रविवार, 27 जुलाई 2008

वंचितों की वाणी और निःशक्तों का सहारा है दिग्दर्शिका

विकलांगता अथवा निःशक्ता अपने-आप में एक विषम परिस्थिति हैं। यह विषमता, गरीबी के कारण और भी दुरूह हो जाती है। गरीब स्त्री और बच्चों के मामले में विकलांगता तो मानों एक श्राप के समान है। वे तमाम अवसरों से अलहदा हैं। सामान्यतः इनकी मदद के लिए कोई नहीं आता। ऐसे हजारों बच्चे जो दुनिया के विविध रंगो को देख नहीं पा रहे, सैकड़ों बच्चों के लिए बहु-विकलांगता के कारण यह वसुंधरा एक यातनागृह के समान है। ऐसे सभी बच्चों के लिए इस दुनिया को अनुकूल और दुनिया के अनुकूल बच्चों को बनाने के लिए बहुविध प्रयास किए जा रहे हैं विकलांगता से जूझ रहे ऐसे तमाम बच्चों को एक बेहतर दुनिया देने की दिशा में शासकीय प्रयास नाकाफी सिद्ध हो रहे हैं। गैर-सरकारी प्रयास अपनी हदों में बंधे हैं। देश और दुनिया में निःशक्तों की बढ़ती तादाद एक बड़ी चुनौती के रूप में मुह बाए खड़ी है। वंचितों और निःशक्तों को अवसर और शक्ति प्रदान करना एक चुनौतिपूर्ण कार्य है। विशेषकर शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर बच्चों और वृद्धों के लिए कोई भी प्रयास जोखिम भरा है। लेकिन, इस चुनौती और जोखिम को भोपाल में शुरू हुई एक संस्था दिग्दर्शिका ने स्वीकार किया है । दिग्दर्शिका पुनर्वास और अनुसंधान संस्थान की स्थापना भोपाल में वर्ष 1989 में हुई। यह संस्थान एक गैर-सरकारी संगठन के रूप में कार्यरत है। यह संगठन विकलांगता और मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में विशेषज्ञ सेवाएं देता है। यह संस्थान भारतीय पुनर्वास परिषद् और राष्ट्रीय न्यास के साथ संबद्ध होकर कार्य कर रहा है। यह संस्थान आॅर्टिज्म व्यक्तियों के साथ ही, सेरेब्रल पैल्सी, मानसिक मंदता और बहु-विकलांगता से ग्रस्त बच्चों के लिए मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के विभिन्न हिस्सों में कार्यरत है। दिग्दर्शिका ने रीच इंडिया नामक एजेंसी के सहयोग से कई संगठनों और संस्थाओं को अपने साथ जोड़ा है। ये संस्थाएं निःशक्त बच्चों के लिए शिक्षा और पुनर्वास का अवसर मुहैया करा रही हैं। रीच इंडिया की मदद से इन संस्थाओं को सशक्त और क्षमतावान बनाया जा रहा है ताकि ये संस्थाएं निःशक्त बच्चों को अवसरों का लाभ उठाने के लिए मदद कर सकें।दिग्दर्शिका, वंचितों की मदद के लिए देशी-विदेशी अनेक एजेंसियों से मदद ले रहा है। सेंस इंटरनेशनल (इंडिया) एक ऐसी ही संस्था है। यह संस्था अंधत्व से ग्रस्त बच्चों के लिए तकनीकी सहायता उपलब्ध करा रही है। दिग्दर्शिका निःशक्तता के क्षेत्र में कार्यरत दुनिया के महत्वपूर्ण एजेंसियों के लिए लिंक एजेंसी के रूप में काम कर रही है। निश्चित ही यह निःशक्तजनों के लिए देश की चुनिंदा संस्थाओं में से एक है। हालांकि दिग्दर्शिका का पुराना केन्द्र भोपाल के शिवाजी नगर में स्थित था, लेकिन इसका नया दतर अरेरा काॅलोनी में अपेक्षाकृत बेहतर युविधाओं और संसाधनों लैस है। जरूरतमंद लोग दिगदर्शिका के इस कार्यालय (ई 7/81, अरेरा काॅलोनी, भोपाल) में मदद देने और मदद करने के लिए संपर्क कर सकते हैं। व्यक्तिगत और संस्थागत तौर पर मदद देने वाले और मदद की अपेक्षा रखने वाले लोग दिगदर्शिका को संपर्क कर सकते हैं। दिग्दशर््िका, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कई एजेंसियों के साथ संबद्ध है। इसका लाभ भी प्रदेश की संस्थाएं उठा सकती हैं। संस्था ने कर्मठ और लगनशील कार्यकर्ता सुमित राय और काकोली राय के नेतृत्व में काफी प्रगति की है। इन्होंने न सिर्फ एक चुनौती को स्वीकार किया है, बल्कि अपने प्रयासों से नए एनजीओ को भी विकलांगता के क्षेत्र में कार्य करने के लिए आकर्षित किया है। दिगदर्शिका के प्रयासों के कारण मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में विकलांग बच्चों की शिक्षा, प्रशिक्षण, परामर्श, जागरुकता और पुनर्वास के क्षेत्र में कार्यरत नई और पुरानी संस्थाओं का एक नेटवर्क खड़ा हुआ है। भारत में निःशक्तता, भले ही एक बड़ी चुनौती के रूप में हमारे सामने हो, लेकिन इस चुनौती से जूझने और भिड़ने के लिए संस्थाएं और कार्यकर्ता भी बड़ी संख्या में आगे आ रहे हैं। दिग्दर्शिका, इन संस्थाओं की सूची में अग्रणी स्थान रखने वाला है। दिग्दर्शिका का प्रयास है कि न र्सिफ बच्चों, बल्कि सभी निःशक्तजन शासकीय सुविधाओं और अवसरों का समुचित लाभ उठा पाएं। निःशक्तजन, दुर्भाग्यवश अवसरों से वंचित तो हैं, लेकिन उन्हें समाज और विकास की मुख्यधारा में लाना भी हमारा ही दायित्व है। इस दिशा में सामुदायिक पहल का भी काफी महत्व है। समुदाय की भागीदारी के बिना निःशक्तों का पुनर्वास संभव नहीं है। इसीलिए समुदाय आधारित पुनर्वास की अवधारणा को साकार करने की कोशिश की जा रही है। विकलांगों के पुनर्वास के लिए ’समाज आगे, सरकार पीछे’ के सिद्धांत पर काम करने की आवश्यकता है। दिग्दर्शिका इस दिशा में भी प्रयासरत है। यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं है कि दिग्दर्शिका, वंचितों की वाणी और निःशक्तों का सहारा है। स्पंदन फीचर्स। ई-31, 45 बंगले,

कोई टिप्पणी नहीं: