शुक्रवार, 1 अगस्त 2008

1857 क्रांति की 151 वी

1857 क्रांति की 151 वी
वर्षगांठ
मध्यप्रदेश के जन-जन तक पहुंचा ‘‘रोटी और कमल’’
अनिल सौमित्र
भोपाल। इतिहास के तथ्यों और संदेशों को याद करना आसान नहीं होता। यह तब और भी कठिन हो जाता है जब घटनाओं और प्रतीकों को अलग चश्मे से देखे जाने का अंदेशा हो। सबको यह पता नहीं है कि 1857 की क्रांति का प्रतीक रोटी और कमल था। हालांकि अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ स्वतंत्रता के लिए यह पहला आगाज नहीं था लेकिन, पहली सुनियोजित और संगठित क्रांति जरूर थी। यह ऐसी क्रांति थी जिसमें राजा-महाराजा, सैनिक और नागरिक, नागरिक और ग्रामीण तथा वनवासी बन्धुओं ने बड़ी संख्या में भाग लिया था। इस वर्ष 1857 की क्रांति के 150 वर्ष पूरे हुए। देशभर में क्रांति की स्वर्ण जयंती मनाई गई। इसी सिलसिले में मध्यप्रदेश ने अनूठा प्रयोग किया। क्रांति की याद को जन-जन तक पुहंचाने के लिए मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग ने गांव-गांव और नगर-नगर में क्रांति यात्राएं आयोजित करने की योजना बनाई हैं और इस योजना को मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद् ने अमलीजामा पहनाया।
चूंकि ‘कमल’ भारतीय जनता पाटी का निशान है। मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार है। यह संयोग ही था कि भाजपा शासनकाल में ही 1857 के 150 वर्ष पूरे हुए। जाहिर है भाजपा सरकार को ही 150 वीं वर्षगांठ मनाने का अवसर मिला। यह अवसर भाजपा के लिए वरदान तो था, लेकिन विरोध का कारण भी था। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि क्रांति यात्रा के बहाने ‘कमल’ का संदेश देकर भाजपा चुनाव प्रचार कर रही है, क्रांति शताव्दी वर्ष का दुरूपयोग कर रही है। कांग्रेस आरोप लगाती रही और भाजपा सरकार ने मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद् के माध्यम से संपूर्ण प्रदेश में क्रांति यात्रा का सफल आयोजन करती रही। भाजपा पहले से ही राम और रोटी की बात करती रही है। लेकिन ‘‘कमल और रोटी’’ की चर्चा और संदेश, एक नई पहल थी। जन अभियान परिषद् के कार्यपालक निदेशक राजेश गुप्ता बताते हैं - मध्यप्रदेश के 21235 पंचायतों तक क्रांति यात्रा पहुंची। दरअसल ये यात्राएं विकेन्द्रित और छोटे-छोटे समूहों में थी। उद्देश्य यही था कि क्रांति के संदेशों को अधिक से अधिक लोगों तक रोचक तरीके से पहंुचाया जाए। जन अभियान परिषद् ने अपने 9 संभाग, 48 जिले और 330 ब्लाॅक इकाईयों के माध्यम से इन यात्राओं को सफल और प्रभावी बनाया। उल्लेखनीय है कि बाबा मौर्य ने अपनी प्रस्तुति ‘‘भारतमाता की आरती’’ से 22 जिलों में लोगों को आंदोलित किया। परिषद् के अधिकारी श्री गुप्ता कहते हैं - मध्यप्रदेश में क्रांति यात्रा का मुख्य आकर्षण ‘विकेन्द्रित स्तर पर पंचायत से पंचायत तक यात्रा, नुक्कड़ नाटक और भारतमाता की आरती (एक शाम, शहीदों के नाम) कार्यक्रम ही था। गौरतलब है कि इस क्रांति यात्रा का संदेश मध्यप्रदेश के सभी जिलों में पहुंचाया गया। जन अभियान परिषद् की जानकारी के अनुसार इसमें 34 लाख से अधिक यात्रियों ने हिस्सेदारी की। इंदौर संभाग के रिपोर्ट के मुताबिक अकेले इसी संभाग में लगभग 2 लाख महिला, पुरूष और बच्चे सहभागी बने। इसके अलावा लाखों लोग यात्रा के संदेशों से रू-ब-रू हुए। जन अभियान परिषद् ने सैंकड़ों स्वयंसेवी संस्थाओं, नाटक मंडलियों और समूहों के माध्यम से क्रांति के संदेशों को प्रभावी बनाने की कोशिश की। यात्रियों को आम जनता से सहयोग, सम्मान और समर्थन तो मिला ही। वे इतिहास के ‘स्मरण यात्री’ के तौर पर देखे गए। आम लोग इस बात से रोमांचित थे कि जिस घटना के वे साक्षी नहीं थे, सिर्फ पढ़ा या सुना भर था, वह आज उनके सामने आंखो देखी घटना के समान सिद्ध हो रहा है। इन यात्राओं ने नागरिकों को जागरूक तो किया ही, उन्हें संवेदनशील भी बनाया। वे आक्रांताओं और अंग्रेजों के दमन और अनगिनत अत्याचार की याद को ताजा किया। लेकिन जिस तरह कुछ लोग विदेशियों की चाल तब नहीं समझे थे और अपने ही लोगों के खिलाफ अंग्रेजो का साथ दिया था, ठीक उसी तरह कुछ लोगों ने जाने-अंजाने इस यात्रा और यात्रियों का भी विरोध किया। बहरहाल विरोध और समर्थन के बावजूद यात्रा को सफल और प्रभावी बनाने के लिए पर्दे के पीछे अनिल माधव दवे थे। श्री दवे मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद् के उपाध्यक्ष हैं। वे भाजपा के भी उपाध्यक्ष हैं। शासन ने 1857 मुक्ति संग्राम के डेढ़ सौ वर्ष समारोह समिति की कमान श्री दवे को ही सौंपी थी। कांग्रेसियों द्वारा 1857 क्रांति यात्रा के विरोध के दो ही प्रमुख कारण थे। एक तो यात्रा में प्रतीक के तौर पर कमल का प्रयोग और दूसरे श्री अनिल माधव दवे । इस यात्रा के दौरान यात्रा दल के लोगों ने एक तरफ तो क्रांति के प्रतीक रोटी और कमल को एक गांव से दूसरे गांव तक पहुंचाया, वहीं वे स्थानीय स्तर पर तब के क्रांतिकारियों की तहकीकात भी कर रहे थे। इस दरम्यान कई अनाम क्रांतिकारियों की जानकारी भी मिली। वे, स्थानीय लोगों को पडोसी गांव, तहसील और जिले के क्रांतिकारियों और घटनाओं की याद भी ताजा कर रहे थे। गांव वालों ने तब के गद्दारों की भी खबर ली। गांव वालों ने कहा आज भी हैं देश में गद्दार, इसीलिए एक और क्रांति की दरकार है। वे आज के गद्दारों को सबक सिखा कर, 1857 की कसर पूरी करना चाहते हैं। हालांकि मुस्लिम समुदाय ने अधिकांश स्थानों पर यात्रा का स्वागत किया और उत्साहपूर्वक इसमें अपनी भागीदारी दर्ज करायी, लेकिन कई स्थानों पर इस समुदाय के लोगों ने यात्रा का विरोध भी किया। मुसलमानों के विरोध के कारण यात्रा को सांप्रदायिक नजरिए से देखे जाने का भय भी था। इसीलिए क्रांति-यात्रा की सलामती के लिए प्रशासन और यात्री दल को काफी मशक्कत करनी पड़ी। थोड़ी देर के लिए ही सही, लेकिन गांववासी और वनवासी राष्ट्रवाद और देशभक्ति के संदेशों से अनुप्रणित हुए। उन्होंने वंदेमातरम् और भारतमाता की जय के उद्घोष किए। यात्रा के दौरान संपूर्ण मध्यप्रदेश में साहित्य का वितरण किया गया। क्रांति समारेह समिति के प्रदेश संयोजक अनिल माधव दवे द्वारा संकलित पुस्तिका ‘‘रोटी और कमल की कहानी’’ लाखों की संख्या में ग्रामीणों के बीच बांटी गई। हालांकि राजनैतिक विरोधी इस क्रांति समारोह को चुनावी नजरिए से देख रहे हैं। इसे देशभक्ति और राष्ट्रवादी दृष्टि से भी देखे जाने की जरूरत है। चुनावी नफा-नुकसान तो बाद की बात है, फिलहाल मध्यप्रदेश के नगरीय, ग्रामीण और वनवासी अंचलों में देशभक्ति और क्रांति का जज़्बा देखने को मिल रहा है।


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