नेतृत्व में ही लड़ रही है। मुख्यमंत्री की लोकप्रियता, आम जनता के नेता की छवि और सरकार की उपलब्धियों के बूते भाजपा फिर से सरकार बनाने को तैयार है। भाजपा की चुनावी तैयारी भी काफी पहले ही शुरू हो गई थी। अब जबकि चुनावी रणभेरी बज चुकी है सभी पार्टियों ने अपनी-अपनी चालें चलनी शुरू कर दी हैं। उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया अंतिम चरण में है, प्रचार की सामग्री तैयार हो चुकी है और चुनावी वायदों और घोषणाओं को आकर्षक और लोकलुभावन बनाने की तैयारी भी लगभग पूरी हो चुकी है।
मध्यप्रदेश का राजनैतिक परिद्श्य पूर्व की अपेक्षा अधिक रोचक प्रतीत हो रहा है। इस विधानसभा चुनाव में पहली बार भाजपा और कांग्रेस के अलावा अन्य पार्टियां पूरी ताकत के साथ मैदान में हैं। उनकी कोशिश है कि मध्यप्रदेश की 13 वीं विधानसभा को त्रिशुंकू बना दिया जाए। बसपा, सपा और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के अलावा पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती की भारतीय जनशक्ति पार्टी भी पूरी दमखम के साथ चुनाव मैदान में है। उमा भारती की पूरी कोशिश है कि भाजपा का अधिक से अधिक नुकसान कर अपने लिए कुछेक सीटें निकाल ली जाएं। उनकी मंशा है कि चुनाव के बाद ऐसी स्थिति बन जाये कि सरकार बनाने के कांग्रेस और भाजपा दोनों अन्य दलों का समर्थन लेने को मजबूर हो जाएं।
मध्यप्रदेश में राजनैतिक स्थिति ऐसी है कि अभी कोई भी अनुमान लगाना जल्दीबाजी होगी। सभी पार्टियों, खासकर भाजपा और कांग्रेस के द्वारा उम्मीदवारों की घोषणा के बाद ही कोई अनुमान सार्थक होगा। हाल की स्थितियों को देखकर यही लगता है कि सभी पार्टियों के नेताओं में टिकटों को लेकर ऐसी भागमभाग मची है कि हरेक नेता स्वयं को सर्वोत्तम उम्मीदवार बताने में लगा है। एक पार्टी छोड़कर दूसरे का दामन थामने का सिलसिला शुरू हो गया है। राजनैतिक लहरें हिचकोलें ले रही हैं, इसके थमने के बाद ही चुनावी आकलन किया जा सकेगा। फिलहाल हवा का रूख भाजपा के पक्ष में है। चुनावी तैयारी के लिहाज से भाजपा अन्य दलों से आगे है। भाजपा ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान के हांथों में चुनाव प्रचार की पतवार थमा दी है। पार्टी के नेता अपने सरकार की उपलब्धियों को लेकर जनता के बीच जा रहे हैं। कार्यकर्ता कुंभ और जन आशीर्वाद रैली में शिवराज सिंह चैहान ने अपनी उपलब्धियों का बखान किया। पार्टी के कार्यकर्ता इसे ही आगे बढ़ा रहे हैं। भाजपा, केन्द्र की यूपीए सरकार की नाकामियों, मंहगाई और आतंकवाद को भी मुद्दा बनायेगी।
कांग्रेस की तैयारियों को भी कमतर नहीं आंका जा सकता। कांग्रेेस भी आक्रामक प्रचार के मूड में है। कांग्रेस, भाजपा सरकार की नाकामियां और मंत्रियों के भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाने की वह पुरजोर कोशिश कर रही है। यूपीए सरकार की उपलब्धियां इस चुनाव में प्रचार का मुद्दा होंगी। सपा, बसपा और अन्य पार्टियां भी कामोबेश भाजपा सरकार की असफलता और सरकार के भ्रष्टाचार को मुख्य मुद्दा बनायेंगी। पूर्व भाजपा नेत्री उमा भारती ने सरकार के खिलाफ 51 आरोपों को कच्चा चिट्ठा जरूर जारी किया है। उमा भारती, सरकारी योजनाओं की विफलता और मुख्यमंत्री की घोषणाओं के आधार पर भाजपा को घेरने की तैयारी कर रही हैं। उल्लेखनीय है कि उमा भारती भाजपा के ही मुद्दों, मतों और नेताओं के बीच सेंध लगाने की कोशिश में हैं। भाजपा को कमजोर करना उनका प्राथमिक लक्ष्य है। बिजली, पानी और सड़क इस बार भी चुनावी मुद्दा है।
हालांकि अन्य पार्टियां, मध्यप्रदेश में दो दलीय राजनैतिक परंपरा को चुनौती देने का प्रयास कर रही हैं, लेकिन इन पार्टियों के नेताओं और कार्यकर्ताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के कारण तीसरी शक्ति के अस्तित्व को ही खतरा पैदा हो गया है। भाजश और गोगपा में विभान हो गया है। सपा में नेताओं का विवाद चल ही रहा है। प्रदेश के छोटे दल संसाधनों की कमी से भी जूझ रहे हैं। लेकिन एक तरफ कांग्रेस को बसपा से नुकसान होने का अंदेशा है, वहीं भाजपा को भाजश से। भाजपा ने समझदारी से टिकटों का बंटवारा किया और असंतोष और विद्रोह पर काबू रखा तो चुनाव में अच्छा परिणाम दे सकती है। कांग्रेस, नेतृृत्व के संकट से जूझ रही रही है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सुरेश पचैरी को अभी भी पूरे प्रदेश का नेता नहीं माना जा रहा है। कांग्रेस के सूबेदारों ने अपने-अपने सूबे बांट लिए हैं। इस रणनीति में कांग्रेस आलाकमना सोनिया गांधी की भी सहमति है। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, वर्तमान केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया सहित सुरेश पचैरी, अजय सिंह, जमुना देवी और सुभाष यादव ने अपने-अपने सूबों में तैयारी शुरू कर दी है।
तमाम सर्वे, राजनैतिक विश्लेषकों की राय और राजनैतिक कयासों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि भाजपा ने 2003 के विधानसभा चुनाव में 173 सीटों पर कब्जा जमाया था, लेकिन इस बार वह इससे पीछे आयेगी। कांग्रेस अपने सबसे खराब प्रदर्शन 38 सीटों से उबरेगी। बसपा, सपा और गोगपा अपनी पुरानी स्थिति को बचाए रखने में सफल होगी। भाजपा से अलग होकर भारतीय जनशक्ति पार्टी का गठन करने वाली उमा भारती भी अपनी राजनैतिक जमीन बनाने में सफल होंगी।






2 टिप्‍पणियां:

Raviratlami ने कहा…

देखते हैं ऊंट किस करवट बैठेगा. हंग असेम्बली?
मुझे तो यही प्रतीत होता है

प्रदीप मानोरिया ने कहा…

यथार्थ परक आकलन सुंदर प्रवाह बधाई सुंदर आलेख के लिए