बुधवार, 29 अक्तूबर 2008

आतंकवाद को सेक्यूलरी जामा पहनाने की कवायद

अनिल सौमित्र

पिछले दिनों आतंकवाद को लेकर एक संप्रदाय विशेष पर उंगलियां उठनी शुरू हो गई थीं। सिमी जैसे संगठनों ने संगठित आतंक के कारण न सिर्फ पुलिस व्यवस्था, बल्कि मुस्लिम समुदाय के नाक में दम कर रखा था। घुसपैठ, आतंकवाद, नक्सलवाद और सांप्रदायिकता से जुड़े कई पहलुओं पर यूपीए सरकार और खास तौर पर कांग्रेस आरोपों के घेरे में थी। भाजपा ने राजनीतिक तौर पर और अन्य संगठनों ने सामाजिक तौर पर कांग्रेस और यूपीए सरकार की घेरेबंदी शुरू कर दी थी। रामसेतु, अमरनाथ भूमि विवाद और अफ़ज़ल को फांसी देने का का मुद्दा केंद्र की कांग्रेसनीत सरकार के लिए गले की हड्डी बन गया। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों और अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस को मुद्दों के साथ-साथ मुस्लिम वोटों को अपने पाले में लाने के लिए मौकों की तलाश है। उसके सामने दूसरी चुनौती थी भाजपा और दूसरे भगवा संगठनों के आरोपों का सामना करने और उसकी धार को कुंद करने की।
मालेगांव विस्फोट में साध्वी प्रज्ञा के आरोपी बनने से कांग्रेस और उसके सहयोगी दल इसमें अपनी सारी मुश्किलों का हल ढूंढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। न्यूज़ चैनलों पर कुछ टीवी एंकर और कांग्रेस प्रवक्ताओं की बाजीगरी गौर से देखिए, बस थोड़ा सोचिए सब समझ में आ जाएगा। मालेगांव विस्फोट और आतंकवाद पर चर्चा और छानबीन के बजाए पूरा जोर इस पर है कि संघ परिवार और भाजपा को कैसे लपेटे में लिया जाए। कैसे सिद्ध किया जाए कि अब भाजपा भी आतंकवादी संगठन हो गया है। महाराष्ट्र के आतंकवाद निरोधक दस्ते और मध्य प्रदेश व गुजरात पुलिस पर जांच को प्रभावित करने का दबाव बनाया जा रहा है। न्यूज चैनलों की पूर्वाग्रह से ग्रस्त रिपोर्टिंग और विश्लेषण किसी सुनियोजित षड्यंत्र का संकेत देते हैं।
इस मामले को रातोंरात इतना बड़ा बना दिया गया कि उसके कारण आतंकवाद, सीरियल ब्लास्ट, सिमी, मतांतरण, कंधमाल में स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या, केरल में संघ के स्वयंसेवकों की हत्या, असम में घुसपैठ विरोधी जनांदोलन, अफ़ज़ल की फांसी और न जाने कितने मुद्दे गौण हो गए। सितंबर, 2006 में मालेगांव में ही हुए उस विस्फोट कैसे भुला दिया गया जिसमें 38 लोग मारे गए थे और अनेक लोग घायल हुए थे। कहना न होगा कि साध्वी प्रज्ञा, अभिनव भारत संगठन और श्रीराम सेना को आरोपी बनाना और संघ परिवार, भाजपा व समूचे हिंदू समाज को कठघरे में खड़ा करना किसी बड़ी सुनियोजित साज़िश का हिस्सा है। फिलहाल तो ऐसा ही लग रहा है कि साज़िश रचने वाले और इसे अमल करने वाले अपने इरादे में सफल हो गए हैं और आतंकवाद के मुद्दे पर आक्रामक संघ परिवार व भाजपा को बैकफुट पर धकेल दिया है।
समूचा संघ परिवार, साधु-संतों के संगठनों और अपने को हिंदुओं का पैरोकार बताने वाले राजनैतिक दलों भाजपा और शिवसेना का साध्वी प्रज्ञा की गिरफ्तारी मामले में एक अजीब-सी चुप्पी समूचे हिंदू समाज के लिए खतरनाक है। इन संगठनों को सोचना होगा कि सवाल से बचा जाए, चुप्पी साध ली जाए या फ्रंटफुट पर आकर सवाल पूछा जाए और पलटवार किया जाए। यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि हिन्दू समाज अपने ऊपर हो रहे अन्याय कब तक सहता रहेगा। संतों को समाज जागरण के लिए आक्रामक तेवर अपनाने की जरूरत क्यों पड़ रही है? हिन्दू समाज अपने ही देश में न्याय और सम्मान की खातिर क्रुद्ध और हताश क्यों है? सालों से वह पिटता ही क्यों आ रहा है? कांग्रेस के इतने वर्षों के राज में हिन्दू समाज दमन, अपमान और अन्याय का भागीदार ही क्यों बना? आखिर कौन पूछेगा ये सवाल, कौन देगा इन सवालों का जवाब? जब सवाल पूछने वाले ही असमंजस में हों, अंजाने अपराधबोध से ग्रस्त हो जाएं, तो समाज तो अवसादग्रस्त हो ही जाएगा।
पुलिस के एक आला अधिकारी ने व्यक्तिगत चर्चा में इस बात का खुलासा किया कि डंडे के बल पर किसी को भी आरोपी बनाया जा सकता है। किसी से भी कुछ भी कबूल कराया जा सकता है। यह तब और भी आसान हो जाता है जब पुलिस और अन्य सरकारी एजेंसियों का उच्चस्तरीय राजनीतिक दुरुपयोग होने लगे। यह कौन दावा करेगा कि साध्वी प्रज्ञा को पुलिस ने प्रताड़ित नहीं किया। सिर्फ आरोपी से अपराधी और आतंकी जैसा सलूक नहीं किया? अब सिर्फ राज्य पुलिस और विभिन्न आयोगों का ही नहीं, बल्कि सीबीआई, आईबी और विशेष पुलिस दस्ते का भी राजनैतिक उपयोग होने लगा है। जब षड्यंत्र और उसे अमल में लाने की रणनीति सत्ता के शीर्ष स्रोत से हो, तो सामान्य लोगों के लिए इसे समझना मुश्किल हो जाता है। वे तो कही-सुनी गई बातें, टीवी चैनलों की व्याख्या और अखबारों के आंशिक सच को ही संपूर्ण सत्य मान लेते हैं। लेकिन जागरूक पाठक और दर्शक तो आंशिक सच को शक के नजरिये से देखेगा, विवेकपूर्ण विचार करेगा और तब कोई समझ बनाएगा। साध्वी प्रज्ञा के टेलिफोन और मोबाइल में से जांच एजेंसियों के कुछ लक्षित और उद्देश्यप्रेरित नंबरों की ही जांच क्यों की जाए, उन सभी नंबरों से पर्दा उठाया जाए जो उसके पास उबलब्ध है। उनके साथ सिर्फ भाजपा नेताओं के फोटो न दिखाए जांए, बल्कि आज तक के उनके सभी संपर्कों की छानबीन की जाए। सच तब उजागर होगा। तब कई सरकारी एजेंसियों और लोगों व राजनीतिक दलों के बारे में राज खुलेंगे। जांच व्यापक और निष्पक्ष होनी चाहिए, किसी निर्दिष्ट उद्देश्य और लक्ष्य से प्रेरित नहीं।
गांधी की हत्या में भी संघ को फंसाया गया था। इस मामले में न्यायालय द्वारा संघ को निर्दोष करार देने के बाद भी कांग्रेसी और संघ विरोधी आज भी गांधी हत्या के मामले में संघ का नाम लेने से बाज नहीं आते। न्यायालय की इस अवमानना के बारे में कोई कुछ बोलता भी नहीं। तब से लेकर आज तक संघ ही नहीं सभी छोटे-बड़े हिन्दू संगठनों को बदनाम, अपमानित और अस्तित्वहीन कर देने का षड्यंत्र लगातार जारी है। तमिलनाडु में पू. शंकराचार्य जी पर आरोप लगाकर उन्हें गिरफ्तार किया गया, उन्हें अपमानित किया गया। अब उस मामले का क्या हुआ, किसी को नहीं मालूम। संभव है साध्वी प्रज्ञा की गिरफ्तारी भी किसी बड़े राजनीतिक हेतु के लिए किया गया हो। योजनाकार की मंशा पूरी होते ही इसे भी दफन कर दिया जाएगा।
हिन्दू समाज और संगठन आज चारों ओर से विरोधों और आक्रमणों से घिर गया है। दुनियाभर की ईसाई और इस्लामिक ताकतें सुरसा की तरह मुंह बाए भारत को क्षत-विक्षत करने को आतुर हैं। वे भारत को खंडित कर देने का हर संभव प्रयास कर रही हैं। यहां आतंकवाद, नक्सलवाद, मतांतरण और घुसपैठ को देशहित के नज़रिए से देखने के बजाए तुष्टिकरण के चश्में से देखा जा रहा है। देश में काम कर रहे सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों को प्रतिबंध की धमकी दी जा रही है। इन संगठनों से जुड़े कार्यकर्ताओं को आरोपी बनाया जा रहा है। शेष समाज को इन संगठनों से न जुड़ने की अप्रत्यक्ष चेतावनी दी जा रही है। दुस्साहस का भयावह परिणाम दिखाया जा रहा है। अब आतंकवाद पर वैसी बात नहीं की जाएगी। इसमें सेक्युलरिज़्म का तड़का लगाया जा रहा है। अब मुस्लिम और ईसाई आतंकवाद के साथ थोड़ी चर्चा हिन्दू आतंकवाद की भी होगी।
यह चुप रहने का समय नहीं है। चुप्पी के भयावह और खतरनाक प्रभाव होंगे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदुत्व के पैरोकार सभी सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दलों को आगे आना ही होगा। कोई बोले न बोले, इन्हें बोलना ही पड़ेगा। इन संगठनों को चुनौतियों से मुंह चुराने के बजाए तर्क और त्वरा शक्ति, आक्रामक शैली और संगठन कौशल के साथ आतंकवाद के खिलाफ और साध्वी प्रज्ञा के पक्ष में खड़े होना होगा। यह विचार, संगठन और कार्यकर्ताओं की परीक्षा की घड़ी है। साध्वी प्रज्ञा के गुरु स्वामी अवधेशानंद जी को आगे आकर हिन्दू शक्तियों का उत्साहवर्द्धन करना चाहिए। वह अपने शिष्या के पक्ष में जिरह करें, यह परिस्थितियों की मांग है।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सज़ा सुनाने के बाद भी आतंकियों के पक्ष में कितने वकील, समाजसेवी और लेखक-बुद्धिजीवी सामने आ गए थे। आतंकियों के एन्काउंटर में एक पुलिस अधिकारी की शहादत के बाद भी उस मामले की जांच की मांग राजनैतिक दलों द्वारा की गई। उन्हें इसका ज़रा-सा भी मलाल नहीं। आज साध्वी के पक्ष में कोई क्यों नहीं आ रहा? कोई वकील नहीं, कोई पैसे वाला नहीं, कोई लेखक-बुद्धिजीवी नहीं, कोई समाजसेवी नहीं, कोई साधु-संत नहीं, कोई नेता-राजनेता नहीं। क्या सिर्फ इसलिए कि हिन्दू दुनिया में अल्पसंख्यक है, अपने ही देश में जलालत और अपमान की ज़िंदगी जीने को अभिशप्त है! देश के सामने अनेक ज्वलंत समस्याएं और चुनौतियां हैं। ये समस्याएं और चुनौतियां राजनीति और चुनाव के मुद्दे बन गए हैं। भाजपा और उनके सहयोगी दलों ने भरसक कोशिश करके विधानसभा और आने वाले लोकसभा चुनावों में इन्हें मुद्दा बनाने की योजना बखूबी बना ली थी, लेकिन बहुत ही कुशलता से उन मुद्दों से ध्यान बांटने और हटाने की एक चतुर चाल चली गई है। तोप का मुंह चलाने वाले की तरफ ही कर दिया गया है। सभी राष्ट्रवादी शक्तियों को इस चाल से खुद को भी बचाना है और देश व समाज को भी।

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