शनिवार, 30 अगस्त 2008

प्याज और भारत का किसान
संदीप भटट
एक हालिया खबर के मुताबिक न्यूजीलैंड और जापान के वैज्ञानिकों ने आॅसू मुक्त प्याज बनाने में कामयाबी हासिल कर ली है। बायोटेक्नोलाॅजी के इस्तेमाल से प्याज के उस जीन को स्विच आॅफ कर दिया गया है जो आॅसू पैदा करने वाले एंजाइम का निर्माण करता है। न्यूजीलैंड स्थित क्राप एंड फूड रिसर्च संस्थान के शोधकर्ताओं ने इस खोज के बाद इस तरह के प्याज की खोज शुरु हुई। इसमें दस जीनों का पता लगा जिससे प्याज काटने पर आॅखों में आॅसू आते हैं। वैज्ञानिकों का दावा कि इससे प्याज का स्वाद बढेगा और यह स्वास्थ्य के लिए भी बेहतर होगा। न्यूजीर्लैंड और भारत के किसान निस्संदेह प्याज की इस किस्म की खासी पैदावार लेंगे और मुनाफा बटोरेंगे। क्या भारत के किसानों के लिए भी ऐसी कोई दवा बन सकेगी जिससे खेती के कारण भारतीय किसान आत्महत्या जैसे कदम न उठाएं। मौजूदा हालात देखकर तो ऐसा कतई नहीं लगता। भारत का आम किसान आज भी परम्परागत तौर तरीके अपनाकर कृषि करता है। दुनिया के अग्रणी सब्जी उत्पादको में भारत भी शामिल है। लगभग 6.76 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्रफल पर देश में सिर्फ सब्जी का उत्पादन होता है। भारत में आज भी सब्जियों का लगभग 29 प्रतिशत आलू अत्पादन है। भारत में सब्जियों के उत्पादन को बढ़ाने के उद्देष्य से वर्ष 2007 में राष्ट्रीय बागवानीर मिशन केी शुरुआत की गई। इसके तहत 2012 तक सभी प्रकार की सब्जियाॅ के दुगने उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। मिशन के अंतर्गत देश के किसानों को बागवानी , सब्जी उत्पादन आदि का प्रशिक्षण देने है, इन्हें पेशे के बतौर अपनाने हेतु प्रोत्साहन देने की बात पर जोर दिया जा रहा है।
बहरहाल भारत जैसे देश में यह अभी बहुत देर की कौड.ी है। देश में किसान आत्महत्याओं का मामला थमता नजर नहीं आता । गैर सरकारी आॅकड़ों की मानें तो पिछले कुछ सालों में एक लाख से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं। लगातार सूखे अतिवृष्टि, बाढ़, ओलावृष्टि जैसी प्राकृतिक आपदाआंे ने किसानों की कमर तोड़ दी है। सूदखोरांे की उॅची ब्याज दरें न चुका पाने के कारण सरकारी योजनाओं की लालफीताशाही और भ्रष्ट तंत्र से जीवट किसान भी हार मान लेता है। जो कुछ भी फसल होती हैं जमाखोरांे और बिचोलियांे को औने पैने दामों में बेचना भी उनकी मजबूरी होती है। फसल कम हो या ज्यादा किसान हमेशा से बाजार से फायदा नही ले पाता है। सरकारी नीतियाॅ इतनी लचर है कि किसान मंडियों या सहकारी समितियों से बचना चाहते हैं नतीजतन इसका फायदा दलाल उठाते है। कुछ माह पहले प्याज की कीमतें आसमान छू रही थी पर किसानों का मुनाफा जमाखोरों ने बटोरा। कई गैर सरकारी संगठन भी इन प्रयासों हेतु अपनी दुकानें चला रहे हैं। कृषि की विकास दर में लंबे समय से कोई बढ़ोतरी नजर नहीं आती। सरकार की नीतियों में आमूलचूल परिवर्तन के बिना कुछ नही हो सकता। ऐसा तब है जब सेज जैसी योजनाएं अभी अपने शुरुआती चरण में हैं। जिस दिन खेती की जमीनों में सेज उगेंगे किसान कहीं गुम हो जाएगा।

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