शुक्रवार, 1 अगस्त 2008


मुरिया दरबार का करमा नृत्य है सलवा जुडूम
जयराम दास
सलवा जुड़ुम ना कोई ब्राण्ड है और न ही गांधी को ब्राण्ड एम्बेसडर जैसे शब्दों से दूषित करने की जरूरत. ये दोनों शब्द बिल्कुल बाजार की उपज है.
तीसरी दुनिया के प्रखर चिंतक ´पॉलो फ्रेरे` के अनुसार ´शोषक और शोषित दोनों का अमानुषीकरण मानवीय विडंबना है। इस दो तरफा अमानवीकरण से इंसानी नियति को बचाने की क्षमता एवं जिम्मेदारी शोषक के पास न होकर शोषित की है। पहले तो शासकों ने शोषक बनकर छत्तीसगढ खासकर बस्तर को हर तरह की मानवीय सुविधाओं से दूर रखा और उसके बाद उस शोषण से मुक्ति का सपना दिखाने कुछ लोग सुदूर बंगाल से आये और बेचने लगे आदिमजनों के सपनों को। दशकों बाद उत्पीडित की भूमिका में रहे आदिवासी जनों ने अपनी आंखें खोली अपनो को उन सपनों के सौदागरों के रक्तिम चंगुल से छूट सकने क्षमता को पहचाना, अमानवीकरण से अपनी नियति को बचाने की जिम्मेदारियों को समझा और तब एक ऐतिहासिक आंदोलन शुरू हुआ, जिसका नाम पडा ´सलवा जुडूम`।
´सलवा जुडूम` ना कोई ब्रांड हैं, और न ही गांधी को´ब्रांड एम्बेसडर` जैसे शब्दों से दूषित करने की जरूरत। ये दोनों शब्द बिल्कुल बाजार की उपज हैं और बाजार जैसी चीजों से आदिमजनों का न ज्यादा संबंध है और ना ही उन्हें इसकी जरूरत। रही बात गांधी की, तो यह तय है कि जहां भी अव्यवस्थाओं के खिलाफ असहयोग की शुरुआत होगी, जहां भी अपनी भूमि को उत्पीडकों के चंगुल से मुक्ति हेतु कोई प्रयास शुरू होगा तो उसके शाश्वत प्रतीक होंगे महात्मा गांधी। लडाई चाहे अफ्रिकी ´नस्लवाद`के खिलाफ हो या बस्तरिया ´नक्सलवाद` के। अपनी लाठी लेकर 139 वर्ष का वह महामानव बिल्कुल सीना ठोककर खडा होगा राक्षसों के समक्ष प्रतीकों के रूप में, नैतिक बल के रूप में। पीढ़िया आयेंगी चली जायेगी, गांधी की उम्र भी बढती जायेगी लेकिन, उसकी वही तेजिस्वता, वही आध्यात्मिक आभा, वही आत्मिक बल और अन्याय के विरूद्ध खडे होने की वही जिजीविषा दिखेगा आज और हजार साल के बाद भी।
यदि गांधी की वह प्रेरणादायी ताकत नहीं हो तो एक बारगी तो आत्मा कांप जाती है, रोंगटे खडे हो जाते हैं यह सोचकर कि हमारा पाला कितने खतरनाक लोगों से पडा है। अस्तित्व की कितनी विकट लडाई लड रहे हैं ये आदिम जन। क्या नहीं है नक्सलियों के पास? ढेर सारा देशी-विदेशी पैसा, अत्याधुनिक हथियार, सैकडों लोगों को क्षणभर में मांस के लोथडे में तब्दील कर देने वाले भूमिगत बम, मिसगाइडेड मिसाइल की तरह ढेरों प्रतिभाशाली एवं उर्जावान लोग, वेतनभोगी मीडियाकर्मी, चीन के चेयरमैन की शागिर्दी, भारत की सरकार के बैसाखी बने लोगों का सहयोग, अमानवधिकारियों का संरक्षण और जंगली लडाई के जानकार उसकी खुंखार गुरिल्ला सेना। एक´सत्य`और इमानदारी के सिवाय सबकुछ तो है नक्सलियों के पास। और यही पर गांधी प्रतीक बन जाते हैं इन बस्तरिया वीरों के। इसी कारण मोहनदास राजदूत बन जाते हैं सलवा जुडूम के। आखिर उस युवा बैरिस्टर के पास भी सत्य की ताकत के अलावा था क्या? लेकिन दक्षिण आफ्रिका में उसी ताकत के बदौलत गांधी ने ट्रेन के बाहर फेकने वाले फिरंगियों को उसकेसमूचे साम्राज्य के उसके सारे उपनिवेश के बाहर फेककर ही दम लिया था।
जहां तक सवाल गांधी के अहिंसा की है, तो आज यदि गांधी होते तो शायद फिर अपनी इसी बात को दोहराते कि ´हिंसा और कायरता में से अगर हमें एक चुनना पडे तो हम हिंसा चुनना पसंद करेंगे, आखिर वह सत्य का पुजारी इस असत्य को कभी नहीं दुहराता कि उसे आजादी बिना खडग बिन ढाल, मिल गयी थी। निश्चय ही वह नमन करते उन क्रांतिकारियों का भी जिन्होंने वनवासियों की तरह ही पशुता पर उतर गये अंग्रेजों की चूले हिलाकर रख दी थी। एक जगह तो नेहरू ने भी गांधी जी की अहिंसा को अपने आत्मकथा में एक रणनीति कहा है, जब काफी हिंसा के कारण जब महात्मा ने अपने आंदोलन को विराम दिया था। एक दोहा है ´गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि गढ़ि काढ़े खोट, भीतर हाथ सहार दे, बाहर मारे चोट` यानि गुरु को कुम्हार की तरह होनी चाहिए जो भीतर से तो सहारा दे मगर बाहर चोट भी मारने की कुबत रखे। शायद किसी के पाप का घडा फोडने में भी इसी नीति की जरूरत होती है।
गांधी जी ने कभी यह दावा नहीं किया कि उन्होंने कोई नया विचार देश को दिया है। 28 मार्च 1936 के हरिजन के अंक में उन्होंने लिखा था। ´नये सिद्धांतों को जन्म देने का दावा में नहीं करता, मैंने तो केवल अपने ढंग पर सनातन सत्यों को जीवन और समस्याओं पर लागू करने का प्रयास किया है।` यानि अपने समग्र जीवन में गांधी अपने उसी सनातन सत्य के साथ प्रयोग करते रहे जो पूर्ववर्ती विचारकों शास्त्रों पुरानों ने उन्हें दिया था। अन्य कई चीजों के अलावा अहिंसा भी उनमें से एक था, लेकिन वे कोई लकीर के फकीर नहीं थे। समयानुकूल विचारों में लचीलापन लाना भी उनके सिद्धांतों में शामिल था। ऐंजिल की पुस्तक के आधार पर उन्होंने कहा था कि कोई एक गाल पर थापड मारे तो दूसरा गाल उसके आगे कर दो। लेकिन जब दूसरे पर भी थप्पड मार दे तो तीसरा गाल कहां से लायेंगे आप? उस समय भले ही तीसरे गाल का प्रयोग करने की जरूरत नहीं पडी हो, कुछ तो तात्कालीन वैश्विक परिस्थितियां, गांधी का तेज और क्रांतिकारियों का बलिदान अंग्रेजों को वापसी के लिए मजबूर होना पडा।
लेकिन आज तो ये नक्सली हमसे हमारा तीसरा गाल भी मांग रहे हैं। राम राज्य की स्थापना को ही अपना ध्येय मानने वाले गांधी के रामकथा में ही इस तीसरे गाल की गुत्थी सुलझी नजर आती है। जब तीन दिन तक विनय करने के बाद भी राह नहीं देने पर राम समुद्र को सोखने को यह कहते हुए उद्यत हुए थे कि´भय बिनु होई ना प्रीति` कभी आपने पढा है कि गांधी ने कभी आलोचना की हो भगवान राम के इस कदम की। जब इसी दण्डकारण्य (बस्तर) में राक्षसों द्वारा संहार किये गये वनवासियों के हिìयों का पर्वत देख भगवान राम, राक्षसों के खात्मे का संकल्प लेते हैं, क्या आपने कहीं सुना कि अपने किसी आलेख या भाषण में गांधी जी ने उस प्रसंग की आलोचना की हो? राक्षसों के संहार की कथा ´रामायण` पढते-पढते ही तो बकौल गांधी, गांधी जी सत्य हो गये थे। इस रावण को समाप्त करने वाले भगवान राम ही तो अंत समय में भी उनके जिह्वा पर विराजमान रहे। गीता पर सर्वश्रेष्ठ टीका लिखने वाले, और उसमें वर्णित उपदेशों को अपने जीवन में अंगीकार करने वाले उस कर्मयोगी को कभी आपने ये कहते पढा कि अर्जुन को युद्ध के लिए ´उकसाने` वाले कृष्ण गलत थे।
गांधी के प्रयोगों पर किसी तरह के विवेचना की पात्रता न रखते हुए भी विद्वतजनों से यह आग्रह करना उचित होगा कि वे सभी गांधी को उनके आस्था, विश्वास एवं कर्म के साथ समग्रता में समझने की कोशिश करें। बिना किसी पूर्वाग्रह के गांधीवाद पर विमर्श करते समय लंका और कुरुक्षेत्र के नायकों पर, गांधी की असीम आस्था पर भी विचार करना होगा। उपरोक्त का कहीं भी आशय यह नहीं है लेखक किसी नतीजे पर कूद कर पहुंच गया है, या किसी भी तरह के अनावश्यक हिंसा का समर्थन कर रहा है। गांधी के बारे में कोई भी प्रशंसा या आलोचना तो निश्चय ही सूर्य पर थुकने या उसे दीया दिखाने के सदृश होगा। लेखक का आशय सिर्फ इतना है कि´छीनता हो जब तुम्हारा स्वत्व तो,आंख से आंसू नहीं शोला निकलनी चाहिए।

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